फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

गुस्सा ना करना हमारा चुनाव है, मजबूरी नहीं

गुस्सा ना करना हमारा चुनाव है, मजबूरी नहीं
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June 11, 2021

गुस्सा ना करना हमारा चुनाव है, मजबूरी नहीं


एक ऑनलाइन सेमिनार के दौरान आज एक शिक्षक ने मुझसे प्रश्न किया, ‘सर, आप हमेशा उन बातों से दूर रहने का कहते हैं जो हमारे अंदर नकारात्मक भाव उत्पन्न करती हैं । पर मुझे लगता है कि आज के जमाने में उन सभी बातों से बचा नहीं जा सकता है।’ हालाँकि मैं उनका प्रश्न काफ़ी हद तक समझ गया था लेकिन फिर भी मैंने जवाब देने के स्थान पर नकारात्मक भाव से उनका तात्पर्य क्या है, स्पष्ट करने को कहा। वे बोलीं, ‘सर आप हमेशा डर, अपराध बोध, घृणा और क्रोध या ग़ुस्से से बचने का बोलते हैं तथा इसके स्थान पर मदद, प्यार और परवाह आदि के द्वारा शांत रहते हुए कार्य करने का कहते हैं। अपराध बोध और घृणा तो ठीक है लेकिन मुझे ऐसा लगता है, डर और क्रोध के बिना आज के युग में कार्य करना सम्भव नहीं है।’ 


वैसे मुझे ऐसा लगता है कि यह दुविधा मैडम की ही नहीं वरन् कई लोगों के मन में हो सकती है और मेरी नज़र में इसका सबसे बड़ा कारण गहराई से ना सोचना है। आमतौर पर हम किसी भी व्यक्ति के द्वारा कही गई बात के सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ को ही पकड़कर मान लेते हैं कि हमें सारी बात समझ में आ गई और यही अधूरी समझ हमारे मन में बाद में उलझन पैदा करती है। मैं इसे एक छोटी सी कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ। 


कई साल पहले एक गाँव में इंसानों के साथ बहुत सारे जानवर, बहुत ही प्यार के साथ रहा करते थे। पूरे गाँव में ख़ुशहाली का माहौल था, सभी लोग हिल-मिल कर एक दूसरे का साथ देते हुए रहते थे। लेकिन इस गाँव में एक साँप भी रहता था और उससे गाँव के सभी लोग बहुत परेशान रहते थे क्यूँकि वह चाहे जब किसी ना किसी को काट लिया करता था। साँप के ज़हरीला होने की वजह से कई बार गाँव के लोगों ने अपने प्रियजनों को भी खोया था।


पूरे गाँव के लोगों ने मिलकर साँप को समझाने का प्रयास करा लेकिन वह किसी की कुछ सुनने को तैयार ही नहीं था। वह बार-बार एक ही तर्क दे रहा था कि डसना उसकी स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है, वह इसे कैसे छोड़ सकता है? कुछ हल ना निकलता देख गाँव वालों ने भगवान शिव से मदद माँगने का निर्णय लिया। 


गाँव के कुछ लोग दल बनाकर कैलाश पर्वत की ओर चल दिए। कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद वे शिव भगवान के पास पहुँचे और उन्हें दण्डवत् प्रणाम करने के बाद अपनी पूरी व्यथा सुनाते हुए साँप की वजह से होने वाली परेशानी के बारे में बताया। प्रभु ने गाँव वालों को आश्वस्त करा कि वे इस समस्या का निश्चित तौर पर समाधान निकालेंगे पर गाँव वाले उसी वक्त साँप को बुलाकर समझाने के लिए अड़ गए। 


शिव भगवान ने अपने भक्तों की बात को मानते हुए उसी समय अपनी शक्ति से साँप को अपने पास बुलवा लिया और उसकी बात सुनने के बाद भगवान शिव ने उसे समझाया कि वह गाँव वालों को डसना बंद कर दे। साँप ने प्रभु की आज्ञा को सर आँखों पर लिया और वहाँ से चला गया। गाँव वाले भी अपनी समस्या का समाधान पाकर बहुत खुश थे और वे भी ख़ुशी-ख़ुशी गाँव वापस आ गए। 


धीरे-धीरे गाँव का पूरा माहौल बदल गया और अब सब गाँव वाले बेखौफ ख़ुशी के साथ रहने लगे। कई माह बाद एक बार भगवान शिव का उस गाँव से गुजरना हुआ और गाँव के सभी लोगों को खुश देख उन्हें बहुत अच्छा लगा। वे उस गाँव से जाने के लिए बाहर ही निकले थे कि उनका सामना काफ़ी चोट लगे साँप से हो गया। वे उसके पास पहुँचे और उसकी पीड़ा कम करने के उद्देश्य से उन्होंने बड़े प्यार के साथ उसके ऊपर हाथ फेरा और फिर उसकी इस हालत की वजह पूछी।


साँप ने भगवान शिव की ओर देखते हुए कहा, ‘प्रभु यह सब आपके आदेश का ही कमाल है! जब से आपने मुझे डसने के लिए मना किया है गाँव के बच्चों और अन्य बदमाश लोगों ने आते जाते मुझे पत्थरों से मारना शुरू कर दिया। भगवान शिव को उसकी समझ पर तरस आया और वे बोले, ‘वत्स तुमने मेरी बात का ग़लत अर्थ निकाल लिया है। यह बिलकुल सही है कि मैंने तुम्हें गाँव वालों को डसने के लिए मना किया था लेकिन मैंने तुम्हें फन फैलाने और फुफकारने से कहाँ रोका था?’


जी हाँ दोस्तों, हमारे साथ भी बिलकुल ऐसा ही होता है, सामान्यतः हम नकारात्मक भावों के प्रदर्शन और उसके अनुभव को जीवन का हिस्सा बनाने के बीच के बारीक अंतर को अक्सर समझ नहीं पाते हैं और उस नकारात्मक भाव की वजह से परेशान होते हैं। क्रोध या गुस्सा ना करने का अर्थ यह नहीं है कि आप सामने वाले व्यक्ति को अपना विरोध दर्ज कराना बंद कर दें, उसकी अनुचित बातों को सहना शुरू कर दें। ऐसा करना भी आपके अंदर नकारात्मक भाव ही पैदा करेगा। व्यक्ति, पद, समय के आधार पर आपको सामने वाले को बताना होगा कि गुस्सा ना करना आपका चुनाव है, मजबूरी नहीं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

dreamsachieverspune@gmail.com

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