सेवा कीजिए, और जीवन को सार्थक बनाइए !!!
- Nirmal Bhatnagar

- Jul 16, 2025
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Jul 16, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है...

आइए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत टैप, ज्ञान और सेवा की सच्ची समझ पर आधारित एक कहानी से करते हैं। बात कई सौ साल पुरानी है। गाँव के बाहरी इलाक़े में, जंगल के मुहाने पर साधु तपस्या किया करते थे। वैसे तो साधु कई शास्त्रों के ज्ञाता, श्लोकों के जादूगर होने के साथ-साथ कई विधाओं में महारत रखते थे। उनका पूरा समय भगवान की भक्ति में लीन रहते हुए बीतता था। इसलिए वे लोगों के लिए एक आदर्श व्यक्तित्व के मालिक होने के साथ-साथ श्रद्धा के प्रतीक थे।
प्रभु की भक्ति में मगन रहने की अपनी आदत की वजह से वे कभी किसी की सेवा या मदद नहीं कर पाते थे। उनका मानना था कि सेवा से ज्ञान नहीं मिलता और भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है। वे किसी को दुःख नहीं देते थे, पर किसी का भला भी नहीं करते थे। एक दिन, जब वे वटवृक्ष के नीचे ध्यानमग्न थे, तभी उनकी मृत्यु हो गई और फिर परलोक में उनका सामना भगवान चित्रगुप्त से हुआ। भगवान चित्रगुप्त ने बड़े आदर के साथ उनसे कहा, “हे संत! तुम्हारी तपस्या को देखकर तुम्हें प्रतिष्ठित कुल में जन्म दिया जाएगा।” भगवान चित्रगुप्त को बात सुन संत हैरान हुए और बोले, “प्रभु! मैंने तो हर नियम का पालन किया। फिर मुझे मोक्ष क्यों नहीं मिला?”
संत का सवाल सुन भगवान चित्रगुप्त मुस्कुराए और उन्हें धर्मराज के दरबार में लेकर गए। धर्मराज ने मुस्कराते हुए साधु की ओर देखा और बोले, “वत्स! तुमने कभी किसी भूखे को अन्न नहीं दिया, किसी रोगी को दवा नहीं दी, किसी अज्ञानी को ज्ञान नहीं बाँटा और ना ही तुमने अपनी विविध विधाओं से मानवता का भला किया। अर्थात् तुमने तप तो किया, पर परोपकार नहीं। तुम मानव धर्म को ही नहीं समझ पाये। वत्स मानव का असली धर्म ‘सेवा' है।
धर्मराज की बातों से साधु की आँखें खुल गई और उन्हें आत्मबोध हुआ और अगले जन्म में उन्होंने जीवन को तप और सेवा दोनों का मेल बना लिया। वर्षों बाद, उन्होंने अपने जीवन को समर्पण और परोपकार में बदलकर अंततः मोक्ष प्राप्त किया। दोस्तों, शायद इसीलिए कहा गया है, ‘ख़ुद के लिए जिए, तो क्या जिए, तू जी ए दिल जमाने के लिए!’ सीधे शब्दों में कहूँ तो साथियों, तो सिर्फ़ ख़ुद के लिए जीना; ख़ुद को ही बेहतर बनाने का प्रयास करना, ख़ुद को सुधारना काफ़ी नहीं है। जब तक हम किसी ओर की पीड़ा नहीं समझते; किसी ओर के जीवन को बेहतर नहीं बनाते, तब तक हमारी साधना अधूरी है या सीधे तौर पर कहूँ तो तब तक इंसान होते हुए भी हमारा इंसान बनना बाक़ी है। वैसे भी मुसीबत के समय किसी को सहायता प्रदान करके उसके दुख का निवारण करने से खुद को जो सुख की अनुभूति होती है, उस खुशी का कोई ठिकाना नहीं होता।
याद रखियेगा दोस्तों, सेवा के बिना साधना अधूरी है, दान के बिना धर्म अधूरा है और परोपकार के बिना मोक्ष अधूरा है। तो चलिए, आज हम ये संकल्प लेते हैं कि आज से हम सिर्फ भक्ति नहीं, बल्कि किसी के लिए उपयोगी बनकर, मानव धर्म निभाकर अपने जीवन को सच्चा अर्थ देंगे क्योंकि मानवता की सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति और सेवा है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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