फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

रास्ते की मुश्किल नहीं, अपने लक्ष्य पर फ़ोकस करें

रास्ते की मुश्किल नहीं, अपने लक्ष्य पर फ़ोकस करें
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June 3, 2021

रास्ते की मुश्किल नहीं, अपने लक्ष्य पर फ़ोकस करें…


आज एक वेबनेयर के दौरान एक युवा ने मुझसे प्रश्न किया, ‘सर, क्या आप मुझे कोई एक सूत्र बता सकते है जिसको अमल में लाकर मैं अपने क्षेत्र में सबसे अलग बन सकूँ?’ मैंने उस युवा से कहा, ‘सबसे अलग बनने से आपका तात्पर्य क्या है?’ वह तुरंत बोला, ‘सर मैंने अपनी शिक्षा के दौरान महसूस किया था कि कहीं ना कहीं हम शिक्षा को आधुनिक बनाने के प्रयास में अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपने संस्कार, अपने चरित्र को भूलते जा रहे हैं। मुझे ऐसा लगता है कि हमें अपनी संस्कृति, अपने संस्कार को बचाने के लिए इन्हें आधुनिक व व्यवहारिक तरीक़े से नई पीढ़ी के सामने तार्किक आधार के साथ रखना होगा। मैं इस क्षेत्र में अपना जीवन लगाना चाहता हूँ और इसी वजह से मैंने आपसे यह प्रश्न किया है।’


यक़ीन मानिएगा दोस्तों उसका प्रश्न सुनकर मैं स्वयं को बोना समझ रहा था। लेकिन फिर भी मुझे लगा कि अगर आज इसे सही रास्ता दिखाने का प्रयत्न नहीं किया तो शायद मैं अपने कार्य और उसके विश्वास के साथ न्याय नहीं कर पाऊँगा। मैंने तुरंत उससे कहा आप बहुत ही उम्दा कार्य करने का विचार कर रहे हैं, लेकिन मेरा अनुभव बोलता है कि जब भी हम कोई कार्य बहुत लम्बे समय तक निस्वार्थ भाव से ही पूरा करने का प्रयत्न करते हैं अर्थात् जिस कार्य को करने पर आपको पद, पैसा, प्रतिष्ठा, नाम आदि कुछ नहीं मिलता है, तब अपनी ऊर्जा और लय को बनाए रखना काफ़ी मुश्किल होता है। ऐसा हम सिर्फ़ तब कर पाते हैं जब उस कार्य के प्रति हमारा जुनून पागलपन की हद तक हो और हमारा उद्देश्य बहुत बड़ा हो। इसे मैं आपको गुरु रविंद्र नाथ टैगोर के जीवन की एक घटना, जिसकी सत्यता के बारे में मुझे नहीं पता है, से समझाने का प्रयत्न करता हूँ।

एक दिन संध्या के समय गुरु रविंद्र नाथ टैगोर अपने आश्रम शांति निकेतन में कविता लिख रहे थे। आमतौर पर वे लिखते समय इतने खो जाया करते थे कि उनके आस-पास क्या घट रहा है उन्हें पता ही नहीं चलता था। उस दिन एक शख़्स दबे पाँव उनके कक्ष में घुसा लेकिन वे अपने कार्य में इतने तल्लीन थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कोई अनजान उनके कक्ष में घुस कर उनके एकदम समीप आ गया है।


वह अनजान शख़्स एक डाकू था जो गुरु रविंद्र नाथ टैगोर की हत्या करने के उद्देश्य से उनके कक्ष में घुसा था। गुरुजी के समीप पहुँचते ही उसने अपनी कटार निकाली और तेज आवाज़ में बोला, ‘मरने के लिए तैयार हो जा! आज मैं तेरे प्राण लेकर जाऊँगा।’ डाकू की आवाज़ सुनकर गुरु रविंद्र नाथ टैगोर ने उसकी ओर कुछ इस तरह देखा जैसे उसकी धमकी से उन्हें कुछ फ़र्क़ ही नहीं पड़ा हो। वे एकदम शांत भाव के साथ बोले, ‘तनिक ठहरो, अभी मन में एक बहुत सुंदर भाव उत्पन्न हुआ है और अभी मैंने उस भाव को कविता के रूप में उतारना शुरू ही करा है। मैं इसे पूर्ण कर लूँ उसके पश्चात तुम मुझे मारकर अपना प्रण पूरा कर लेना। मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं बल्कि आनंदपूर्वक अपने प्राण दे दूँगा।’

इतना कहते ही गुरु रविंद्र नाथ टैगोर पुनः अपनी कविता को लिखने में, उसे पूर्ण करने में तल्लीन हो गए। डाकू एकदम हतप्रभ था, जीवन में पहली बार उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिला था जो मौत को अपने सामने देखकर भी भयभीत नहीं था। दूसरी ओर गुरु रविंद्र नाथ टैगोर अगले ही पल वापस कविता लिखने में ऐसे मगन हुए जैसे उन्हें पता ही ना हो कि उनके पास में, उनकी हत्या करने के उद्देश्य से आया डाकू खड़ा हुआ हो।


कहते हैं उस दिन गुरु रविंद्र नाथ टैगोर को कविता लिखने में बहुत समय लग गया। जब उनकी कविता पूर्ण हुई तब उन्होंने सर उठाकर देखा तो वह डाकू अभी भी वहीं खड़ा हुआ था। वे उसकी ओर देखते हुए बोले, ‘मैं लिखने में हुए अति विलंब के लिए क्षमा चाहता हूँ, पूर्ण भाव के साथ कविता अच्छे से लिखने की तल्लीनता में मैं तुम्हारे बारे में भूल ही गया था। अब तुम मेरे प्राण लेकर अपना प्रयोजन सिद्ध कर सकते हो। मैं पूरी तरह तैयार हूँ।’

गुरुजी के मुख से एकदम शांत भाव के साथ यह शब्द सुनते ही डाकू की आँखों से आँसू बहने लगे। डाकू ने अपने जीवन में पहली बार इतना सौम्य चित्त और कला साधक व्यक्ति देखा था। उसने कटार को दूर फेंका और रोते-रोते गुरुजी के चरणों में गिर पड़ा और क्षमायाचना करने लगा। गुरु रविंद्र नाथ टैगोर ने उसे उठाया और उसके साथ एक अतिथि समान व्यवहार करा।


कहानी पूरी होते ही मैंने उस युवा की ओर देखा और कहा, ‘बिना दृढ़ संकल्प, फ़ोकस और तन्मयता के किसी बड़े कार्य को सिद्ध करना या किसी नई चीज़ का सृजन करना सम्भव नहीं है। अगर तुम भी गुरु रविंद्र नाथ टैगोर की भाँति बिना अपने उद्देश्य से डिगे कार्य कर सकते हो तो निश्चित तौर पर अपना लक्ष्य पूर्ण कर सकते हो।’

जी हाँ दोस्तों, रास्ते में आने वाली परेशानियों पर नहीं बल्कि अपने लक्ष्य पर फ़ोकस करके ही हम अपने जीवन में सफल हो सकते हैं, शायद सफल होने का यही एकमात्र तरीक़ा है।


-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 
dreamsachieverspune@gmail.com

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