फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

आपकी संगति, आपकी पहचान

आपकी संगति, आपकी पहचान
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Mar 1, 2012
आपकी संगति, आपकी पहचान

आज काउन्सलिंग के दौरान एक बच्चे ने मुझसे प्रश्न करा, “सर, मेरे माता-पिता हमेशा मेरे दोस्तों के पीछे क्यों पड़े रहते हैं?” मैं उसका प्रश्न पूरी तरह समझ नहीं पाया। मैंने उस बच्चे से थोड़ा विस्तार में बताने के लिए कहा।बच्चे से विस्तार में बात करने पर मुझे दो बातों का एहसास हुआ, पहला बच्चा पढ़ाई में अच्छा था। दूसरा, पिता के अनुसार उसकी संगत अच्छी नहीं थी। मैंने उस बच्चे से कहा, “मुझे यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई कि तुम पढ़ने में बहुत अच्छे हो। लेकिन दूसरी बात के लिए ना तो मैं तुम्हें कुछ कहूँगा, ना ही तुम्हारे पिता को। मैं तुम्हें बस एक कहानी सुनाता हूँ, उसके बाद तुम खुद निर्णय लेना तुम क्या चाहते हो? इतना कहकर मैंने कहानी सुनाना शुरू किया।

एक बार राजा अपने कुछ साथियों के साथ शिकार करने के लिए जंगल में गया। शिकार का पीछा करते करते वे सब घने जंगल में चले गए। संध्या का समय पास आता देख राजा ने लौटने का निर्णय लिया लेकिन थोड़ी ही देर में उसे एहसास हुआ कि वो रास्ता भटक गए हैं। राजा और उसके सभी साथी अब भूख से भी परेशान हो रहे थे इसलिए उन्होंने सुरक्षित स्थान खोज कर रात वहीं रुकने का निर्णय लिया।

कुछ ही देर में उन्हें एक गुफा दिखाई दी, सभी को लगा कि रात रुकने के लिए यह स्थान सुरक्षित रहेगा। वे सभी उस ओर बढ़ने लगे।जैसे ही वे उस गुफा के क़रीब पहुँचे पास के पेड़ पर बैठा तोता ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगा, ‘पकड़ो-पकड़ो हमारे इलाक़े से यह राजा कितना सामान लेकर जा रहा है। लूट लो सब कुछ।’ तोते की आवाज़ सुन राजा और उसके साथी घबरा गए और वे  वहाँ से जान बचाकर भागने लगे।

काफ़ी दूर तक भागते रहने की वजह से वे थकने लगे थे। सुरक्षित स्थान देख उन्होंने एक पेड़ के नीचे रुकने का निर्णय लिया। वे सब पेड़ के नीचे पहुँचे और पानी पीकर अपनी थकान मिटाने का प्रयास करने लगे। तभी उस पेड़ पर बैठे हुए तोते ने बड़ी मीठी आवाज़ में कहा, “नमस्कार राजन, पधारिए, हमारे गुरु महाराज की कुटी में आप सभी का स्वागत है। सर्वप्रथम पानी पीजिए, फिर हाथ-मुँह धोकर थोड़ा रिलैक्स कीजिए, तब तक भोजन तैयार हो जाएगा फिर आप सभी विश्राम कर लीजिएगा।’ तोते की वाणी सुन सभी आश्चर्यचकित रह गए। राजा के मन में कई तरह के सवाल आ रहे थे, जैसे, एक ही जाति के, एक ही जैसे दिखने वाले दो तोतों के व्यवहार में इतना अंतर कैसे हो सकता है? आदि…

ख़ैर, राजा व उनके सभी साथी तुरंत आश्रम में गए और भोजन करने के पश्चात साधु महात्मा के दर्शन करने के उद्देश्य से उनकी कुटिया में गए और और उन्हें प्रणाम करने के पश्चात वहीं बैठ गए। कुछ देर पश्चात महात्मा ने राजा की ओर देखते हुए कहा, ‘राजन, काफ़ी विचलित नज़र आ रहे हैं, क्या समस्या है?’ राजा ने एक बार फिर महात्मा को प्रणाम करा और दोनों तोते वाली पूरी कहानी सुनाई और फिर धीरे से पूछा, “ऋषिवर, इन दोनों तोतों के व्यवहार में आखिर इतना अंतर क्यों है? बस इसी दुविधा में उलझा हुआ हूँ।”

कहानी पूरी होते ही मैंने उस बच्चे से कहा, “महात्मा जी का उत्तर बताने से पहले मैं तुमसे पूछना चाहूँगा कि उन दोनों तोतों के व्यवहार में इतना अंतर क्यूँ था?” बच्चा कुछ पल शांत रहा फिर बोला, ‘सर, तोते को तो हम वैसे भी ‘रट्टु तोता’ बोलते हैं। वह जो सुनता है वही वापस दोहरा देता है। इन दोनों तोतों के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा। मैंने उस बच्चे की बात शांति के साथ सुनने के बाद उससे कहा, ‘तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो। ठीक इसी से मिलता-जुलता जवाब साधु-महात्मा ने भी दिया था।

साधु महात्मा ने राजा की बात पूरे धैर्य के साथ सुनी और फिर बोले, “ये कुछ नहीं राजन, बस संगति का असर है। डाकुओं के साथ रहकर तोता भी डाकुओं की तरह व्यवहार करने लगा है और उनकी ही भाषा बोलने लगा है। और इसी तरह आश्रम के बाहर रहने वाला तोता भी आश्रम की भाषा बोलने लगा है अर्थात् राजन, जो जिस वातावरण में रहता है, वह वैसा ही बन जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मूर्ख भी विद्वानों के साथ रहकर विद्वान बन जाता है और अगर विद्वान, मूर्खों की संगत में रहे तो उसके अन्दर भी मूर्खता आ जाती है।”

महात्मा की बात पूरी बताने के बाद मैंने उस बच्चे से कहा, अगर तुम्हारे पिता तुम्हें उनसे दूर रहने का कह रहे हैं तो निश्चित तौर पर उन्होंने तुम्हारे अंदर कुछ बदलाव देखा होगा और वे तुम्हें किसी बड़े नुक़सान से बचाना चाह रहे होंगे। लेकिन अब चुनाव तुम्हारा है तुम किसके साथ रहना चाहते हो?

दोस्तों आप सभी से सिर्फ़ एक बात कहना चाहूँगा, जब भी बच्चों को कुछ समझाने का प्रयास करें, सीधे तौर पर निर्णय सुनाने के स्थान पर अपनी बात कहने के लिए कहानी, किस्से या जीवन का अनुभव काम में लें।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com

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