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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

सेवा से बढ़ायें अपने जीवन का मूल्य !!!

July 27, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, देने के लिए संसाधन से ज़्यादा इच्छा की आवश्यकता होती है। जी हाँ, अक्सर हम सब सोचते हैं कि पहले बड़े आदमी बन जायें, फिर मानवता की सेवा करेंगे। लेकिन जीवन से मिले अनुभव से मैंने सीखा है कि बड़ा बनने का सूत्र इसका ठीक उलट है, उसके अनुसार हम मानवता की सेवा कर ही बड़े बन सकते हैं।


अपनी बात को मैं आपको बैंगलोर से 350 किमी दूर एक बहुत ही छोटे से गांव न्यू पडपू के एक ग़रीब परिवार में जन्में श्री हरेकला हजब्बा की कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ। गाँव में स्कूल ना होने के कारण हरेकला हजब्बा पढ़ नहीं पाये और पारिवारिक ज़रूरतों और सामयिक स्थितियों के कारण उन्होंने कम उम्र से ही मेहनत-मजूरी कर अपने परिवार की मदद करना शुरू कर दिया।


समय के साथ बढ़ती ज़िम्मेदारियों के बीच वर्ष 1977 में वे मैंगलौर आ गये और यहाँ के बस डिपो पर फल बेचने का कार्य शुरू कर दिया, जो आज तक जारी है। वर्ष 1978 में एक दिन एक अंग्रेज ने उनसे अंग्रेज़ी में कुछ पूछा, शायद वह उनसे नारंगी लेना चाहता था। लेकिन हिन्दी अथवा अंग्रेज़ी ना आने के कारण हरकेला उनकी मदद नहीं कर पाये। इस बात का उन्हें काफ़ी दुख हुआ जिसकी वजह से वे काफ़ी उदास और परेशान रहे। लेकिन इस घटना ने उन्हें शिक्षा के महत्व को समझा दिया और सिर्फ़ कन्नड़ भाषा जानने वाले हरकेला ने अपने गाँव न्यू पडपू में एक विद्यालय खोलने का निर्णय लिया। इसके पीछे उनका मक़सद एकदम साफ़ था, ‘गाँव का कोई भी बच्चा अपने जीवन में अज्ञानता या अशिक्षा के कारण परेशान न हो।’ मज्जिद के पास एक कमरे में शुरू किए गये इस विद्यालय में जल्द ही 28 बच्चों ने पढ़ना शुरू कर दिया।


आगे बढ़ने से पहले दोस्तों, यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि हरेकला ने यह सपना मात्र 100 से 150 रुपये प्रतिदिन की अपनी आमदनी से अपने 5 लोगों के परिवार की ज़रूरतों को पुरा करते हुए किया। आवश्यकता पड़ने पर कई बार उन्हें लोगों से पैसे भी उधार लेने पड़े। लेकिन उनके निस्वार्थ प्रयासों को देख कुछ लोगों ने उनकी मदद भी करी। जब उनके असाधारण प्रयास को स्थानीय समाचार पत्र समाज के सामने लाये तो राज्य सरकार ने उन्हें एक लाख रुपये का अनुदान भी दिया। आज उनका यह विद्यालय १७५ बच्चों को कक्षा दसवीं तक की शिक्षा दे रहा है।


शिक्षा के जरिए सामाजिक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिये श्री हरेकला हजब्बा को 8 नवंबर 2020 को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्मश्री से सम्मानित किया गया। लक्ष्य के प्रति उनके समर्पण का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि इनाम में मिलने वाली सारी रक़म का उपयोग भी उन्होंने विद्यालय के लिये ज़मीन लेने और बिल्डिंग बनाने के लिये किया। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से मुलाक़ात के दौरान उन्होंने निवेदन किया कि वे कक्षा 11 और 12 के छात्रों के लिए उनके गांव में एक सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज का निर्माण करवायें।


दोस्तों, उनके द्वारा किए गये इस असाधारण कार्य के परिपेक्ष्य में अगर मैं अपनी शिक्षा, किए गये कार्य, व्यवसाय, निवेश, अनुभव या जमा पूँजी किसी को भी देखता हूँ तो स्वयम् को बहुत पीछे पाता हूँ। याने मुझे अपना कार्य कहीं से भी प्रभावशाली नहीं दिखता है। हालाँकि यह भी सही है कि मैं बहुत भाग्यशाली हूँ और ईश्वर की मेरे उपर विशेष कृपा है। तभी तो आज मेरे पास एक खुशहाल परिवार, अच्छी आय, बैंक बैलेंस, भौतिक सुख-सुविधा, अच्छा व्यवसाय, कुलीन दोस्त और गर्व करने लायक़ कुछ उपलब्धियाँ हैं। निश्चित तौर पर ईश्वर ने सब कुछ आवश्यकता से अधिक दिया है। लेकिन मुख्य प्रश्न यह है कि क्या मैं इतना सब होने के बाद भी समाज के प्रति अपने दायित्व को निभा पा रहा हूँ? शायद नहीं, हरकेला के जीवन को देख कर तो ऐसा ही लगता है।


आप स्वयम् सोच कर देखिये दोस्तों, एक तरफ़ एक इंसान 100-150 रुपये प्रतिदिन कमाकर एक स्कूल का निर्माण कर देता है और दूसरी तरफ़ हम सब कुछ होने के बाद भी नई गाड़ी, नया घर या वर्ल्ड टूर आदि के प्लान में ही उलझे हैं। असल में उनका लक्ष्य बहुत बड़ा था। जिसके कारण उन्होंने सामान्य जीवनशैली को चुनौती दी और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर अपने सपने को पुरा किया। उनके जीवन को देख लगता है, हमने ईश्वर के आशीर्वाद से मिले अच्छे ख़ासे जीवन को जटिल और अव्यवस्थित बना दिया है। जहाँ अहंकार ही अहंकार है, जिसके कारण हम ज्यादातर समय उलझनों से भरे रहते हैं और हर चीज या कमी के लिये दोष देते या शिकायत करते नज़र आते हैं। मुझे उम्मीद है साथियों कि हम हरेकला हजब्बा के जीवन से प्रेरणा लेकर इस बात को स्वीकारेंगे कि मानवता की सेवा के लिये संसाधन नहीं, दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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