फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

मेरी अपनी मंज़िल, मेरी अपनी दौड़

मेरी अपनी मंज़िल, मेरी अपनी दौड़
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May 2, 2021
मेरी अपनी मंज़िल, मेरी अपनी दौड़

दोस्तों आजकल काफ़ी लोग फ़ोन पर एक ही सवाल पूछते हैं, ‘सर, आपको क्या लगता है सब कुछ कब तक सामान्य हो जाएगा? घर में इस तरह बंद रहते हुए हम परेशान हो गए हैं।’ कुछ लोग कहते हैं, ‘सर, आजकल व्यापार पूरी तरह बंद पड़ा है, ऐसे कैसे काम चलेगा?’ वहीं कुछ बच्चे अपनी पढ़ाई, तो कुछ अपने कैरियर को लेकर चिंतित हैं तो कुछ लोग अपने लक्ष्य में पिछड़ जाने की वजह से परेशान हैं।

असल में दोस्तों थोड़ा सा गहराई से सोचकर देखेंगे तो हमारी समस्या की मुख्य वजह परिपूर्ण जीवन जीने की चाह है। अर्थात् जैसा हमने सोचा था, जैसा हमने सपना देखा था, जो हमारे प्लान थे हम उसके मुताबिक़ अपना जीवन जीना चाहते हैं और जब किसी भी वजह से वो पूरा नहीं होता तो परेशान हो जाते हैं। 

वैसे दोस्तों बात यहीं ख़त्म नहीं होती, ज़रा सा हमारे मन का नहीं हुआ तो हम परेशान हो जाते हैं। फिर चाहे वह मनचाहे कॉलेज में प्रवेश की बात हो या मनचाही नौकरी या फिर किसी से भी तुलना करके कुछ पाने की इच्छा। कई बार तो हम ईश्वर के दिए हुए रूप, रंग, क़द, काठी की वजह से भी परेशान हो जाते हैं। असल में दोस्तों सपाट शब्दों में कहूँ तो हमने किसी ना किसी बहाने से रोने को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है। दोस्तों अगर जीवन को काटना नहीं, जीना चाहते हो तो इस सोच से बाहर आना ही होगा। आइए एक छोटी सी कहानी से बाहर आने का तरीक़ा सीखते हैं-

शहर के बीच में एक बहुत बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के निर्माण का कार्य चल रहा था। उस बड़ी इमारत को बनाने वाले मज़दूर अपने परिवार के साथ वहीं रहते थे एवं उनके बच्चे दिन भर खेलते हुए अपना समय बिताया करते थे। उन छोटे-छोटे बच्चों का एक प्रिय खेल था रेल गाड़ी बनाकर बिल्डिंग के चारों तरफ़ दौड़ना। रोज़ कोई नया बच्चा इंजिन बनता था तो कोई डिब्बा।

उस निर्माणाधीन बिल्डिंग के पास ही अमित रहता था। अमित अकसर उन बच्चों को खेलते हुए देखा करता था और हैरान होता था कि यह बच्चे बिना किसी संसाधन और सुविधा के इतने मज़े से कैसे रह लेते हैं? एक दिन अमित उन बच्चों को खेलते हुए देख रहा था अचानक उसका ध्यान इस पर गया कि इंजिन और डिब्बे तो बदल जाते हैं लेकिन गार्ड की भूमिका रोज़ एक हाफ़ पेंट पहना हुआ छोटा सा बच्चा निभाता है और उसके हाथ में एक छोटा सा कपड़ा रहता है जो वह झंडी दिखाने के काम में लेता है।

अगले दो-तीन दिनों तक अमित ने बच्चों के इस खेल को और ध्यान से देखना शुरू कर दिया। हर बार सभी बच्चों को अलग-अलग रूप में लेकिन उस छोटे से बच्चे को गार्ड बनता देख वह इसका कारण जानने के लिए व्याकुल हो गया। अगले दिन सुबह जैसे ही बच्चों ने खेलना शुरू किया अमित कुछ चॉकलेट व बिस्किट लेकर उन बच्चों के पास पहुँच गया। पहले तो उसने उन बच्चों को चॉकलेट और बिस्किट दिए व उसके बाद उनके के साथ काफ़ी देर तक मस्ती करी।

अंत में उसने गार्ड बने बच्चे को अपने पास बुलाया और उससे पूछा, ‘बेटा, मैं रोज़ तुम्हें खेलते हुए देखता हूँ। बाक़ी सारे बच्चे तो कभी इंजिन, तो कभी डब्बे बन जाते हैं लेकिन तुम रोज़ गार्ड ही बनते हो। क्या तुम्हें गार्ड बनना इतना ज़्यादा पसंद है? क्या तुम्हारी इच्छा कभी कुछ और बनने की नहीं होती?’ बाक़ी बच्चों की ओर देखते हुए वह बच्चा बोला, ‘बाबूजी ऐसा नहीं है, मेरी भी इच्छा होती है। लेकिन मेरे पास पहनने के लिए कोई शर्ट नहीं है। ऐसी स्थिति में मेरे पीछे वाले बच्चे मुझे कैसे पकड़ेंगे? मेरे पीछे बाक़ी डिब्बे कैसे जुड़ेंगे? इसलिए मैं रोज़ गार्ड बनकर इस खेल में हिस्सा लेता हूँ और वैसे भी सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मैं खेल में हिस्सा लूँ।

जी हाँ दोस्तों, इस कहानी में जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सबक़ छिपा हुआ है। जीवन में हर पल आपको दो चीजों के बीच में से चुनाव करना होता हैं। पहला, जो भी चीज़ें आपके पास नहीं है उनके लिए परेशान होते रहें या फिर दूसरा, जो आपके पास है उसका जश्न मनाएँ। अगर आप तुलना, ईर्ष्या, अनचाही होड़, अंधी दौड़ का हिस्सा बनकर अपना जीवन जीते हैं तो आप उन चीजों के लिए परेशान होते हैं जो आपके पास नहीं है और आप नकारात्मक भाव का शिकार बनकर स्ट्रेस, डिप्रेशन या अन्य बीमारियों का शिकार बन जाते हैं।

याद रखिएगा दोस्तों जीवन कभी भी आपकी इच्छाओं के आधार पर परिपूर्ण नहीं होता है और परिस्थितियाँ कभी समस्या नहीं होती। असल में हम उन परिस्थितियों में जीवन जीना, उल्लास मनाना नहीं जानते। अगर आप अपना जीवन पूर्ण रूप से शांत और खुश रहते हुए जीना चाहते हैं तो अपनी और से प्रयत्न करना ना छोड़ें और उसके बदले में जो मिले उसे ईश्वर के प्रसाद के रूप में स्वीकारें और जो आपके पास है उसका पूर्ण आनंद उठाएँ। इसीलिए तो कहा गया है, ‘ना किसी से ईर्ष्या, ना किसी से होड़। मेरी अपनी मंज़िल, मेरी अपनी दौड़।’

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com

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