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साधारण लोगों से असाधारण प्रदर्शन चाहते हैं तो अपनायें ये सूत्र…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jul 2
  • 3 min read

July 1, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, हाल ही मैं एक ओपन प्रोग्राम के दौरान मैंने प्रतिभागियों से एक प्रश्न पूछा, “आप सोमवार की सुबह ऑफिस या स्कूल आते समय सबसे पहले क्या महसूस करते हैं—उत्साह या तनाव?” प्रश्न पूछते ही पूरे हॉल में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। यकीन मानियेगा, यह सन्नाटा अपने आप में ही बहुत कुछ कह रहा था। किसी भी संस्था की वास्तविक पहचान उसकी इमारत, उसकी वेबसाइट या उसके विज़न स्टेटमेंट से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वहाँ काम करने वाले लोग सुबह काम पर आते समय कैसा महसूस करते हैं। यदि लोग उत्साह के साथ आते हैं, तो समझिए वहाँ केवल काम नहीं हो रहा, संस्कृति बन रही है। लेकिन इसके विपरीत अगर लोग डर, तनाव और असुरक्षा के साथ आते हैं, तो समझिए समस्या लोगों में नहीं, वातावरण में है।


दोस्तों, यकीन मानियेगा कार्यस्थल का वातावरण अचानक नहीं बनता। वह तो दिन-प्रतिदिन लीडर द्वारा टीम के साथ किए गए व्यवहार से तय होता है। जी हाँ, लीडर का कहा एक वाक्य किसी कर्मचारी का आत्मविश्वास बढ़ा सकता है और वही एक वाक्य उसे महीनों तक भीतर से तोड़ भी सकता है। लीडर की एक सार्वजनिक प्रशंसा पूरी टीम की ऊर्जा बढ़ा सकती है और सार्वजनिक अपमान पूरी टीम की रचनात्मकता समाप्त कर सकता है। यही कारण है कि श्रेष्ठ संस्थाएँ केवल प्रतिभाशाली लोगों को नियुक्त नहीं करतीं, वे ऐसा वातावरण बनाती हैं जहाँ साधारण लोग भी असाधारण प्रदर्शन करने लगते हैं।


दोस्तों, आपने कभी ना कभी देखा या महसूस किया होगा कि कुछ संस्थाओं में लोग अपनी बात कहने से डरते हैं या संस्था में नए विचारों को स्थान नहीं दिया जाता है; गलतियों को छिपाया जाता है। कुल मिलाकर कहूँ तो हर व्यक्ति स्वयं को बचाने में लगा रहता है। ऐसे वातावरण में संस्था में काम तो चलता रहता है, लेकिन विकास रुक जाता है। इसके विपरीत कुछ संस्थाओं में लोग निडर होकर नए विचार रखते हैं। गलती होने पर दोषी नहीं, समाधान खोजा जाता है। सफलता मिलने पर श्रेय बाँटा जाता है और चुनौती आने पर पूरा समूह एक परिवार की तरह खड़ा हो जाता है। मेरी नजर में यही स्वस्थ कार्य-संस्कृति है और जिन संस्थाओं में यह संस्कृति होती है, वे दिन दूनी, रात चौगुनी प्रगति करती है।


दोस्तों, आज अधिकांश संस्थाएँ “टैलेंट हायर” करने में करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं। लेकिन बहुत कम संस्थाएँ “विश्वास” बनाने में समय निवेश करती हैं। याद रखिएगा, प्रतिभा लोगों को संस्था तक लाती है, लेकिन संस्कृति उन्हें संस्था से जोड़कर रखती है। यदि संस्था में वातावरण अच्छा होगा, तो सामान्य क्षमता वाला व्यक्ति भी सीखकर आगे बढ़ जाएगा। लेकिन यदि वातावरण विषाक्त होगा, तो असाधारण प्रतिभा भी अधिक दिनों तक टिक नहीं पाएगी।


दोस्तों, अगर आप किसी संस्था की लीडरशिप का हिस्सा हैं या फिर आप एक बेहतरीन लीडर बनना चाहते हैं, तो प्रतिदिन स्वयं से केवल तीन प्रश्न पूछिए। पहला, क्या मेरी टीम बिना डर के अपनी बात कह सकती है? दूसरा, क्या टीम के सदस्य गलती होने पर सच्चाई बताने का साहस रखते हैं? और तीसरा, मेरी उपस्थिति लोगों का आत्मविश्वास बढ़ाती है या कम करती है? अगर इन प्रश्नों के उत्तर ‘हाँ’ हैं तो आप सही रास्ते पर चल रहे हैं और अगर नहीं हैं, तो आपको संस्था के वातावरण पर कार्य करना होगा। याने इन तीन प्रश्नों के उत्तर ही आपकी संस्था का भविष्य तय करेंगे।


दोस्तों, लीडर का मुख्य उद्देश्य लक्ष्य प्राप्त करना नहीं है। लक्ष्य तो अच्छी टीम स्वयं भी प्राप्त कर लेती है। लीडर का सबसे बड़ा उद्देश्य ऐसा वातावरण बनाना है जहाँ लोग केवल नौकरी ना करें, बल्कि अपने भीतर की सर्वश्रेष्ठ क्षमता को जिएँ क्योंकि महान संस्थाएँ महान लोगों से नहीं बनतीं। महान संस्थाएँ तो ऐसे वातावरण से बनती हैं, जहाँ साधारण लोग भी स्वयं का सर्वश्रेष्ठ रूप बन जाते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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