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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

स्वार्थी नहीं परोपकारी बनें…

Feb 25, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, मेरा मानना है, इंसान, इंसान के रूप में जन्म लेने से इंसान नहीं बनता। सहमत ना हों तो अपने आस-पास ज़रा ध्यान से देखिएगा, आपको इंसान के रूप में पत्थर दिल लोग भी मिल जाएँगे। हक़ीक़त में तो साथियों इंसान को उसके कर्म अर्थात् इंसानियत के साथ किया गया कार्य, इंसान बनाता है। इसीलिए मैं कहता हूँ, इंसान का असली परिचय उसका व्यवहार ही रहता है। जी हाँ साथियों, हम किसी भी इंसान को उसके पद, पैसे या सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से याद नहीं रखते बल्कि हम उसे उसके व्यवहार या किए गए कार्य के कारण याद रखते है।


आपका कार्य, आपका व्यवहार, आपके संस्कार से तय होता है क्योंकि आपके संस्कार आपके विचारों को दिशा देते हैं और आपके विचार आपके जीवन की दिशा और दशा तय करते हैं। इसलिए दोस्तों इंसान के रूप में जन्म लेने के बाद, इंसान बनने या बने रहने के लिए हमें बार-बार आत्मनिरीक्षण करना चाहिए; खुद से प्रश्न करना चाहिए की मेरे संस्कार, मेरे विचार कैसे हैं? जी हाँ साथियों, हम भटक ना जाएँ इसलिए बार-बार खुद के अंदर झांक कर देखना चाहिए की हमारे अंदर स्वार्थ ज़्यादा है या परमार्थ, हमें सही राह पर बने रहने में मदद करता है। ऐसा करना हमें सही स्थिति का एहसास करवा देता है। यदि हमें सेवा कार्य, दान-धर्म, पीड़ित मानवता के प्रति दया का भाव, परोपकार की भावना, अपने कार्य को पूर्णता से करने में आनन्द आता हो, तो आप सही दिशा में चल रहे हैं और अगर आपको लगता है कि स्थितियाँ ऐसी नहीं है तो ऐसी स्थिति बनाने को प्राथमिकता दें।


दोस्तों, स्वार्थ पूर्ति के लिए कार्य करना ना सिर्फ़ दूसरों के लिए बल्कि आपके स्वयं के लिए भी दुखदायक होता है। इसके विपरीत दूसरों को दुःख में देखकर उनके प्रति सहानुभूति रखना, उनके दुःख को दूर करने के लिए पुरुषार्थ करना, परोपकार की भावना से कार्य करना आपको ईश्वरीय आनन्द की अनुभूति करवाने के साथ-साथ समाज के लिए भी लाभदायक होता है। यही तो साथियों ईश्वर का नियम है; ‘जो व्यक्ति दूसरों के प्रति दया का भाव रखेगा, ईश्वर उसी को सुख देगा।’ इस नियम पर गम्भीरता के साथ विचार करना, उसे अमल में लाना आपके जीवन को आपकी इच्छा के अनुरूप बना सकता है।


जी हाँ साथियों, अगर आप सही मायने में सुख का अनुभव करना चाहते हैं तो अपने स्वार्थ को धीरे-धीरे कम करते हुए छोड़ दें। अपनी बुरी आदतों, बुरे संस्कारों का विरोध स्वयं करें। याद रखिएगा, ‘हम सुधरेंगे, तो जग सुधरेगा।’ क्योंकि जब तक हम खुद सुधारना ना चाहें हमें कोई सुधार नहीं सकता है। इसलिए अपने अंदर अच्छे विचारों को जन्म दें, अच्छे संस्कारों का पालन करें, परोपकार की राह पर चलते हुए सद्कर्म करें। आपको बदला हुआ, सुधरा हुआ देखकर, दूसरा भी सुधरेगा। उसे ईश्वर का नियम व परोपकार की शक्ति का एहसास हो जाएगा वह सोचेगा कि ‘यह व्यक्ति परोपकार कर इतना बड़ा और सुखी बना है, तो मैं भी अपने में परिवर्तन लाकर ऐसा बन सकता हूँ।’


तो आइए दोस्तों आज और अभी से खुद को संतुष्ट और सुखी और इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए ईश्वर, गुरु और विद्वानों की सहायता से अपने अंदर उत्तम संस्कारों को जगाते हैं, उन्हें बढ़ाते हैं और सिर्फ़ परिवार, रिश्तेदार और मित्र ही नहीं बल्कि समाज के साथ स्वार्थ को छोड़ परोपकार की भावना के साथ व्यवहार करते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर


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