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धारणा के आधार पर धारणा ना बनाएँ - भाग 2

धारणा के आधार पर धारणा ना बनाएँ - भाग 2
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Dec 20, 2021

धारणा के आधार पर धारणा ना बनाएँ - भाग 2


मैं अपने व्यवसायी मित्र के साथ पैदल ही बात करते हुए बाज़ार जा रहा था कि अचानक एक तेज़ आवाज़ ने हमारा ध्यान खींचा, जैसे ही पलटकर देखा तो पाया कि एक साइकल सवार को बाइक वाला टक्कर मारकर भाग गया है। मेरे मित्र लगभग दौड़ते हुए वहाँ पहुंचे और तत्काल उस युवक को सम्भाला और एक पेड़ के नीचे बैठाकर, अपनी पानी की बॉटल से उसे पानी पिलाया और फिर ऑटो से उसे पास के अस्पताल तक भिजवाया। 


हालाँकि इस घटना को मेरे समान कई लोगों ने देखा था। लेकिन किसी ने भी उस घायल व्यक्ति की मदद करने के लिए इतनी तत्परता नहीं दिखाई थी। उनके इस नज़रिए की वहाँ मौजूद लगभग सभी लोगों ने प्रशंसा करी। प्रशंसा करने वाले इन्हीं लोगों में मेरे एक परिचित भी थे जिनकी दुकान उसी इलाक़े में थी। वे तुरंत हमारे पास आए और बोले, ‘भाई, आपने मदद कर एक बहुत ही अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसकी जितनी तारीफ़ की जायँ कम ही है। सामान्य बातचीत के साथ वे सज्जन हम दोनों को चाय पीने का आग्रह कर अपनी दुकान पर ले गए।


उनकी दुकान पर पहुँचकर मैंने अपने मित्र का परिचय करवाने के उद्देश्य से उनके व्यवसाय का नाम लेते हुए, इतना ही कहा था कि, ‘सर, चूँकि आप इसी शहर से हैं तो आपने निश्चित तौर पर इस संस्थान का नाम तो सुना ही होगा…’ मेरी बात को बीच में काटते हुए वो सज्जन एकदम से बोले, ‘सर, आप कैसे इनके झाँसे में फँस गए? यह लोग तो पूरी तरह फ़र्ज़ी हैं। बचकर रहिएगा ज़रा।’ 


अपने मित्र के बारे में पूरी तरह ग़लत बातें सुन मुझे अच्छा नहीं लगा, बल्कि यह कहना ज़्यादा उचित होगा कि उक्त बातें सुन मुझे तेज़ ग़ुस्सा आ रहा था और ऐसा ही कुछ हाल मेरे मित्र का भी था। अपने बारे में ग़लत और अनर्गल बातें सुन वो भी ग़ुस्से में था। मित्र उस व्यक्ति को जवाब देने के उद्देश्य से कुछ बोल ही रहे थे कि मैंने धीरे से उनका हाथ पकड़ते हुए रुकने का इशारा करा और किसी तरह अपने ग़ुस्से पर क़ाबू करते हुए सामान्य हाव-भाव के साथ बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘आप उस संस्थान और व्यक्ति के बारे में इतना गहराई से जानते हैं तो निश्चित तौर पर आपके उनके साथ कटु अनुभव रहे होंगे अथवा आप उनके करीबी परिचितों में से होंगे।’


मेरी बात सुनते ही वे बोले, ‘नहीं-नहीं मैं ना तो कभी उनसे मिला हूँ और ना ही कभी उनसे व्यवसायिक व्यवहार करा है।’ मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट आ गई और मैंने तुरंत उनसे अगला प्रश्न करा, ‘फिर आप उनके बारे में इतनी सारी नकारात्मक बातें किस आधार पर कह रहे हैं?’ मेरी बदली हुई आवाज़ और प्रश्न करने के तरीक़े से उन्हें एहसास हो गया कि शायद मैं उनकी बात से नाराज़ हूँ। वे तुरंत बात सम्भालते हुए बोले, ‘सर, मैंने उनके बारे में जो सुन रखा था वही आपसे कहा है।’  ‘आप सिर्फ़ सुनी-सुनाई बातों पर ही किसी के बारे में इतनी कटु धारणा बना लेते हैं?’, मैंने उनसे अगला प्रश्न करा। वे सज्जन बोले सर हर किसी को परखकर अथवा चेक करके तो नहीं देखा जा सकता है। सामान्यतः बाज़ार में व्यक्ति की क्या साख है उसके आधार पर निर्णय लेना होता है।


मैंने अपनी मुस्कुराहट को बरकरार रखते हुए बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘कुछ देर पहले ऐक्सिडेंट वाले युवा की मदद करने के लिए आप जिस सज्जन की तारिफ़ कर रहे थे वे ही उस संस्थान के मालिक हैं और मैं इन्हें पिछले 25 वर्षों से जानता हूँ। ये कभी भी किसी का अहित या ग़लत करने या ग़लत तरीके से पैसे कमाने का प्रयास नहीं करते हैं। बाज़ार की साख के हिसाब से निर्णय लेने का अधिकार तो निश्चित रूप से आपके पास है। लेकिन बिना किसी आधार के किसी की साख ख़राब करने का अधिकार आपके पास बिलकुल नहीं है।’ मेरी बात सुन उन सज्जन को अपने कहे पर ग्लानि हुई और वे तुरंत मेरे मित्र से अपने कहे शब्दों के लिए माफ़ी माँगने लगे।


जी हाँ दोस्तों, अक्सर हम लोगों की धारणाओं के आधार पर किसी प्रोडक्ट, किसी व्यक्ति अथवा संस्थान के लिए धारणा बना लेते हैं और बिना अपना दिमाग़ लगाए उस धारणा को ही सच मान निर्णय लेना, कार्य करना शुरू कर देते हैं। लेकिन याद रखिएगा दोस्तों, धारणाएँ किसी एक व्यक्ति का नज़रिया होता है। यह क़तई ज़रूरी नहीं है कि उसका नज़रिया हमेशा सही हो। अगर आप जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं, लोगों के साथ अच्छे संबंध रखना चाहते हैं तो धारणाओं के आधार पर धारणा बनाने के स्थान पर फ़ैक्ट्स एवं फ़िगर पर कार्य करना शुरू करें और साथ ही अपने मानक स्तर पर चीजों अथवा लोगों को तोलें। याद रखिएगा, सोचने के तरीक़े में लाए छोटे परिवर्तन आपके जीवन को बड़े रूप में परिवर्तित कर सकते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

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