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सुख, समृद्धि और शांति के लिए नीतिगत कमाएँ…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Nov 12, 2023
  • 3 min read

Nov 12, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, सर्वप्रथम तो मस्ती, ख़ुशियों और अपनों के प्यार के पर्व दीपावली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आज याने दीपावली के दिन हम सुख, समृद्धि, शांति के लिए माँ लक्ष्मी का पूजन इस आस के साथ करते हैं कि उनकी कृपा सदैव हम और हमारे परिवार पर बने रहे। इसकी मुख्य वजह कहीं ना कहीं पैसों का जीवन के हर पहलू से रचनात्मक जुड़ाव है। शायद इसीलिए कहा जाता है, ‘पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा से कम भी नहीं है!’ ऐसी स्थिति में पैसे के संदर्भ में हमारे नज़रिए का सही होना अतिआवश्यक हो जाता है, अन्यथा हम इसका उपयोग सद् कार्यों में करने के स्थान पर ग़लत कार्यों में करने लगते हैं, जिसके कारण समाज को अत्यधिक नुक़सान पहुँचता है। इसकी मुख्य वजह पैसों की मारक याने नुक़सान पहुँचाने की क्षमता का बहुत अधिक होना है। इसलिए हमें पैसों का उपयोग हर पल सचेत रहते हुए करना चाहिये। इसका सबसे कारगर तरीक़ा नैतिकता के साथ पैसों को अर्जित करना है।


जी हाँ साथियों, जब आप नैतिक तरीक़े से पैसा अर्जित करते है, तब आप उसका उपयोग अपने आप ही सद् कार्यों के लिये करने लगते हैं। नीतिगत तरीक़े से पैसा कमाना इंसान को पैसों का असली मूल्य पहचानना सिखा देता है और इंसान पैसों का दुरुपयोग करने के स्थान पर उसका उपयोग सही जगह करने लगता है। आप स्वयं सोच कर देखिए, अनीति के साथ आसानी से कमाए पैसे क्या किसी को सद् कार्यों के लिए प्रेरित कर सकते है? मेरी नज़र में तो बिलकुल भी नहीं क्योंकि इसको कमाते समय व्यक्ति किसी ना किसी इंसान का या तो शोषण करता है या फिर उत्पीड़न और जहाँ शोषण और उत्पीड़न होगा वहाँ सद् कार्यों वाली सोच का होना संभव ही नहीं है।


इसे दूसरे नज़रिए से देखा जाये तो शोषित या उत्पीड़ित व्यक्ति को जब ख़ुद के ठगे जाने का एहसास होता है और वह ठगने वाले व्यक्ति को मज़े करते हुए देखता है, तो उसका पूरे समाज पर से ही विश्वास उठने लगता है और वह सद्कर्म, नैतिकता और आस्तिक सोच के प्रति विद्रोह की भावना से भर जाता है। जिसका परिणाम अंततः पूरे समाज को ही नुक़सान पहुँचाने लगता है। अर्थात् उसका विक्षोभ सारी मानव सभ्यता के लिए घातक परिणाम उत्पन्न कर सकता है और यह समय के साथ बढ़ता ही जाता है। इसकी मुख्य वजह नकारात्मक अनुभवों के कारण धर्म और ईश्वर से विश्वास उठना रहती है। ऐसा इंसान अपने से छोटों के साथ दुर्व्यवहार करना आरंभ कर सकता है। इस प्रकार समाज में बुराई बढ़ने लगती है और अच्छाई कम होने लगती है।


याद रखियेगा, बुराई से केवल बुराई बढ़ती है। धन यदि बुरे माध्यम से कमाया गया है तो उसे व्यक्ति खर्च भी ग़लत तरीक़े से ही करेगा। याने जिसने धूर्ततापूर्वक पैसा कमाया है, उसे पैसों को कहीं भी खर्च करना बुरा नहीं लगेगा। इसके विपरीत जिसने पसीना बहाकर पैसा कमाया है, वह उसे खर्च भी ध्यान से करेगा याने पैसों का दुरुपयोग उसे दर्द देगा। यही बात उसे बार-बार सोचने के लिए मजबूर करेगी कि उसे पैसों को कितनी मात्रा में कब और कहाँ खर्च करना है। इसका अर्थ हुआ हराम की कमाई आडंबर बनाने, ढोंग रचने और विलासिता के प्रसाधन जमा करने में ही खर्च होती है और ऐसे व्यक्ति के पीछे अनेकों व्यसन लग जाते हैं। जिनमें धन के साथ-साथ व्यक्ति का शरीर और मन भी ख़राब होने लगता है जो अंततः उन्हें अनेकों विपत्तियों और व्यथाओं में उलझाता है। इस आधार पर कहा जाए तो अनुचित कमाई अपना क्षणिक चमत्कार दिखाकर अंततः मनुष्य के भविष्य को अंधकारमय बनाने वाली ही सिद्ध होती है।


इस आधार पर कहा जाए तो धन याने पैसों के होने का महत्व तभी है जब वह नीति पूर्वक कमाया गया हो और उसे सद् कार्यों के लिये उचित तरीक़े से खर्च किया गया हो। अपने और अपने परिवार के सुख, समृद्धि और शांति के लिए आईए इस दीपावली हम सभी माँ लक्ष्मी के समक्ष प्रण लेते हैं कि आज नहीं अभी से ही नीतिगत तरीक़े से धन अर्जित करेंगे और उसका उपयोग सद् कार्यों के लिए उचित तरीक़े से करेंगे। एक बार पुनः आप सभी को दीपावली की शुभकामनाएँ!!!


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

 
 
 

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