फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

जीवन - यथा दृष्टि तथा सृष्टि

जीवन - यथा दृष्टि तथा सृष्टि
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Feb 10, 2022

जीवन - यथा दृष्टि तथा सृष्टि


दोस्तों, आज एक सज्जन ने मुझसे पूछ लिया, ‘सर, जीवन क्या है?’ मैंने मुस्कुराते हुए उनसे कहा, ‘सर, जीवन को परिभाषित करना आसान नहीं है क्यूँकि यह कोई गणित, विज्ञान या इतिहास का प्रश्न तो है नहीं, जिसका कोई निश्चित उत्तर हो। यह तो वैसा ही है, जैसा आपने इसे अनुभव किया है।’ मुझे नहीं पता मैंने उन्हें सही बताया या नहीं। लेकिन हक़ीक़त में दोस्तों मुझे तो ऐसा ही लगता है।


हर किसी के लिए जीवन के मायने अलग-अलग हैं क्यूँकि यह ज़िंदगी जीने के उनके तरीक़ों और मिले अनुभवों पर आधारित है। इसीलिए यह जीवन वैसा ही है, जैसा हम इसे देखते हैं। उदाहरण के लिए कुछ लोगों के लिए जीवन, जन्म और मृत्यु के बीच की दौड़ है, तो कुछ लोगों के लिए यह सुख-दुःख का मिश्रण। कुछ लोग जहाँ स्नेह के लिए, तो कुछ धन-दौलत या भौतिक सम्पत्ति के लिए तरसते हैं। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिनके पास खाने के लिए भोजन और पहनने के लिए कपड़े भी नहीं है। दोस्तों इस तरह कुछ लोगों का जीवन लालसा के साथ समाप्त हो जाता है। तो क्या यह माना जाए कि जीवन उदासीन है? बिलकुल भी नहीं दोस्तों क्यूँकि कुछ लोग तो ऐसे भी है जिनके पास यही सब चीज़ें बहुलता में भी हैं। 


अमीर और गरीब दोनों ही पैसे कमाने के लिए भाग रहे है क्यूँकि अमीर को और अमीर बनने के लिए और पैसे चाहिए, तो गरीब को ग़रीबी दूर करने के लिए। अगर ऐसा है तो क्या हम जीवन को पैसा या धन-दौलत मान लें? यह भी ग़लत ही होगा साथियों क्यूँकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पैसा नहीं कुछ और हासिल करने के लिए दौड़ते हैं। तो क्या हम ज़िंदगी को उपलब्धि कह सकते हैं? शायद नहीं क्यूँकि यह परिभाषा भी अधूरी ही रहेगी।


कुछ लोगों के लिए शिक्षा और ज्ञान सबसे महत्वपूर्ण है लेकिन इसके बाद भी ज्ञानी बनने की यात्रा को जीवन नहीं कहा जा सकता है। कुछ लोगों ने जीवन में विश्वास के बदले में धोखा खाया है, लेकिन इसके बाद भी हम इसे निराशाजनक नहीं कह सकते हैं। कुछ लोगों ने ज़िंदगी से बहुत कुछ सीखा है तो क्या इसे सबक़ या सीख माना जाए? या कुछ लोगों ने अपना पूरा जीवन सपनों का पीछा करते हुए बिता दिया, तो क्या जीवन एक सपना है?


इतना ही नहीं दोस्तों कुछ लोगों ने बीस बसंत देखने के पूर्व ही मृत्यु को गले लगा लिया है तो कुछ लोग 60 वर्ष की आयु में भी मज़े से हैं ,तो कुछ लोग ऐसे भी है जो कब्र में पैर डाले-डाले भी जीवन को समझने का प्रयास कर रहे हैं। इसीलिए दोस्तों मैंने पूर्व में जीवन या ज़िंदगी के विषय में कहा है, ‘ज़िंदगी या जीवन वैसा ही है जैसा आप इसको देखते हो या जीते हो।’ जैसे अगर आप इसे सौ प्रतिशत जी रहे हैं तो यह आपके लिए वरदान होगा और अगर आप इसे अनावश्यक चीजों को पाने की दौड़ में गँवा रहें है तो यह उसके अनुसार होगा। 


उपरोक्त आधार पर कहा जाए दोस्तों तो ज़िंदगी इन सभी बातों का मिलाजुला स्वरूप है। आपके हिस्से कौन सा हिस्सा आएगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आपने अपनी ओर से ज़िंदगी को क्या दिया है। इसे मैं आपको एक बहुत ही छोटी सी एक कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ। एक बच्चा पहाड़ी क्षेत्र में घूमने गया। एक जगह उसने जोर से चिल्लाकर कुछ कहा, उसे तत्काल वही शब्द तीन-चार बार रिपीट होते हुए सुनाई दिए। वह चौंक गया, उसे लगा वहाँ कोई व्यक्ति है जो आस-पास कहीं छुप कर उसका मज़ाक़ बना रहा है। उसने उसे धमकाते हुए कुछ कहा, इस बार उसे फिर से धमकी भरी आवाज़ 3-4 बार सुनाई दी। वह घबरा गया, पर फिर भी हिम्मत जुटाकर ज़ोर से बोला, ‘कौन है? हिम्मत है, तो सामने आओ।’ इस बार उसे फिर से यही आवाज़ लौटकर सुनाई दी। वह बच्चा घबरा गया और दौड़ कर अपनी माँ के पास पहुँचा और उन्हें सारी बात कहते हुए बोला, ‘माँ वह मुझे डरा और धमका भी रहा था।’


माँ तुरंत सारा माजरा समझ गई और उसे लेकर वापस उसी स्थान पर पहुँची और बोली, ‘एक बार ज़रा जोर से आई लव यू अर्थात् मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ बोलो।’ बच्चे ने वैसा ही करा, लेकिन इस बार उसे गूंजती हुई आवाज़ सुनाई दी, ‘आई लव यू अर्थात् मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।’ आवाज़ सुनते ही बच्चा खुश हो गया और माँ से बोला, ‘माँ अब वह मुझे प्यार करने लगा है।’


ठीक इसी तरह दोस्तों हमारी ज़िंदगी भी इसी तरह की गूंज है। हमें इससे वही वापस मिलता है जो हम इसको देते हैं। अगर आप इसे सकारात्मक और अच्छा देते हुए जिएँगे तो यह आपको भी सकारात्मक और अच्छे परिणाम देगी। इसीलिए कहा गया हैं, ‘जीवन को अगर जिया जाए तो यह बहुत छोटा और सुखद है और अगर काटा जाए तो बहुत लम्बा और दुःखद।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

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