फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

विपरीत परिस्थितियों में होश ना खोएँ

विपरीत परिस्थितियों में होश ना खोएँ
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Jan 10, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

विपरीत परिस्थितियों में होश ना खोएँ !!!


आईए दोस्तों आज के लेख की शुरुआत किसी से सुनी एक कहानी से करते हैं। राम और श्याम, दो बड़े ही गरीब लेकिन बेहद ईमानदार दोस्त थे। गाँव में खेती-किसानी कर जैसे-तैसे अपना घर चलाया करते थे। वे हर-पल अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहा करते थे। एक दिन किसी परिचित ने उन्हें सुझाव दे दिया कि वे शहर में काम करके गाँव से ज़्यादा पैसा कमा सकते हैं। बस फिर क्या था दोनों पास ही के शहर पहुँच गए और काम खोजने लगे।


जल्द ही दोनों को अपने इस प्रयास में सफलता मिली, एक कंजूस सेठ ने दोनों को कुछ शर्तों के साथ नौकरी पर रखने की सहमति दे दी। राम और श्याम दोनों ही बड़े खुश थे, उन्होंने सेठ से उनका मेहनताना और नौकरी की शर्तें बताने का कहा। कंजूस सेठ बोला, ‘देखो मैं तुम्हें सालभर काम करने के एवज़ में 12 स्वर्ण मुद्राएँ दूँगा, लेकिन अगर तुमने कोई काम अच्छे से नहीं किया तो हर गलती पर चार स्वर्ण मुद्राएँ कट जाएगी। इसके अलावा तुम्हारे रहने, खाने की व्यवस्था अलग से कर दी जाएगी।


राम और श्याम दोनों मेहनती तो थे ही, उन्होंने सोचा यह तो बड़ा अच्छा सौदा है। रहना, खाना और अन्य ज़रूरत का सामान मुफ़्त में मिलने से हमारा खर्चा तो शून्य होगा और साल के अंत में हमारे पास बचत के रूप में 12 स्वर्ण मुद्राएँ होंगी। उन दोनों ने तुरंत नौकरी के लिए हाँ कह दिया।


सेठ दोनों को भरपूर काम बताता था लेकिन दोनों बिना कोई गलती करे दौड़-दौड़ कर सेठ के सारे कार्य कर दिया करते थे।

सेठ की आज्ञा का पालन करते-करते कब साल का अंतिम दिन आ गया पता ही नहीं चला। दोनों दोस्त उस दिन स्वर्ण मुद्राएँ मिलने की आस में बड़े खुश थे। वे सुबह-सुबह ही सेठ के पास पहुंचे और बोले, ‘सेठ जी, हमने पूरे साल जी-जान से आपकी सेवा करी है और कोई गलती भी नहीं करी है कृपया हमें हमारा मेहनताना अर्थात् 12 स्वर्ण मुद्राएँ देने की कृपा करें। सेठ जी तुरंत बोले, ‘हाँ तुम्हारा मेहनताना तो बिलकुल तैयार रखा है बस आज अंतिम दिन तुम मेरे तीन काम और कर दो और अपनी स्वर्ण मुद्राएँ ले जाओ। 


राम और श्याम दोनों खुश होते हुए बोले, ‘बताइए सेठ जी, अंतिम तीन कार्य क्या हैं?’ सेठ ने कुटिल हंसी हंसते हुए कहा, ‘तुम्हारा पहला कार्य, मिट्टी की इस बड़ी सुराही को इस छोटी सुराही में डालना है, दूसरा कार्य, इस कमरे में रखे गीले अनाज को बिना कमरे से बाहर निकाले सुखाना है और तीसरा व अंतिम कार्य तुम्हें मेरे सिर का सही वजन बताना है।’ सेठ की बात सुनते ही राम और श्याम दोनों के मुँह से एक साथ निकला, ‘सेठ जी यह तो असम्भव है?’ दोनों के मुँह से असम्भव सुनते ही सेठ कुटिल हंसी हंसते हुए बोला, ‘अगर तुम यह कार्य नहीं कर सकते हो तो हमारे बीच हुए सौदे के अनुसार में प्रति कार्य 4 स्वर्ण मुद्राएँ काट रहा हूँ। चलो भागो यहाँ से।’


दोनों हैरान थे, पर कर भी क्या सकते थे? मक्कार, झूठे और चालक सेठ की चालबाज़ी में राम और श्याम दोनों फँस जो गए थे। काफ़ी विचारने के बाद भी जब दोनों को कोई रास्ता नहीं सूझा तो दोनों बोझिल मन के साथ वहाँ से अपने गाँव के लिए चल दिए। दोनों अभी कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें रास्ते में एक पंडित जी मिल गये। पंडित जी ने दोनों के मन के भाव को पढ़ा और उनसे उदासी का कारण पूछा। राम और श्याम ने पंडित जी को पूरी बात सुना दी। पंडित जी तुरंत सेठ की चालकी समझ गए और दोनों को कुछ समझाकर वापस सेठ के पास भेज दिया।


राम और श्याम दोनों सेठ के पास जाते हैं और उनसे बोलते हैं, ‘सेठ जी, अभी आधा दिन बाकी है, हम आपके तीनों काम करने का प्रयास करते हैं।’ सेठ ने निश्चिंतता के भाव के साथ हाँ में सिर हिला दिया। सेठ से आज्ञा मिलते ही राम ने बड़ी सुराही उठाई और उसे जोर से ज़मीन पर दे मारा। सुराही टूट के कई टुकड़ों में बिखर गई। राम ने तुरंत उन टुकड़ों को उठाया और छोटी सुराही के अंदर डाल दिया और सेठ से बोला, ‘लो सेठ जी आपका पहला काम हो गया। अब हम अनाज सुखाने की व्यवस्था करते हैं।’ श्याम की बात सुनते ही सेठ बोला, ‘बिना धूप और हवा के अनाज सूखेगा कैसे?’ राम मुस्कुराते हुए बोला, ‘सेठ जी, बस आप देखते जाइए हम अनाज को बिना वहाँ से उठाए सूखा देंगे।’ 


सेठ कुछ समझता उससे पहले श्याम एक बड़ी हथौड़ी ले आया और उस कमरे के ऊपर की टिन की छत खोलने लगा और दूसरी और राम कमरे की दीवार तोड़ने लगा। दोनों के तेवर देख सेठ और वहाँ मौजूद अन्य लोग उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं कर पाते हैं। थोड़ी देर में दोनों ने कमरे की छत और दीवार तोड़ दी जिससे धूप और हवा दोनों अनाज पर लगने लगी। दूसरा कार्य अपनी ओर से पूरा करते ही दोनों सेठ के पास एक नंगी तलवार लेकर पहुँचते हैं और बोलते हैं, ‘सेठ जी जब तक अनाज सूखता है तब तक हम आपके सर का सही वजन निकाल लेते हैं। बस इसके लिए हमें आपके सर को आपके धड़ से अलग करना पड़ेगा। कृपया आप अपने स्थान से हिलिएगा मत ।’ इसके बाद क्या हुआ होगा आप समझ ही गए होंगे।


दोस्तों राम और श्याम के जीवन की ही तरह हम भी अपने जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियों से घिर जाते हैं जहाँ हमें उससे बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं सुझता है और चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है। लेकिन दोस्तों अगर जीवन में विजेता बनना चाहते हैं बस एक बाद याद रखिएगा, जो व्यक्ति बुरी या विपरीत परिस्थिति में भी अपने होश नहीं खोता, वही जीतता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

dreamsachieverspune@gmail.com

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