फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

नीम हकीम ख़तरा-ए-जान

नीम हकीम ख़तरा-ए-जान
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Dec 7, 2021

नीम हकीम ख़तरा-ए-जान !!!


दोस्तों यह कहावत तो आपने निश्चित तौर पर सुनी ही होगी, ‘नीम हकीम ख़तरा-ए-जान’ अर्थात् अल्प या अधूरे ज्ञान का होना खतरे का सबब होता है। निवेश में अपना भविष्य देखने वाले बच्चे से काउन्सलिंग के दौरान हुई चर्चा में मुझे उपरोक्त बात याद आ गई। वह बच्चा पढ़ाई के लिए जोर दिए जाने एवं निवेश के लिए पिता द्वारा पैसा ना दिए जाने के कारण नाराज़ था। बातचीत के दौरान मुझे एहसास हुआ कि उसे बाज़ार में निवेश, उसके जोखिम, आँकड़ों को पढ़ना आदि नहीं आता है। 


मैंने तुरंत बच्चे से कहा, ‘मुझे तुम्हारा निर्णय बहुत पसंद आया है। वैसे भी हमें पैसे से पैसा बनाने के लिए उसका निवेश करना ही होता है, तो फिर क्यूँ ना आज से ही शुरू किया जाए। लेकिन इस विषय में बात करने से पहले मैं तुम्हें रामू और उसके सपने की कहानी सुनाता हूँ-


रामू एयरपोर्ट पर खड़े हवाईजहाज़ की देखरेख और साफ़ सफ़ाई का कार्य किया करता था। सफ़ाई करते समय हर वक्त वह एक ही सपना देखा करता था, ‘एक दिन मेरा भी अपना हवाई जहाज़ होगा और मैं खुद उसे उड़ाऊँगा।’ एक दिन वह एक छोटे ट्रेनिंग प्लेन के कॉकपिट की सफ़ाई कर रहा था कि उसका ध्यान पायलट की सीट के पास रखी एक किताब पर गया जिसका नाम था, ‘आसान चरणों में हवाई जहाज उड़ाना सीखें - खंड 1’। 


किताब का नाम पढ़ते ही रामू की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा उसने उसे उठाया और उसी वक्त पढ़ने लगा। किताब के पहले पन्ने पर हवाईजहाज़ को उड़ाने से पहले कैसे चेक किया जाता है, इस बारे में लिखा था। रामू को लगा यह तो मैं हमेशा से ही कर रहा हूँ। उसने अगला पेज पलटा तो पर हवाई जहाज़ चालू करने की विधि समझाई गई थी। उसने निर्देशों का पालन करते हुए जैसे ही लाल बटन दबाया हवाईजहाज़ का इंजन चालू हो गया है। 


पहले स्तर पर सफलता पा रामू खुश था, उसने तुरंत किताब का पृष्ठ पलटा और अगला पन्ना पढ़ना शुरू कर दिया जिसमें बताया गया था कि पीला बटन दबाते ही हवाईजहाज़ दौड़ने लगेगा। साथ ही आपातकालीन परिस्थितियों में उसे रोकने के लिए आपको नीले बटन का प्रयोग करना होगा। एक पल के लिए रामू कुछ सोचने लगा और अचानक ही उसने पीले बटन को दबा कर हवाईजहाज़ को हवाई पट्टी पर दौड़ाने का अनुभव लेने का निर्णय लिया। रामू के पीला बटन दबाते ही हवाईजहाज़, हवाई पट्टी पर दौड़ने लगा। हवाईजहाज़ की बढ़ती गति देख रामू घबरा गया और उसने तुरंत आपातकालीन ब्रेक लगाने के लिए नीला बटन दबा दिया। बटन दबाते ही आपातकालीन ब्रेक लगने की वजह से हवाईजहाज़ रुक गया और रामू की जान में जान आई। कुछ पलों में रामू सामान्य स्थिति में आया तो उसने हवाई जहाज़ को हवाई पट्टी पर दौड़ाने का रोमांचक अनुभव लेने के लिए 2-3 बार इसी प्रयोग को दोहराया।


हर बार अपने प्रयास में सफलता मिलती देख रामू खुश था, उसे लगा हवाईजहाज़ चलाना तो बेहद आसान है, मैंने सोचने-विचारने में नाहक ही इतने वर्ष बर्बाद कर दिए। उसने किताब को आगे पढ़ने का निर्णय लिया और उसका पृष्ठ पलट दिया। अगले पृष्ठ पर हवाईजहाज़ उड़ाने के बारे में दिशा निर्देश देते हुए लिखा था, ‘पीला बटन दबाने के बाद जब हवाईजहाज़ दौड़ने लगे और उसकी गति तेज़ हो जाए तो हरा बटन दबाते ही वह उड़ने लगेगा।’


रामू ने सोचा जब क़िस्मत ने अभी तक साथ दिया है तो क्यों ना इसे भी आज़मा के देख लिया जाए। उसने पहले लाल बटन दबा कर हवाईजहाज़ का इंजन चालू करा, उसके बाद पीला बटन दबाकर उसे हवाई पट्टी पर दौड़ाया और गति पकड़ते ही उसने ईश्वर का नाम लेकर हरा बटन दबा दिया। उसके ऐसा करते हे हवाईजहाज़ धीरे-धीरे आसमान की ऊँचाइयों को छूने लगा। रामू की ख़ुशी अब सातवें आसमान पर थी, आज उसका सपना जो पूरा हो गया था। लगभग आधे घंटे हवाईजहाज़ उड़ाने के बाद रामू को ऐसा लगा अब मुझे इसे नीचे उतार लेना चाहिए। उसने इसका तारिका सीखने के लिए किताब का पन्ना पलटा। अगले पन्ने पर लिखी बात पढ़ते ही राजू के होश उड़ गए और वो अपने दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे कुछ ढूँढने लगा। असल में किताब के अगले पन्ने पर लिखा था, ‘हवाई जहाज़ उतारना सीखने के लिए कृपया इस किताब का दूसरा खंड या भाग पढ़ें।


कहानी पूरी होते ही मैंने उस बच्चे से कहा, ‘तुम अंदाज़ा लगा सकते हो कि अंत में रामू का क्या हश्र हुआ होगा। अभी तुम्हारी स्थिति रामू की ही तरह है क्यूँकि तुम उधार के ज्ञान अर्थात् बाज़ार से मिली टिप्स के आधार पर निवेश कर रहे हो, जो कि मेरी नज़र में ग़लत है। तुम खुद सोचकर देखो अगर सामने वाले की जानकारी अधूरी या ग़लत निकली तो तुम्हारा हश्र क्या होगा?


जी हाँ दोस्तों, अधूरे ज्ञान पर खुद को सर्वश्रेष्ठ या विशेषज्ञ मानने, चुटकी बजाते ही सफलता पाने की सोच अकसर खुद को ही ज़्यादा नुक़सान पहुँचाती है। आजकल कई बच्चे इंटरनेट पर उपलब्ध आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर, सफलता को आसान और खुद को सम्पूर्ण मान भटक जाते हैं और माता-पिता या शिक्षकों से अपने अधूरे ज्ञान को सम्पूर्ण मान तर्क, वितर्क या कुतर्क कर सकते हैं। वे कह सकते हैं, ‘ज्ञान तो ज्ञान है, इसमें अधूरा क्या? और जब ज़रूरत पड़ेगी तब सीख लेंगे।’ इसके जवाब में हमें उन्हें ज्ञान की महता बताते हुए बताना पड़ेगा कि अगर उनका इलाज किसी नीम-हकीम या बिना पढ़े लिखे डॉक्टर ने किया होता तो क्या होता? या फिर उनके सपनों का घर अधूरे ज्ञान वाला इंजीनियर बनाए तो क्या होगा? क्या तुम अधूरी जानकारी वाले लोगों की मदद से अपने सपने पूरे करवाना चाहोगे? नहीं ना! तो फिर तुम अपने जीवन की नींव अधूरे ज्ञान के भरोसे पर कैसे बना रहे हो? याद रखिएगा दोस्तों अधूरा ज्ञान, हमारे मस्तिष्क, मन और जीवन के लिए विष के सामान है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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