• Nirmal Bhatnagar

‘हाँ’ के समान ही करें ‘ना’ का सम्मान !!!

Updated: Jul 10

July 9, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, अक्सर आपने देखा होगा किसी के द्वारा कही गई एक ‘ना’ अच्छे ख़ासे रिश्ते को मुश्किल में डाल देती है। इसकी सबसे बड़ी वजह दूसरे की ‘ना’ को अपनी बेइज़्ज़ती मानना या सामने वाले को बदतमीज़ या मतलबी मानने की गलत सोच का होना है। वैसे इसे आप ग़लत अपेक्षाओं का नतीजा भी मान सकते हैं। वैसे यही ग़लत अपेक्षाएँ आपके मन, मस्तिष्क दोनों को ही नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। आईए, इसे मैं आपको एक बहुत ही सुंदर कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ-


सभी जानवरों की ही तरह सुंदरवन में बारिश से अपने परिवार व अंडों को सुरक्षित रखने के लिए गौरैया भी अपने घोंसले के लिए एक अच्छा सा स्थान तलाश कर रही थी। काफ़ी दिनों तक भटकने के बाद उस गौरैया ने घोंसला बनाने के लिए दो पेड़ों को चिन्हित किया और उनमें से पहले के पास जाकर बोली, ‘मैं अपने परिवार और खुद की सुरक्षा के लिए आपसे मदद चाहती हूँ। कृपया अपनी टहनी के ऊपर घने पत्तों के बीच मुझे अपना घोंसला बनाने के लिए थोड़ा सा स्थान दे दें।’


गौरैया की बात सुनते ही पहले पेड़ ने उसे आश्रय देने से इनकार कर दिया। पेड़ का ‘ना’ कहना गौरैया को बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा। उसके मन में तमाम बातें आ रही थी जैसे, ‘हम जो बीज चुग कर लाते हैं उन्हीं से तो इनका जन्म होता है, लेकिन आज देखो, बड़ा हो गया है तो अकड़ दिखा रहा है। आदि…’ नकारात्मक बातों को सोचते-सोचते निराशा से भरी गौरैया ने दूसरे पेड़ से भी बात करने का निर्णय लिया। वह तुरंत उड़कर दूसरे पेड़ के पास पहुँची और अपने प्रश्न को दोहरा दिया, दूसरे पेड़ ने गौरैया के निवेदन को स्वीकार लिया और उसे अपनी शाख़ पर घोंसला बनाने की इजाज़त दे दी।


गौरैया ने उसी पल दूसरे पेड़ पर अपना घोंसला बनाना प्रारम्भ कर दिया और उसे बारिश से पूर्व पूर्ण कर, अपने रहने, खाने का इंतज़ाम किया और घोंसले में अंडे दिए। कुछ ही दिनों बाद बारिश का मौसम शुरू हो गया। बारिश की पहली झड़ी आँधी के साथ आई और वह इतनी तेज थी कि उसमें पहला पेड़, जिसने गौरैया को आश्रय देने से मना करा था, गिर गया और बाढ़ में बहने लगा।


पेड़ को गिरता देख गौरैया ने उसे ताना मारते हुए कहा, ‘मिल गया ना तुम्हें अपने कर्मों का फल। तुम दूसरों को आश्रय नहीं दे रहे थे इसलिए तुम्हें ईश्वर ने यह सजा दी है।’ गौरैया की बात सुन पेड़ मुस्कुराया और बोला, ‘ऐसी बात नहीं है, मुझे पता था कि इस बरसात के मौसम में मेरा बचना मुश्किल है, इसलिए मैंने आपको आश्रय देने से इनकार किया। मैं तो बस आपकी और आपके बच्चों की जान जोखिम में नहीं डालना चाहता था।’ पेड़ आगे कुछ और कह पाता इतनी देर में बाढ़ के पानी की एक तेज़ लहर आई और उसे बहाकर अपने साथ ले गई।


पेड़ की बात सुन अब गौरैया की आँखों में आंसू थे। वह जानती थी वह और उसके बच्चे आज जीवित क्यूँ बचे हैं। गौरैया की ही तरह अक्सर हम दूसरों की ‘ना’ को अपनी तौहीन या बेइज़्ज़ती मान लेते हैं और अच्छे ख़ासे रिश्ते को ख़राब कर बैठते हैं। दोस्तों, अगर आप जीवन को पूर्णता के स्तर पर जीना चाहते हैं तो आपको जीवन में हर पल जागरूक रहते हुए, जीना सीखना होगा और बिना सोचे-विचारे प्रतिक्रिया देने या धारणा बनाने से बचना होगा। आईए, अब हम ‘हाँ’ की ही तरह ‘ना’ का सम्मान करना सीखने के लिए आवश्यक 5 सूत्र संक्षेप में जान लेते हैं-


पहला सूत्र - ‘ना’ को सामने वाले व्यक्ति का अहंकार ना समझें क्यूँकि आपको ‘ना’ कहने के पीछे की कहानी नहीं पता है।


दूसरा सूत्र - जिस तरह आप अपना जीवन, अपने नियमों या इच्छाओं के आधार पर जीना चाहते हैं, ठीक उसी तरह सामने वाले व्यक्ति के पास भी अपने जीवन को अपनी इच्छाओं या नियमों के तहत जीने का अधिकार है। उसके इस अधिकार का सम्मान करना सीखें। दूसरे शब्दों में कहूँ तो दूसरे के फ़ैसले का सम्मान करना सीखें फिर भले ही वह आपके पक्ष में हो या नहीं।


तीसरा सूत्र - हम अपनी समस्याओं या प्राथमिकताओं में इतने उलझ जाते हैं कि स्थिति को सामने वाले के नज़रिए से देख ही नहीं पाते हैं। कोई भी धारणा बनाने या अपना फ़ैसला सुनाने के पहले सामने वाले व्यक्ति की भावना, मजबूरी अथवा परेशानी को समझने का प्रयास करें, हो सकता है आपकी धारणा या लिया गया निर्णय बदल जाए, जिस तरह गौरैया के साथ हुआ था।


चौथा सूत्र - याद रखें, जीवन में जो कुछ घट रहा है, आपके भले के लिए घट रहा है। इसलिए हर ‘ना’ के पीछे क्या अच्छा है, देखने का प्रयास करें।


पाँचवाँ सूत्र - ‘मन का हो तो अच्छा, नहीं तो हरी इच्छा!!!’ के सूत्र को अपना जीवन सूत्र मानते हुए जीवन में घटने वाली घटनाओं को स्वीकारना शुरू करें, फिर भले ही वह ‘ना’ क्यों ना हो।


अंत में इतना ही कहूँगा दोस्तों, बिना किसी द्वेष या पूर्वाग्रह के, सर्वशक्तिमान के संकेत के रूप में, दूसरे व्यक्ति की ‘ना’ को ख़ुशी से स्वीकारना अंततः आपके जीवन को ही बेहतर बनाता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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