फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...
संस्कार, विचार और व्यवहार


Mar 23, 2021
संस्कार, विचार और व्यवहार…
दार्शनिक सुकरात के जीवन की एक घटना से हम आज के इस एपिसोड की शुरुआत करते हैं। दार्शनिक सुकरात बहुत ही बुद्धिमान लेकिन कुरूप थे। एक दिन उन्हें अपने शिष्य के साथ कहीं जाना था। सुकरात ने जाने के पूर्व आईना निकाला और उसमें खुद को निहारने लगे। कुरूप सुकरात को आईना निहारते देख शिष्य को हंसी आ गई लेकिन किसी तरह उसने अपने-आप को हंसने से रोक लिया। विद्वान सुकरात शिष्य के भाव को समझ गए और बोले, ‘वत्स, मुझे लगता है तुम सोच रहे हो कि मेरे जैसा कुरूप आदमी आईने में निहार क्यूँ रहा है?’
सुकरात के मुँह से हक़ीक़त सुन शिष्य की आँखें शर्म से झुक गई, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या बोले? सुकरात ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘देखो वत्स, शायद तुम्हें आईने की शक्ति का अंदाज़ा नहीं है। जब भी मैं आईना देखता हूँ, आईने की शक्ति मुझे याद दिला देती है कि मैं कितना कुरूप हूँ और अपनी शारीरिक कुरूपता का भान मुझे रोज़ अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करता है ताकी लोग मुझे कुरूपता की वजह से नहीं बल्कि मेरे करमों की वजह से याद रखें।
शिष्य को सुकरात की बात बहुत शिक्षाप्रद लगी लेकिन सुंदर शिष्य के मन में एक नए प्रश्न ने जन्म ले लिया था। वह बोला, ‘गुरुजी आपका तर्क उत्तम है। लेकिन अगर इस तर्क को सही माना जाए तो फिर सुंदर लोगों को तो आईना देखना ही नहीं चाहिए।’ सुकरात मुस्कुराए और बोले, ‘नहीं वत्स, उन्हें भी आईना अवश्य देखना चाहिए।’ सुकरात का जवाब सुन शिष्य दुविधा में पड़ गया और बोला, ‘सुंदर लोगों को आईना क्यों देखना चाहिए गुरुजी?’’
सुकरात बोले, ‘वत्स, उन्हें आईना इसलिए देखना चाहिए जिससे उन्हें ध्यान रहे कि वे जितने सुंदर हैं उन्हें उतना ही सुंदर काम करना है। लोग व्यक्ति को चेहरे से नहीं बल्कि उसके काम से याद रखते हैं।’ शिष्य सुकरात की बात की गहराई समझ उनके समक्ष नतमस्तक था।
दोस्तों, यह कहानी मुझे इंडिगो 6E-168 से मुंबई से इंदौर वापसी के दौरान घटी एक घटना की वजह से याद आई। फ़्लाइट पर समय से बोर्ड करने के पश्चात सभी यात्रियों ने अपने सामान को व्यवस्थित तरीक़े लगेज बॉक्स में रखा और अपनी निर्धारित सीट पर बैठ गए। टेक ऑफ़ क्लीयरेंस प्रॉसेस के दौरान ही दो युवाओं ने अपने परिवार के साथ फ़्लाइट को बोर्ड करा। शुरू में मुझे लगा शायद थोड़ा लेट हो जाने की वजह से वे हड़बड़ाहट में हैं, लेकिन मेरा अंदाज़ा पूरी तरह गलत था।
बोर्ड करते ही सबसे पहले उन्होंने केबिन क्रू से सीट अलग-अलग होने की वजह से विवाद करना शुरू करा। क्रू का कहना था कि फ़्लाइट टेक ऑफ़ के लिए रेडी है इसलिए वे अभी निर्धारित स्थान पर बैठ जाएँ। टेक ऑफ़ के बाद वह उन्हें उपलब्ध सीटों पर एड़जस्ट करने की कोशिश करेगी, लेकिन वे मानने के लिए तैयार ही नहीं थे। मौके की नज़ाकत देख उनके पास में बैठे शख़्स ने अपनी सीट उनसे एक्सचेंज कर ली। मामला यहाँ ख़त्म नहीं हुआ, परिवार को बैठाने के बाद उन सज्जन ने सीट के ठीक ऊपर स्थित लगेज बॉक्स में जगह ना होने के बाद भी अपना सामान रखा नहीं माफ़ कीजिएगा ठूसा। उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं थी कि वे अपना सामान दूसरों के लैपटॉप के ऊपर रख रहे हैं। जिन सज्जन का लैपटॉप था उन्होंने टोकते हुए अपना बेग ठीक रखते हुए कहा, ‘भाई साहब बेग में मेरा लैपटॉप है।’ सुनते ही वे सज्जन बेपरवाह अन्दाज़ में बोले, ‘मेरे बेग में भी मेरा लाख रुपए का कैमरा है।’
थोड़ी देर बाद क्रू ने उन सज्जन से बच्चों को मास्क पहनाने का अनुरोध करा तो वे एक बार फिर बिफर पड़े और लगभग चिल्लाते हुए बोले, ‘आपको पता नहीं है क्या, इस उम्र के बच्चों के लिए मास्क पहनना आवश्यक नहीं है।’ इसी तरह पूरी यात्रा के दौरान वे सभी को एहसास कराने का प्रयत्न कर रहे थे कि वे कितने ‘पढ़े लिखे’, ’अमीर?’, ‘परिवार का ध्यान रखने वाले?’ और ‘अपने अधिकारों’ के प्रति सजग हैं। हालाँकि उनका व्यवहार बता रहा था कि ‘अपने कर्तव्यों’ की उन्हें कोई चिंता नहीं थी। इसके ठीक विपरीत काफ़ी सारे यात्रियों ने अपने अच्छे स्वभाव से क्रू का परिचय हमारे शहर की तहज़ीब से भी कराया।
ख़ैर वाक् युद्ध के बीच हम इंदौर पहुँच गए। एक सज्जन जिन्हें मैं पहचानता तो नहीं हूँ पर उनकी बातचीत सुन मुझे एहसास हुआ कि शायद वे सी.ए. हैं, ने उन युवाओं को उनके बुरे व्यवहार के लिए टोका और उन्हें एहसास करवाने का प्रयत्न किया कि उनका व्यवहार हमारे शहर की छवि को ख़राब कर रहा है। इस पर वे युवा एक बार फिर भड़के और बोले, ‘इंदौरी भाषा और बोली इसी तरह की है।’ लेकिन दूसरे यात्रियों के विरोध की वजह से वे ज़्यादा कुछ कह नहीं पाए।
विमान से उतरने के बाद जहां सभी यात्री बस की ओर गए, वहीं वे युवा एक बार फिर क्रू के साथ विवाद करने लगे। इसका अंत क्या हुआ वह तो मुझे नहीं पता क्यूँकि ग्राउंड स्टाफ़ के इशारे पर बस हमें एग्ज़िट टर्मिनल की ओर लेकर चली गई। एयरपोर्ट से घर आते वक्त मैं सोच रहा था कि पैसा आपको संसाधन तो उपलब्ध करवा सकता है लेकिन संस्कार नहीं दे सकता।
दोस्तों, मात्र एक व्यक्ति के व्यवहार की वजह से ‘स्वच्छता में नम्बर 1’ शहर की हमारी छवि पर ‘व्यवहारिक ना होने का’ तमग़ा मिल गया था। जी हाँ दोस्तों, जो स्वच्छता का भाव हम सार्वजनिक स्थानों पर दिखाते हैं वही हमें अपनी सोच, अपने भाव और अपने आचरण में भी दिखाना होगा। याद रखिएगा सुंदरता तात्कालिक होती है लेकिन अच्छे व्यवहार और विचारों की सुगंध यादों के रूप में हमेशा रहती है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com