फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

आदत बनाम आचरण

आदत बनाम आचरण
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Dec 9, 2021

आदत बनाम आचरण !!!


दोस्तों, जीवन में कई बार आपका पाला ऐसे लोगों से पड़ जाता है जो आपके लाख भला करने के बाद भी आपको छलने, धोखा  देने से बाज़ नहीं आते हैं और इससे भी बड़ी बात तो यह है कि धोखा देने के बाद जब इन्हें आपकी ज़रूरत अगली बार फिर पड़ती है तो यह रो-गा कर एक बार फिर आपको विश्वास करने के लिए मजबूर कर लेते हैं। आप सोचते हैं, ‘अब वो शायद सुधर गया होगा’ और वह आपको धोखा देकर या लूटकर अथवा चोट पहुँचाकर अपना काम निकालने की योजना बना रहा होता है।


बार-बार एक ही व्यक्ति से अथवा एक ही तरीक़े से धोखा खाकर अकसर लोग ख़ुद को ही दोषी मान लेते हैं और इस गलती के लिए खुद को भी माफ़ नहीं कर पाते हैं और साथ ही अच्छे लोगों पर भी विश्वास करना बंद कर देते हैं। दूसरों की गलती के लिए क्या खुद को सजा देना उचित है? बिलकुल नहीं… तो फिर क्या किया जाए? चलिए, पहले स्थिति को एक कहानी से समझते हैं…


बात कई वर्ष पुरानी है, रामपुर के घने जंगलों के बीच से एक बहुत ही उथली और तेज़ बहाव वाली नदी बहा करती थी। इस नदी को पार करना हर किसी के बस का नहीं था। एक बार जंगल के एक हिस्से में आग लग गई, सभी जानवर जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे। उसी जंगल में रहने वाले एक समझदार हाथी ने सभी जानवरों को सलाह दी कि अगर जान बचाना चाहते हो तो किसी भी तरह नदी के उस पार पहुँचो। 


हाथी द्वारा दी गई सलाह सभी जानवरों को पसंद आ गई और सभी जानवर एक-दूसरे की मदद से सफलता पूर्वक नदी पार करके दूसरी ओर आ गए, सिवाय एक बिच्छू के। बिच्छू की डंक मारने की आदत की वजह से कोई भी उसे अपने साथ ले जाने के लिए तैयार नहीं था। नदी किनारे एक कछुए को देख वह गिड़गिड़ाने लगा, उससे मदद की गुहार लगाते हुए बोला, ‘कछुए भाई अब तुम ही मेरी आख़री उम्मीद हो। तुम्हें तो पता ही है मैं एक बुरा तैराक हूँ कृपया करके अपनी पीठ पर बैठाकर मुझे नदी के उस पार छोड़ दो।’


उसकी बात सुनते ही कछुआ जोर से हंसते हुए बोला, ‘पागल थोड़ी हो गया हूँ जो तुम्हारी जान बचाने के प्रयास में अपनी जान दांव पर लगा दूँगा। जब मेरा पूरा ध्यान तैरने पर होगा तब तुम मुझे डंक मार दोगे और मैं तुम्हारे ज़हर की वजह से डूब जाऊँगा।’ कछुए की बात सुन अपने हाथ जोड़ते हुए बिच्छू बोला, ‘कछुए भाई, तुम्हें अगर मैं तैरते वक्त डंक मारूँगा तो क्या मैं बच पाऊँगा?  तुम्हारी बात तुम्हें ही तर्क संगत लगती है क्या? वैसे भी तुम मेरी जान बचा रहे हो, इस बात का एहसास है मुझे।’

  

बिच्छू की बात सुन कछुए का दिल पसीज गया, उसे अपने व्यवहार पर ग़ुस्सा आ रहा था और वह रोने लगा। रोते-रोते ही वो किनारे के एकदम पास आया और बिच्छू से बोला, ‘माफ़ करना भैया मैं ग़लत सोच में पड़ गया था। आओ मेरी पीठ पर बैठ जाओ मैं तुम्हें नदी पार करवा देता हूँ। बिच्छू के पीठ पे चढ़ते ही कछुए ने तैरना शुरू कर दिया।


बढ़िया मीठी-मीठी बात करते-करते वे अभी आधी से थोड़ी सी ज़्यादा नदी ही पार कर पाए थे कि बिच्छू ने कछुए को घातक तरीक़े से डंक मार दिया। डंक मारते ही कछुए पर मूर्छा छाने लगी और वह डूबने लगा। बड़ी मुश्किल से अपनी बची शक्ति इकट्ठे करते हुए वो बिच्छू से बोला, ‘तुम तो अभी तर्कों के साथ इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे। धर्म की दुहाई दे रहे थे, फिर तुमने ऐसा क्यूँ किया?’ कछुए के साथ ही डूबता हुआ बिच्छू बड़े उदास स्वर में बोला, ‘मेरे डंक मारने का तर्कों से कोई लेना-देना नहीं है। यह सिर्फ़ मेरा चरित्र है।’


वैसे तो दोस्तों आप समझ ही गए होंगे लेकिन फिर भी संक्षेप में इस पर चर्चा कर लेते हैं। अकसर इंसान के रूप में भी बिच्छू की प्रजाति के लोग पाए जाते हैं, जो आपके द्वारा विश्वास करने पर आपको धोखा दे सकते है, छल सकते हैं, आपके साथ ग़लत व्यवहार कर सकते हैं। 


अगर कोई आपके साथ ऐसा कर रहा है तो सबसे पहले उसे माफ़ कर दें। इसलिए नहीं कि आप बहुत बड़े हो गए हैं बल्कि इसलिए कि अनावश्यक रूप से आपके दिल पर कोई बोझ ना रहे, आप नकारात्मक भाव से मुक्त रहें। इसके बाद पता करने की कोशिश करें, ऐसा करना उसकी मजबूरी थी या उसका चरित्र ऐसा है। अगर चरित्र ऐसा है तो उससे परिचय तक बात सीमित रहने दें। लेकिन अगर उसने मजबूरी में ग़लत किया था तो आप समय और आवश्यकतानुसार अपने विवेक से निर्णय ले सकते हैं। लेकिन दोस्तों सबसे बेहतर उपाय तो यही है कि माफ़ करें लेकिन अगला मौक़ा ना दें।


-निर्मल भटनागर

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