फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

किताबी नहीं, व्यवहारिक ज्ञानी बनें!!!

किताबी नहीं, व्यवहारिक ज्ञानी बनें!!!
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April 8, 2021
किताबी नहीं, व्यवहारिक ज्ञानी बनें!!!

शहर से कुछ दूरी पर स्थित तालाब में व्यवहारिनी, मध्यमा और अतीव नामक तीन मछलियाँ रहती थी। तीनों ही अपने को श्रेष्ठ दिखाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती थी जिसके कारण तालाब की बाक़ी मछलियाँ भी तीन भाग में बंट गई थी। अतीव बड़ी ज्ञानी थी उसे सभी शास्त्रों, वेद, पुराणों का ज्ञान था। मध्यमा का ज्ञान से सिर्फ़ ज़रूरत जितना नाता था। वह तात्कालिक समाधान को ध्यान में रखते हुए परम्पराओं के पालन में ज़्यादा यक़ीन रखती थी। व्यवहारिनी इन दोनों से ही अलग थी। उसे शास्त्र और परम्पराओं दोनों का ही ज्ञान था लेकिन वह आवश्यकता और ज़रूरत के आधार पर व्यवहारिक तरीक़े से सोचकर निर्णय लिया करती थी।

वे तीनों ही अपने अनुयायियों को अपनी सोच के आधार पर पाठ पढ़ाया करती थी। एक शाम सभी मछलियाँ तालाब में अटखेलियाँ कर रही थी, तभी वहाँ कुछ मछुआरों का आना हुआ। वे इतनी सारी मछलियों को एकसाथ देखकर उन्हें पकड़ने की योजना बनाने लगे। तभी उनमें से एक मछुआरे ने बोला, ‘क्यूँ ना हम समुद्र में जाकर मछली पकड़ने के स्थान पर कल इस तालाब में मछलियाँ पकड़े। हमारा समय व मेहनत दोनों बच जाएँगे। बाक़ी सभी मछुआरे भी उसकी बात सुन राज़ी हो गए।

मछुआरों की बात व्यवहारिनी मछली ने सुन ली। उसने तुरंत सभी मछलियों की आपात मीटिंग बुलायी और सारी मछलियों के एकत्रित होने पर उसने सभी को मछुआरों वाली बात बताई और कहा हम सभी को अपनी जान बचाने के लिए उनके आने से पहले इस तालाब को छोड़ देना चाहिए। मुझे कुछ छुपे हुए पतले पानी के रास्तों के बारे में पता है जिसके इस्तेमाल से हम सब जंगली घास से ढके हुए सरोवर में पहुँच जाएँगे।

व्यवहारिनी मछली की बात सुनकर मध्यमा और अतीव मिलकर हंसने लगे। हंसते हुए मध्यमा बोली, ‘हज़ारों वर्षों से हमारे पूर्वज सिर्फ़ सर्दी में ही उस सरोवर में जाते हैं और अभी तो उस मौसम को आने में काफ़ी समय है। मात्र कुछ मछुआरों की बात सुनकर हम हमारी वर्षों की परम्परा को तो नहीं छोड़ सकते हैं ना? व्यवहारिनी तुम नाहक ही इतनी चिंतित हो।’

मध्यमा की बात सुन अतीव ज़ोर से हंसी और बोली, ‘तुम दोनों में ही शायद बुद्धि की कमी है, तुम अज्ञानी हो, तुम्हें शास्त्रों का ज्ञान नहीं है। तुम गुरुजी का पढ़ाया पाठ भूल गई कि जो बादल गरजते हैं वो बादल बरसते नहीं है? आजतक कई मछुआरे आकर ऐसी बातें बोले हैं, कई तरह से हमें पकड़ने का प्रयास कर चुके हैं। लेकिन कभी कोई सफल हुआ क्या? तुम लोगों एक बात याद रखो, हम सभी कुशल तैराक हैं और ज़रूरत पड़ने पर हम तत्काल तालाब के तल में जाकर बैठ सकते हैं। हमारी पूँछ में भी अथाह शक्ति है जिसकी मदद से हम जाल को फाड़ने में सक्षम हैं। वैसे भी शास्त्रों में कहा गया है कि संकट के पलों में अपने घर को छोड़कर परदेस जाना उचित नहीं है। वैसे मुझे नहीं लगता है कि मछुआरे कल आएँगे लेकिन मान लो वे आ भी गए तो हम सब तालाब के तल में जाकर बैठ जाएँगे और अगर कुछ मछली उनके जाल में फँस भी गई तो वे अपनी पूँछ की ताक़त से जाल फाड़कर उसमें से निकल जाएँगी। मेरा मत एकदम स्पष्ट है शास्त्रों, ज्ञानियों के वचनों के विरुद्ध तो मैं जाऊँगी नहीं।’

व्यवहारिनी ने कहा, ‘तुम सही हो सकती है कि मुझसे ज़्यादा शास्त्र की जानकारी तुम्हें हो लेकिन मेरा मानना है कि जब हम किसी चीज़ या विषय को सीखने के बाद अपने जीवन में प्रयोग में लाते हैं तभी हम उस विषय के ज्ञानी बन पाते हैं। सिर्फ़ कुछ बातों को रटकर उन्हें अपने फ़ायदे के लिए तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना ज्ञानी नहीं बनाता और मान लो तुम ज्ञानी हो भी सही, तो भी ज्ञान का घमंड तुम्हारी रक्षा नहीं करेगा, उसके लिए तुम्हें उसे प्रयोग में लाना सीखना होगा।’

इतना कहने के बाद भी अतीव ने उसकी बात को हंसी में उड़ा दिया लेकिन व्यवहारिनी ने उसकी हंसी को नज़रंदाज़ करते हुए मध्यमा से कहा, ‘सुनो मध्यमा, ‘ठीक इसी तरह परम्पराओं के पालन में भी तब तक कोई नुक़सान नहीं है जब तक हम उन परम्पराओं के पीछे छिपे मूल रहस्य को जानते हैं। अन्यथा वे सिर्फ़ ढकोसला बनकर रह जाती हैं। बुद्धिमानी इसी में है कि मनुष्य जैसे ताकतवर और दिमाग़ वाले प्राणी से जान बचाने के लिए कहीं जाकर छुपकर बैठ जाओ।’

अतीव व मध्यमा दोनों मिलकर व्यवहारिनी का मखौल उड़ाने लगे। लेकिन व्यवहारिनी उन्हें नज़रंदाज़ कर अपने समर्थकों को साथ लेकर जंगली घास से ढके सरोवर की ओर चली गई। अतीव व मध्यमा उनके जाने के बाद भी उनकी हंसी उड़ाने में ही व्यस्त रही और कब दिन ख़त्म होकर अगली सुबह हुई, उन्हें इसका भान ही नहीं हुआ।

अगले दिन सुबह मछुआरे पूरी तैयारियों के साथ आए और तालाब में जाल डाल दिया। कुछ ही देर में अतीव व मध्यमा के साथ कई सारी मछलियाँ उनके जाल में फँस गई। जाल से छूटने के लिए उन्होंने अपनी सारी ताक़त लगाई लेकिन वे उसमें असफल रही और अपनी जान से हाथ धो बैठीं।

जी हाँ दोस्तों, इन तीनों मछलियों सामान ही हमारे समाज में भी तीन तरह के लोग रहते हैं। पहले वे, जो धर्म के मर्म को समझे बिना, धर्म और परम्परा की बात करते हैं। दूसरे वे, जो किताबी ज्ञान के आधार पर खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं और भूल जाते हैं कि ज्ञान का तात्पर्य किताब से बिलकुल भी नहीं है। तीसरे वे, जो इंसानियत और व्यवहारिक ज्ञान के आधार पर अपने किताबी ज्ञान और परम्पराओं के संतुलन को बरकरार रखते हैं अर्थात् वे पारिस्थितिक आधार पर कब, कहाँ और कैसे अपने ज्ञान का प्रयोगकर अपने और अपने लोगों के जीवन को आसान बनाते हैं। याद रखिएगा दोस्तों व्यवहारिक ज्ञान आपको कठिन से कठिन परिस्थिति में भी शांत बनाए रखते हुए, जीवन को सम्पूर्णता के साथ जीने का मौक़ा देता है।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com

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