सेवा के लिए धन नहीं, करुणा और संवेदना चाहिए…
- Nirmal Bhatnagar

- Aug 22, 2025
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Aug 22, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, विश्वास कीजियेगा ईश्वर के यहाँ सेवा का मूल्य, भावना से आँका जाता है ना कि उसमें लगने वाले संसाधनों से। उक्त विचार मुझे हाल ही में एक आयोजन में सम्मिलित होते वक्त मन में आए जहाँ भावनाओं से ज़्यादा ध्यान पैसों पर था जिससे आयोजन और व्यवस्थाओं को भव्य बनाया जा सके; जहाँ साधारण और वीआईपी लोगों के लिए प्रथक व्यवस्थाएँ की जा सकें।वैसे इसमें आश्चर्य की कोई बात भी नहीं थी क्योंकि अक्सर यह माना भी जाता है कि सेवा करने के लिए हमारे पास धन होना चाहिए, बड़ा आयोजन होना चाहिए या बहुत सारी व्यवस्थाएँ चाहिए। लेकिन सच्चाई वाक़ई इसके विपरीत है, ईश्वर के यहाँ सेवा का मूल्य उसके आकार से नहीं, बल्कि भावना से आँका जाता है।
सोच कर देखियेगा, अगर आप किसी भूखे को एक रोटी भी दे दें, तो क्या वह उसके लिए किसी भव्य भंडारे से कम होगा? इसी तरह अगर किसी प्यासे को एक गिलास पानी देना, क्या भंडारे में छप्पन भोग खिलाने से कम होगा? दोस्तों, मेरी नजर में तो सेवा का अर्थ है, दूसरे की आवश्यकता को अपने सामर्थ्य के अनुसार पूरा करना क्योंकि सेवा में मात्रा नहीं, भावना मायने रखती है।
इस आधार पर कहा जाए तो हर इंसान अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा कर सकता है। जैसे घर की छत पर कुछ दाने चिड़ियों के लिए डालकर या चींटियों के रास्ते पर थोड़ी सी शक्कर बिखेर कर या फिर किसी गाय को रोटी या किसी प्यासे जीव को पानी पिलाकर कोई भी इंसान छोटे-छोटे भंडारे कर सकता है। यकीन मानियेगा यह सब भी सेवा है और बिना प्रचार-प्रसार के भी इसकी गूँज ईश्वर तक पहुँचती है।
दोस्तों, आजकल लोग सेवा करते हैं तो सोशल मीडिया पर पोस्ट, फोटो, खबरों, बैनर और पोस्टरों के माध्यम से उसका प्रचार भी करते हैं। लेकिन सच्ची सेवा वही है जो शांतिपूर्वक और निस्वार्थ भाव से की जाए। मेरी नजर में तो जब बिना निमंत्रण, बिना शोर और बिना किसी अपेक्षा के कोई जीव आपका दिया हुआ भोजन ग्रहण कर लेता है तब ही आपको सबसे सच्चा पुण्य मिलता है। याद रखियेगा, जो सेवा गुप्त होती है, वही सबसे पवित्र होती है।
अगर हम सब इस सोच को मानेंगे तो हर किसी के लिए बिना पैसों और संसाधनों के सेवा करना संभव होगा और हाँ इस सच्चाई को भी याद रखियेगा कि एक छोटी सी मुस्कान भी सेवा है। इसी तरह किसी निराश व्यक्ति को प्रोत्साहन देना और किसी की समस्या ध्यान से सुन लेना भी सेवा है। अर्थात् अपनी दिनचर्या में थोड़ी-सी करुणा जोड़ना, आपके सामान्य कार्यों को सेवा बना सकता है।
दोस्तों, आधुनिक शिक्षा के साथ करुणा के कुछ कार्यों को आधुनिक शिक्षा से जोड़कर हम इसे बच्चों को सीखा सकते हैं। हम उन्हें बता सकते हैं कि आज की तेज़ और व्यस्त जीवनशैली में भी बिना बड़े आयोजन या बिना बड़े दान के भी सेवा की जा सकती है। इसके लिए हमें बच्चों की दिनचर्या में पेड़ों को पानी देना; अनुचित जगह पर पड़े कचरे को उठाकर डस्टबिन में डालना या किसी ज़रूरतमंद को पुराने खिलौने, कपड़े, किताबें या अन्य सामान देना, जैसी बातों को जोड़ना होगा। आपके ऐसा करने से समाज की बहुत-सी समस्याएँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी।
दोस्तों, अंत में इतना ही कहूँगा कि सेवा का असली अर्थ मन की विशालता है। इसमें बड़ा आयोजन, ढेर संसाधन, बहुत सारा धन नहीं बल्कि थोड़ी सी करुणा और संवेदना के साथ सिर्फ़ बड़े मन की जरूरत होती है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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