• Trupti Bhatnagar

साहसी बनें, सफल बनें - भाग 1

Oct 04, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, निश्चित तौर पर आपने यह कहावत सुनी होगी, ‘हिम्मत-ए-मर्दा, मदद-ए-ख़ुदा!’ अर्थात् भगवान भी उनकी ही सहायता करते हैं, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं।’ दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी भी कार्य को सफलता पूर्वक पूर्ण करने की सबसे ज़रूरी या आवश्यक शर्त है, उस कार्य को पूर्ण करने के लिए अपनी ओर से पूरी क्षमताओं के साथ प्रयत्न या प्रयास करना और यह तभी सम्भव है, जब आपका लक्ष्य आपके डर से बड़ा हो। जी हाँ साथियों, जब आपका सपना आपको अपने डर के मुक़ाबले अधिक प्रेरणा दे, तभी आप अपने लक्ष्यों को सफलता पूर्वक पूरा कर पाते हैं।


उपरोक्त लक्ष्य पाने के लिए आपको मुख्यतः दो बातों की ज़रूरत पड़ेगी। पहली, सपना आपका अपना हो ना की किसी और के प्रभाव में आकर बनाया हुआ अर्थात् उधार के लक्ष्यों से आप सफल जीवन नहीं बना सकते हैं। हालाँकि इस विषय में हम पूर्व में काफ़ी गहराई से चर्चा कर चुके हैं। दूसरी बात, सफलता के लिए आपको साहसी बनना होगा जिससे आप जीवन के प्रति सही नज़रिया विकसित कर सकें। इसके लिए आपको साहसी होने के वास्तविक अर्थ को समझना होगा। ‘साहस’ का अर्थ सिर्फ़ बलशाली या ताकतवर बनना अथवा जोखिम उठाना नहीं होता है। अगर आप वाक़ई में साहसी बनना चाहते हैं तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में मज़बूत बनना पड़ेगा और इसके लिए आपको 6 तरह का साहस अपने अंदर विकसित करना होगा-


पहला - शारीरिक साहस

शारीरिक साहस से सामान्यतः अर्थ लगाया जाता है कि मृत्यु या शारीरिक क्षति के जोखिम पर बहादुरी का कोई ऐसा कार्य करना जो मानवता, आपकी प्राथमिकता या ज़रूरत अथवा जीवन मूल्यों पर आधारित हो। इसमें अपने अंदर शारीरिक शक्ति, लचीलापन और जागरूकता विकसित करना शामिल है। लेकिन दोस्तों, शारीरिक साहस का अर्थ इतना सीमित नहीं है, यह सकारात्मक पेरेंटिंग, व्यवसायिक सफलता, उच्च गुणवत्ता वाला जीवन आदि क्षेत्रों में भी जीवन को बेहतर बनाने में मदद करता है। अगर एक लाइन में इसे समझाने का प्रयास करूँ तो यह किसी भी क्षेत्र में जोखिम या भय के बावजूद भी आपकी कार्य करने की आपकी सोच या क्षमता है।


दूसरा - सामाजिक साहस

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अर्थात् समाज के बिना उसकी परिकल्पना भी अधूरी है। इसी कारण कई बार वह ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से या समाज की अपेक्षाओं और लोगों की नज़र में अच्छा बने रहने की चाह में जीवन मूल्यों के अनुसार, उसके लिए क्या सही है, करने से चूक जाता है। अर्थात् वह अपना जीवन खुद की वरीयताओं के अनुसार नहीं अपितु हर किसी की राय के अनुसार जीता है क्यूँकि उसके लिए सामाजिक शर्मिंदगी, अलोकप्रियता, सामाजिक बहिष्कार या अस्वीकृति, नेतृत्व अधिक मायने रखता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो सामाजिक साहस विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में खुद को अपनी इच्छाओं, अपेक्षाओं, प्राथमिकताओं, जीवन मूल्यों के आधार पर बचाए रखना है।


तीसरा - नैतिक साहस

शर्म, विरोध, सामाजिक बहिष्कार या असहजता आदि के डर के बावजूद भी नैतिकता के आधार पर जो सही है, उसके लिए खड़े होने का नाम नैतिक साहस है। इसका अर्थ हुआ जब आपके लिए नैतिकता, ईमानदारी, अखंडता, सत्यनिष्ठा, सच्चाई अन्य सभी बातों से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है तब आप नैतिक रूप से साहसी बनते हैं। यह साहस आपके शब्दों और आपके द्वारा किए जा रहे कार्यों में समरूपता लाता है, अर्थात् हमारी सोच, हमारे शब्द और हमारे ऐक्शन को एक समान बनाता है।


चौथा - भावनात्मक साहस

भावनात्मक साहस हमें दिल खोल कर सारी भावनाओं के साथ जीने का साहस प्रदान करता है। फिर चाहे वे भावनाएँ सकारात्मक हों या नकारात्मक। इस साहस का हमारी ख़ुशी के साथ गहरा सम्बंध होता है। दूसरे शब्दों में हम इसे दिल का अनुसरण करने वाला साहस भी मान सकते हैं।


आज के लिए इतना ही दोस्तों कल हम अंतिम दो साहस के विषय में चर्चा करेंगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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