फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

कथनी और करनी रखे एक

कथनी और करनी रखे एक
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Sep 17, 2021

कथनी और करनी रखे एक !!!


दोस्तों, जीवन में कई बार कुछ ऐसा घट जाता है जो उस वक्त तो नहीं, लेकिन बाद में बहुत चुभता है और सोचने पर मजबूर करता है कि जिन बातों को आप नज़रंदाज़ कर जाते हैं, क्या आप उन्हें अपने बच्चों या अगली पीढ़ी को सिखा पाएँगे। हाल ही में ऐसी ही एक घटना मेरे साथ घटी, गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी की स्थापना के दौरान मुझे एहसास हुआ कि पूजा के सामान में नारियल लाना रह गया है। जिस वक्त इस कमी का एहसास हुआ उस वक्त गणेश स्थापना के लिए मुहर्त काफ़ी कम  समय का बचा था। मैं तुरंत घर के पास स्थित पूजा का सामान बेचने वाली दुकान पर पहुँच गया और उनसे जल्दी सामान देने की गुज़ारिश करने लगा।


दुकानदार मेरी परेशानी समझ गए और सामान लेने के लिए दुकान के अंदर गए। उसी वक्त मेरे पास खड़ी महिला के हाथ से दुकानदार के काउंटर पर रखी नेल पॉलिश की शीशी नीचे गिर कर टूट गई। उस महिला ने तुरंत उस टूटी नेल पॉलिश की शीशी को उठाया और वापस काउंटर पर रख दिया और वहाँ से चली गई। चूँकि दुकानदार वहाँ मौजूद नहीं था इसलिए उसे इस नुक़सान का पता ही नहीं चला। वहीं दूसरी ओर मैंने भी दुकानदार को नेल पॉलिश वाली घटना के बारे में कुछ भी नहीं बताया और अपना सामान लेकर वापस आ गया। घर आकर मैं पूजा में व्यस्त हो गया और धीरे-धीरे मैं भी उस घटना को भूल गया।


लेकिन दोस्तों कल जब मैं सकारात्मक पेरेंटिंग के 5 नियम में से तीसरा नियम, ‘बच्चा आपकी कही बात से नहीं आपके व्यवहार, या आप उसके सामने किस तरह कार्य करते हैं उसे देखकर ज़्यादा सीखता है।’ लिख रहा था उस वक्त मैं सोच रहा था, क्या मुझे यह लिखने का अधिकार है? उस वक्त पर कुछ बच्चे मुझे और उस घटना को देख रहे थे, हालाँकि वे उम्र में काफ़ी छोटे थे और दुकानदार को हुए नुक़सान या उस महिला के व्यवहार अथवा मेरा देख कर भी अनदेखा करने वाला नज़रिया समझने लायक़ नहीं थे फिर भी मैं सोच रहा था, ‘मान लीजिए, किसी दिन मुझे इन्हें कुछ समझाने का मौक़ा मिला तो क्या वे  मेरी बात पर विश्वास करेंगे? शायद नहीं।’


वैसे अपनी बात बेहतर तरीक़े से समझाने के लिए मैं आपको महात्मा गांधी जी के जीवन में घटी एक घटना से समझाने का प्रयत्न करता हूँ। एक दिन एक महिला महात्मा गांधी जी के पास पहुँची और उनसे विनती करने लगी कि वे उनके पुत्र को शक्कर कम खाने या छोड़ने के लिए बोलें।


पूरी बात सुनते ही महात्मा गांधी उस महिला से बोले, ‘बहन, तुम एक सप्ताह बाद अपने बेटे को लेकर आना।’ महिला उस वक्त तो चली गई और जैसा गांधी जी ने कहा था ठीक एक सप्ताह बाद वापस आ गई। इस बार फिर गांधी जी ने उसे एक सप्ताह बाद आने के लिए कहा। कुछ सप्ताह तक ऐसा ही चलता रहा। एक दिन जब महिला वापस गांधी जी के पास पहुँची तो गांधी जी ने उस बच्चे को अपने पास बुलाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘बेटा शक्कर खाना अच्छी बात नहीं है, तुम इसे छोड़ दो।’


गांधी जी की बात सुन महिला हैरान थी, उसने तुरंत गांधी जी से कहा, ‘अगर आप को इतना ही समझाना था तो उसी दिन बोल देते जिस दिन मैं पहली बार बच्चे को लेकर आपके पास आयी थी।’ गांधी जी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘बहन, तब तक मैं भी शक्कर खाना बहुत पसंद करता था और जो काम मैं खुद करता था उसे करने के लिए बच्चे को कैसे कह सकता था?’ 


जी हाँ दोस्तों, हमेशा याद रखिएगा अगर आप बच्चों को संस्कार सिखाना चाहते हैं तो पहले आपको संस्कार का पालन अपने जीवन में करना होगा।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

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