फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

रखें विश्वास, करें प्रयास और बन जाएँ ख़ास

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Dec 6, 2021

रखें विश्वास, करें प्रयास और बन जाएँ ख़ास 


दोस्तों आप कितनी भी बार असफल हुए हो, आपको कितनी भी विपरीत परिस्थितियों का सामना क्यों ना करना पड़ रहा हो, आप के हाल कितने भी बेहाल क्यों ना हों। अगर आप जीवन में इन तीन नियमों का पालन करते हैं तो आपको सफल होने से, खुश रहने से कोई रोक ही नहीं सकता है। लेकिन दोस्तों, नियम जानने से पहले हम दिल्ली के रहने वाले सरदार परमजीत सिंह के जीवन की सच्ची घटना जान लेते हैं।


सरदार परमजीत सिंह का जन्म एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता सरकारी नौकरी करते थे, इसीलिए उन्हें देश की राजधानी दिल्ली में लोधी रोड पर सरकारी आवास मिला हुआ था। जैसा कि सामान्यतः देखा जाता है, सरकारी नौकरी वाले माता-पिता अपने बच्चों पर शुरू से ही पढ़ाई का दबाव बनाए रहते हैं, ऐसा ही इस बच्चे के साथ भी हुआ। 


दिल्ली के दयाल सिंह कॉलेज से उन्होंने अपनी शिक्षा पूर्ण करी लेकिन आजीविका के साधन के रूप में नौकरी की जगह व्यवसाय को चुना। व्यवसाय में मेहनत व लगन से किए गए कार्य का परिणाम उन्हें जल्द ही मिलने लगा और वे रसना के दिल्ली के एकमात्र वितरक बन गए और दिल्ली के ही लाजपत नगर में स्टॉक रखने के लिए उन्होंने एक बड़ा गोदाम ले लिया और समय पर सामान की डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए 7-8 लोडिंग ऑटो रिक्शा भी ले लिए। दिल्ली में उनकी ट्रेड के सभी व्यापारी उन्हें अच्छे से जानने लगे थे, बाज़ार में उनकी साख और पहचान बढ़ती ही जा रही थी। सब चीजों को सही दिशा में जाता देख वे सोचने लगे थे कि ‘अब तो जीवन सेट हो गया है।’


लेकिन होनी और ईश्वर को तो कुछ और ही मंज़ूर था। वर्ष 1984 में हमारी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़की हिंसा, जिसने दिल्ली में नरसंहार का रूप ले लिया था, ने उनका सब कुछ छीन लिया। अब उनके पास ना तो गोदाम था, ना ही लोडिंग ऑटो, ना ही रसना का कार्य और ना ही बहुत अधिक पैसे।


इसके बाद भी इस व्यक्ति ने हार मानने के स्थान पर एक बार फिर से अपने जीवन को शून्य से शुरू किया और अपनी बचत से एक कार ख़रीदकर दिल्ली में टैक्सी चलाना शुरू कर दी। इस व्यवसाय में भी उन्होंने अपनी ऊर्जा, जोश और अनुशासन को पूर्व के व्यवसाय की तरह ही बरकरार रखा। अब वे हमेशा गाड़ी चलाते वक्त सफ़ेद झक, प्रेस की हुई वर्दी पहना करते थे। अभी कुछ 6-7 साल ही बीते होंगे कि एक दिन मसूरी से नीचे आते समय उनकी गाड़ी का एक भयानक ऐक्सिडेंट हो गया, जिसमें उनकी पसली, घुटना और एक हाथ कुचला कर, फ़्रैक्चर हो गया था। दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में वे 13 दिन कोमा में रहे। उसके बाद लगभग 3 माह तक विभिन्न ऑपरेशन के बाद वे ठीक होकर अस्पताल से बाहर आए। इसके बाद भी सामान्य स्थिति में आने के लिए उन्हें साढ़े तीन माह तक फिजियोथेरपी और व्यायाम की मदद लेना पड़ी। वे एक बार फिर शून्य पर आकर खड़े थे और उनके सामने रोज़गार का संकट था। 


इस बार भी उन्होंने हार मानने के स्थान पर पूर्व की ही तरह अनुशासन, सकारात्मक सोच, जोश और बच्चों के समान ऊर्जा के साथ ऑटो रिक्शा चलाना शुरू कर दिया। ऑटो चलाते वक्त भी वे कभी भी किसी से अतिरिक्त पैसे नहीं लिया करते थे, ना ही कभी भी कहीं जाने के लिए मना किया करते थे। इसके उलट कई बार उन्हें सवारियों द्वारा छला गया। इस विषय पर पूछने पर वे हमेशा कहते, ‘वाहेगुरु सब देख रहा है और वो जो करता है अच्छे के लिए करता है अन्यथा इससे बुरा भी तो हो सकता था।’ इस ऑटो के साथ उन्होंने एक बार फिर अपने जीवन में स्थायित्व पाते हुए अच्छे से अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन खुश रहते हुए किया।


सरदार परमजीत सिंह के जीवन की कहानी से हम ना सिर्फ़ प्रेरणा ले सकते हैं बल्कि जीवन में सफल होने के लिए अतिआवश्यक तीन नियम सीख सकते हैं-


पहला नियम - कभी हार ना मानने वाला नज़रिया रखें 

दोस्तों सरदार परमजीत सिंह ने हार के बाद परिस्थितियों, लोगों अथवा क़िस्मत को कभी दोष नहीं दिया बल्कि हर बार अपनी हार को खुले दिल से स्वीकारा, फिर भले ही कारण कुछ भी रहे हों, उसमें गलती किसी की भी हो। वे हमेशा वर्तमान स्थिति को स्वीकार कर, सकारात्मक रहते हुए यह विचार करते थे कि अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर, आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अब क्या किया जा सकता है?


दूसरा नियम - आशान्वित रहें 

परिणाम कुछ भी क्यों ना मिल रहे हों,  अगर आप के अंदर आशा बाक़ी है, आप कहीं से भी, किसी भी हालात में शुरू करके, मनचाहा मुक़ाम पा सकते हैं। हर पल ईश्वर का धन्यवाद दें और सोचें, इससे बुरा भी तो हो सकता था। और फिर जो संसाधन आपके पास उपलब्ध हैं, उन्हें याद करते हुए कहें, ‘अभी तो मेरे पास यह सब है इससे फिर से एक नई शुरुआत की जा सकती है।’


तीसरा नियम - अनुशासित रहें 

परिणाम स्वीकारने, आशान्वित रहने के बाद सबसे ज़रूरी चीज़ है अनुशासित रहते हुए जो उपलब्ध है उनके साथ नई शुरुआत करना। इसके लिए सबसे पहले खुद के आलोचक बनें, असफलता के कारणों को पहचानें और अपने हर कदम से सीख लेने की आदत विकसित करें। इसके बाद अब क्या किया जा सकता है, उन सम्भावनाओं पर विचार करें और मेहनत करके सफल बनें।


याद रखिएगा आपके जीतने की सम्भावना तब तक है जब तक आप स्वयं हार मानकर बैठ ना जाए।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

dreamsachieverspune@gmail.com

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