फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

जैसा अन्न, वैसा मन

जैसा अन्न, वैसा मन
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June 24, 2021

जैसा अन्न, वैसा मन 


दो दिन पूर्व पारिवारिक कार्य से मुझे अपने एक रिश्तेदार के यहाँ जाने का मौक़ा मिला। काफ़ी अरसे बाद रिश्तेदारों से मिलना हुआ था इसलिए बातचीत में कब कुछ घंटे गुजर गए और भोजन का समय हो गया पता ही नहीं चला। थोड़ी देर में सभी लोग भोजन करने के स्थान पर बैठ गए व कुछ सदस्य भोजन परोसने की तैयारी करने लगे।


कुछ समय पश्चात ही बहुत क़रीने से सजाया हुआ भोजन सभी के बीच में लाकर रखा जाने लगा। भोजन के लिए बैठने वालों  में 2-3 बच्चे भी थे। सजाकर रखे गए भोजन की वजह से बच्चों के मुँह में पानी आने लगा और वे उसे खाने के लिए हाथ आगे बढ़ाने लगे। बच्चे के पिता तुरंत समझ गए और उन्होंने बच्चों को रोकते हुए कहा कि दादाजी को खाने की पूजा कर लेने दो फिर  तुम खाना।


अपने सामने पसंदीदा चीज़ें रखी होने के बाद भी उन्हें ना खा पाना बच्चों को थोड़ा अखरने लगा। इतनी देर में सभी की थालियाँ लगकर आ गई और एक बार फिर बच्चों को आस लगी कि शायद अब उन्हें अपनी पसंदीदा चीज़ें खाने को मिलेंगी। लेकिन दादाजी अभी भी किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे थे और उसी वजह से गौ-ग्रास नहीं निकाल रहे थे। बच्चों के लिए अब धैर्य रखना मुश्किल हो रहा था। मेरे पास बैठे बच्चे ने अपने पिता से कुछ कहा जिसके जवाब में पिता ने उसे डाँटकर चुप बैठा दिया।


ख़ैर, थोड़ी देर बाद सभी ने बढ़िया खाना खाया और वापस बातचीत में मशगूल हो गए। थोड़ी ही देर में एक बच्चे ने आकर अपने पिता से प्रश्न किया, ‘पिताजी, ये दादाजी रोज़ खाना खाने से पहले गौ-ग्रास निकालकर पूजा क्यूँ करते हैं? उन्हें सब को इंतज़ार करता देख बुरा नहीं लगता? और आज तो घर में इतने सारे मेहमानों को भी उन्होंने अपनी आदत की वजह से इंतज़ार करवाया। बच्चे के मन में गलत धारणा बनते देख मैंने उसे एक कहानी सुनाने का निर्णय लिया जो इस प्रकार थी-


एक गाँव में एक बहुत गरीब बूढ़ी अम्मा रहती थी। उसके हाथ-पाव में बिलकुल भी ताक़त नहीं थी इसलिए मेहनत करके कमाकर खाना उसके लिए सम्भव नहीं था। वह भिक्षा में मिले अन्न से अपना जीवन चलाया करती थी। गाँव में ही एक बहुत ही भली महिला भी रहती थी, उसने बुजुर्ग महिला को रोज़ उसकी आवश्यकतानुसार दाल और चावल देना शुरू कर दिया। अब बुजुर्ग महिला को भी भिक्षा के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ता था। उस दानी महिला से मिली भिक्षा से बुजुर्ग अम्मा को रोज़ भरपेट भोजन मिलने लगा। बुजुर्ग अम्मा भी रोज़ उस भली महिला को ढेर सारा आशीर्वाद दिया करती थी।


एक दिन रोज़ की ही भाँति अम्मा उस भली महिला के घर से भिक्षा लेकर पलटी और थोड़ी दूर चलने पर ही उसे उस महिला का छोटा बच्चा गले में सोने की चेन पहने आता हुआ दिख गया। उसे देख बुजुर्ग महिला के मन में लालच आ गया कि अगर वह उस बच्चे के गले से चेन निकाल लेगी और उसे बेचकर उसे बहुत सारा पैसा मिल जाएगा। उसने चारों ओर देखा, उसे कोई भी इंसान नज़र नहीं आया। उसने बच्चे को खिलाने का नाटक करा और उसके गले से चेन निकाल ली। चेन लेकर वह ख़ुशी-ख़ुशी अपनी झोपड़ी में पहुँची और चेन को अगले दिन बाज़ार में बेचने का मन बनाकर उसे छिपाकर रख दिया और भोजन करके सो गई।


अगले दिन जब वह सुबह बाज़ार जाने के लिए तैयार हुई तो उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसका मन उसे बार-बार कचोट रहा था कि जो रोज़ उसे खाने के लिए अन्न देती है वो उसी के साथ धोखा कर रही है। वह तत्काल चेन लौटाने के उद्देश्य से उस महिला के घर पहुँच गई और उसे पूरी घटना सुना दी। वह भली महिला विश्वास करने के लिए ही राज़ी नहीं थी कि अम्मा  ऐसा कर सकती है और बार-बार कह रही थी कि अम्मा चोर को बचाने के लिए ऐसा कह रही है। 


बुजुर्ग महिला ने बड़ी मुश्किल से उसे विश्वास दिलाया कि भ्रष्ट बुद्धि की वजह से यह गलती उसी ने करी है और अपने कृत्य के लिए माफ़ी माँगने लगी। जब भली महिला ने उसे माफ़ कर दिया तो बुजुर्ग महिला के पूछने पर उस भली महिला ने अपने पति से पूछा कि वह दो दिन पूर्व अनाज कहाँ से लेकर आए थे? उसके पति ने उसे बताया कि बाज़ार में एक व्यक्ति बहुत सस्ते में चावल बेच रहा था उसने यह चावल उससे ख़रीदे थे। थोड़ी पड़ताल करने पर पता चला कि वे चोरी करके लाए चावल थे।


इतना सुनते ही बुजुर्ग महिला बोली, “चोरी का अन्न पाकर ही मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी और इसी कारण मैं चेन चुराकर ले गई। वह अन्न जब मल के रूप में शरीर से निकल गया और शरीर निर्मल हो गया तब मेरी बुद्धि ठिकाने आई और मुझे एहसास हुआ कि मैंने बहुत बड़ा पाप किया है और मुझे यह चेन वापस लौटाकर क्षमा माँग लेना चाहिए।” बुजुर्ग महिला की बात सुनते ही भली महिला को अन्न के महत्व का एहसास हुआ और उसने बचा हुआ सारा चावल जानवरों को खिला दिया।


कहानी पूरी होते ही मैंने उस बच्चे से कहा, ‘मम्मी, पापा और दादाजी को भी उस बुजुर्ग महिला की तरह अन्न की शक्ति का एहसास है। इसलिए पापा हमेशा अच्छी, साफ़ सुथरी और पूजा-पाठ करने वाले व्यक्ति की दुकान से सामान लाते हैं और मम्मी खाना बनाते वक्त मंत्र बोलती हैं या कोई भजन सुनती हैं और दादाजी खाना खाने के पहले पूजा करते हैं और ईश्वर को धन्यवाद देते हुए पहला ग्रास गौ-माता को देते हैं।’ 

कहानी सुनाने के बाद जहां माता-पिता खुश नज़र आ रहे थे, वहीं बच्चा भी संतुष्ट था।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

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