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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

सुखी जीवन का रहस्य…

June 22, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आईए दोस्तों, आज के शो की शुरुआत हम एक प्रश्न से करते हैं। चलिए बताइए, हमारे जीवन में आने वाले दुखों के लिए कौन ज़िम्मेदार है? क़िस्मत, परिस्थितियाँ, हमारे अपने लोग या कुछ और। मेरी नज़र में तो सही जवाब है, ‘इनमें से कोई भी नहीं।’ क्योंकि हक़ीक़त में इसके लिए हम स्वयं ज़िम्मेदार हैं। जी हाँ सही सुना आपने, हक़ीक़त में इच्छा, अपेक्षा और आशा रखना ही दुःख का प्रमुख कारण है।


इस स्थिति से बचने के लिए हमें पहले उपरोक्त दोनों को समझना होगा। जैसे, इच्छा याने मन में उपजी कामनाएँ जैसे, किसी विशेष वस्तु जैसे कार, मोबाइल, नौकर, पैसे आदि पाने की चाह रखना। इच्छाएँ सिर्फ़ आप पर निर्भर रहती है। लेकिन जब आप अपनी इच्छाओं की पूर्ति में दूसरों से कुछ सहयोग की अपेक्षा करने लगते हैं तो वह आशा, उम्मीद, एक्स्पेक्टेशन या अपेक्षा बन जाती है। जैसे, मेरी ख़ुशी के लिए मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरे भाई या बहन कोई विशेष कार्य करें या अपने पैसों या सम्पत्ति का प्रयोग हमारे अनुसार करें अर्थात् इसमें आप अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए दूसरों को भी अपने साथ जोड़ लेते हैं।


अपने स्वार्थ के लिए बनाई गई यह इच्छाएँ और आशाएँ जब पूरी नहीं होती हैं तो यह हमारे अंदर क्रोध और दुःख को जन्म देती हैं। इसीलिए, इच्छाओं और आशाओं को नियंत्रण में रखना दुखों को कम कर सुखी रहने का प्रमुख सूत्र माना गया है। अगर आप अपनी इच्छाओं और आशाओं या अपेक्षाओं को नियंत्रित कर सुखी जीवन जीना चाहते हैं तो आज से ही निम्न दो सूत्रों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएँ।


पहला सूत्र - इच्छाएँ/आशाएँ उतनी ही रखें, जितनी अपने दम पर पूरी कर सकें

जब-जब आप अपने सामर्थ्य के बाहर की इच्छा रखेंगे, तब-तब आप दूसरों पर निर्भर रहेंगे और जब-जब आप निर्भर रहेंगे तब-तब इच्छाओं और आशाओं के पूरा ना होने की सम्भावना बढ़ जाएगी, जो अंततः आपको उन बातों के लिए दुखी करेगी जो आपके हाथ में थी ही नहीं। इसलिए, जिस इच्छा को पूरा करना आपके सामर्थ्य से बाहर हो उसे स्वयं ही छोड़ देना दुःख से बचने और सुखी होने का मार्ग है।


दूसरा सूत्र - याद रखें, आपके लिए भी दूसरों की सभी आशाओं या अपेक्षाओं को पूरा करना सम्भव नहीं है

जिस तरह आप दूसरों से आशाएँ या अपेक्षाएँ रखते हैं ठीक उसी तरह दूसरे भी आपसे आशा और अपेक्षा रखते हैं। जब आपके लिए अपनी प्राथमिकताओं को छोड़ कर दूसरों की अपेक्षा या आशा को पूर्ण करना सम्भव नहीं है तो स्वयं सोच कर देखिए क्या ऐसा करना उनके लिए सम्भव होगा? बिलकुल भी नहीं, ऐसी अपेक्षा रखना निश्चित तौर पर आपकी बड़ी भूल ही है। इसलिए, पूर्व में मैंने कहा था, ‘अपनी इच्छाओं और आशाओं को कम किए बिना सुख पूर्वक जीना सम्भव नहीं है।’


तो आइए दोस्तों, आज से नहीं, अपितु इसी पल से ही हम सुख पूर्वक जीवन जीने के लिए अपनी इच्छाओं और आशाओं को कम कर उस स्तर तक ले जाते हैं, जहाँ उन्हें पूरा करना हमारे अपने हाथ में हो। याद रखिएगा, अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो जीवन भर दुखी ही रहेंगे और आपके दुखों को दूर करना किसी के भी बस में नहीं होगा। इसलिए दोस्तों, अपनी इच्छाओं और आशाओं को यथाशक्ति कम करना ही सुखी रहने का एकमात्र उपाय है। इसलिए आइए और आज से ही अपनी क्षमताओं को पहचानिए और उसके अनुसार इच्छाएँ रखिए और सकारात्मक रवैए के साथ कर्म करते हुए उन्हें पूरा कीजिए और अगर इच्छाओं और आशाओं को पूरा करते वक्त दूसरों का सहयोग मिल जाए तो बढ़िया, उनका आभार मानिए ; उन्हें धन्यवाद कीजिए और ना मिले तो कोई बात या शिकायत नहीं। यही तो साथियों सुखी जीवन का रहस्य है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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