फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

इंसानियत हमें इंसान बनाती है

इंसानियत हमें इंसान बनाती है
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April 30, 2021
इंसानियत हमें इंसान बनाती है…

सम्बल नगर के महाराज बहुत दयालु प्रवृति के थे और इसी वजह से उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। जो भी महाराज के द्वार पर आता था ख़ाली हाथ नहीं जाता था। प्रजा भी हमेशा उनका गुणगान गाया करती थी। प्रसिद्धि और लोगों की तारीफ़ सुन-सुन कर राजा को घमंड होने लगा। कुछ ही दिनों में राजगुरु महाराज की सोच में आए इस परिवर्तन को पहचान गए।

राजगुरु ने अपने गुरु, जो कि एक बहुत पहुँचे हुए संत थे, से इस विषय में मदद माँगी। एक दिन सुबह-सुबह वह संत राजा के महल के दरवाज़े पर पहुँच गए और मदद के लिए गुहार लगाने लगे। जैसे ही महाराज ने उनकी आवाज़ सुनी वे तुरंत मदद करने के उद्देश्य से अपने महल के दरवाज़े पर पहुँचे और संत को प्रणाम करते हुए बोले, ‘बताइए महात्मा जी मैं किस तरह आपकी मदद कर सकता हूँ?’

संत महाराज को आशीर्वाद देते हुए अपना भिक्षा पात्र आगे करते हुए बोले, ‘महाराज इस पात्र को पूरा भरकर भिक्षा पाने की उम्मीद में आपके पास आया हूँ।’ महाराज संत के हाथ में छोटा सा पात्र देखकर मुस्कुरा दिए और बोले, ‘बताइए महात्मा जी किस चीज़ से आपके पात्र को भर दूँ?’ ‘महाराज किसी भी चीज़ से भर दीजिए, पता नहीं क्या है कि यह पात्र भरता ही नहीं है?’  संत बोले।

संत की बात सुन इस बार महाराज ज़ोर से हंस दिए और अपने मंत्री से बोले, ‘मंत्री जी, महात्मा जी के पात्र को स्वर्ण मुद्राओं से भर दें और उनका मुँह सदा के लिए बंद कर दो। उन्हें अहसास करा दो कि इस दुनिया में दानवीर लोग अभी भी मौजूद हैं।’ इस बार संत मुस्कुराए और बोले, ‘ठहरिए महाराज, मैं आपको एक बार और बता दूँ कि यह पात्र भरता ही नहीं है।’

संत की बात सुन महाराज को लगा कि शायद कोई सनकी महात्मा का वेश धर आ गया है। वे पूरे घमंड के साथ बोले, ‘घबरा मत पगले हम तेरे इस पात्र को सोने और हीरे जवाहरात से भर देंगे।’ महात्मा फिर बोले, ‘सोच लीजिए महाराज, मेरी शर्त है कि  जब तक यह पात्र भर नहीं जाएगा मैं इसे पीछे नहीं हटाऊँगा।’ महाराज बोले, ‘मंज़ूर है, मंत्री जी इस पात्र को सोने के सिक्कों और हीरे जवाहरात से भर दो।’

मंत्री जी ने तुरंत महाराज के आदेश का पालन किया और हीरे जवाहरात लाकर उस पात्र में डालने लगे। अभी कुछ ही देर हुई थी कि महाराज को अपनी गलती का एहसास हो गया। वे उस पात्र में जो भी डालते सब कुछ पता नहीं कहाँ चला जाता था और पात्र वापस ख़ाली नज़र आने लगता था। पर महाराज भी ज़िद्दी थे, आसानी से कहाँ हार मानने वाले थे। उन्होंने राज्य का ख़ज़ाना उस पात्र में डालना शुरू कर दिया, पर पात्र भर ही नहीं रहा था। कुछ ही देर में सारे राज्य में यह बात फैल गई और हज़ारों लोग वहाँ आकर देखने लगे। सुबह से शाम हो गई और कभी ख़ाली ना होने वाला राजा का ख़ज़ाना भी खत्म होने लगा, लेकिन पात्र था कि भर ही नहीं रहा था।

महाराज समझ गए हो ना हो यह कोई बहुत पहुँचे हुए महात्मा हैं, वे उनके चरणों में गिर पड़े और उनसे माफ़ी माँगते हुए बोले, ‘महात्मा जी, मुझे माफ़ करिएगा। आपकी लीला को देख मेरी अकड़, झूठा घमंड सब खत्म हो गया है मुझे लगता था कि मेरे पास अक्षत ख़ज़ाना है लेकिन मैं आपके इस छोटे से पात्र को भी नहीं भर पाया। मैं हार मानता हूँ, कृपया मुझे क्षमा कर दें।’ महाराज की बात सुन महात्मा ने अपना हाथ पीछे खींच लिया और पात्र को अपनी झोली में रख लिया।’

जी हाँ दोस्तों हमारा लालची मन इस पात्र के सामान ही है जो हमें अधिक से अधिक धन दौलत और भौतिक संसाधन एकत्रित करने के लिए प्रेरित करता है। जैसे-जैसे हम धन-दौलत कमा कर इसे तृप्त करने का प्रयत्न करते हैं हमारा लालच इसे और अधिक बढ़ा देता है। जैसे पहले एक मकान, फिर दूसरा, फिर और बड़ा, फिर कई अन्य जगहों में निवेश आदि। यही तो दोस्तों आज इन विपरीत परिस्थितियों में देखने को मिल रहा है, जहां कुछ लोगों का लालच उनसे इंसान की जान की परवाह करे बग़ैर दवाइयों, मेडिकल उपकरणों या आवश्यकता के अन्य सामान की कालाबाज़ारी करवा रहा है।

दोस्तों सबसे महत्वपूर्ण एक बात समझने की हमें ज़रूरत है, इस दुनिया में पैसा और भौतिक संसाधन अनंत है लेकिन हमारे पास इस जीवन के रूप में सीमित समय है। अगर आप अपने जीवन को सुखद और उल्लास, ख़ुशियों से पूर्ण बनाना चाहते हैं तो निम्न तीन कार्य करना शुरू कीजिए-
पहला - अपने लालच को एक तरफ़ रखते हुए अपने जीवन की प्राथमिकताओं को तय करें।
दूसरा - घमंड, लालच, इकट्ठा करने की प्रवृति को छोड़कर, जो आपके पास है उसके लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करें।
तीसरा - प्यार, सहानुभूति और समय देकर अपने परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों और समाज की देखभाल करें।

याद रखिएगा लालच नहीं इंसानियत हमें सुख, शांति और संतुष्ट बना सकती है। जिस तरह प्रकृति किसी के साथ भेद-भाव नहीं करती है ठीक उसी तरह हमें भी प्रकृति में मौजूद समस्त प्राणियों का सम्मान करना सीखना होगा।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com

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