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सफलता के 6 मूलभूत सूत्र

सफलता के 6 मूलभूत सूत्र
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Dec 24, 2021

सफलता के 6 मूलभूत सूत्र !!!


दोस्तों जीवन में हर कोई सफल होना चाहता है, लेकिन उनमें से लगभग 90% सफल नहीं हो पाते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि वह समझ ही नहीं पाता है कि उसके लिए सफलता है क्या? कभी वह सफलता को पैसे से जोड़कर देखता है, तो कभी समाज से मिलने वाली इज्जत, तो कभी किसी और चाहत से। लेकिन जब वह पैसे, इज्जत या और कोई अन्य चाह पूरी कर लेता है, तो उसे समझ ही नहीं आता कि अब आगे क्या किया जाए? ऐसी स्थिति में सब कुछ होते हुए भी वह एक अजीब सा ख़ालीपन महसूस करता है, उसे लगता है कि कहीं-ना-कहीं कुछ अधूरापन है।


मेरी नज़र में दोस्तों, सफलता कई बातों के बीच के सामंजस्य की स्थिति को कहा जा सकता है जहाँ इंसान के जीवन की सभी ज़रूरतें पूरी होती हों। जैसे प्यार, परिवार, पैसा, इज्जत, प्रशंसा, समाज में महत्वपूर्ण होने का अहसास, सम्मान, अच्छे रिश्ते, अच्छा स्वास्थ्य, सांसारिक सुख, आध्यात्मिक सुख, लोगों की मदद करने की क्षमता आदि। लेकिन दोस्तों सफलता को इन्हीं शब्दों तक सीमित रखना भी सम्भव नहीं है। इस शब्द का अर्थ बड़ा व्यापक है, जिसे ऐसे किसी कार्य की पूर्ति से जोड़ा जा सके। लेकिन एक बात तो तय है दोस्तों, मेरी नज़र में सफलता को संतुष्टि से जोड़कर देखा जा सकता है अर्थात् एक ऐसा सुखद एहसास जो कुछ चाही गई चीजों के पाने पर हमें मिलता है। 


अगर आप सफल होने की चाह रखते हैं दोस्तों तो सबसे पहले अपने जीवन का उद्देश्य पहचानिए और उसकी पूर्ति के लिए निम्न छः सूत्रों को अपने जीवन का हिस्सा बनाइए-


पहला सूत्र - प्रबल इच्छा 

मेरी नज़र में दोस्तों इच्छा सफलता का बीज है। जैसे जैसे इच्छा बढ़ती जाती है यह बीज पौधे और फिर वृक्ष का रूप ले लेता है। इस हिसाब से प्रबल इच्छा होना अर्थात् किसी चीज़ को पाने की अभिलाषा या गहरी चाहत होना। जैसे, मनुष्य की उड़ने की ललक, इच्छा ने ही उसको हवाई जहाज़ का अविष्कार करने के लिए प्रेरित किया था।


इस आधार पर कहा जा सकता है कि सफलता अथवा किसी भी चीज़ को पाने की चाह, इच्छा, सफलता की यात्रा का शुरुआती बिंदु होती है। अगर इच्छा कमजोर होगी तो परिणाम छोटा होगा और अगर इच्छा प्रबल होगी तो परिणाम भी वैसा ही बड़ा होगा। इसीलिए एनॉन ने कहा है, ‘मनुष्य की उपलब्धियों की सीमा उसकी इच्छाशक्ति पर निर्भर है।’


अगर आप जीवन में सफल होना चाहते हैं तो सबसे पहले अपनी इच्छा को प्रबल बनाकर उसे शक्ति दें अर्थात् उसे इच्छाशक्ति में परिवर्तित करें। जब आप अपनी पूरी शक्ति के साथ किसी चीज़ को पाने की चाहत पैदा कर लेते हैं, उसके लिए प्रयास करते हैं आप सफलता की पहली सीधी चढ़ जाते हैं जहां से आपको आगे का रास्ता दिखाई देने लगता है।


दूसरा सूत्र - दृढ़ संकल्प 

दोस्तों मेरा मानना है कि सफल और असफल इंसान ज्ञान, योग्यता, इच्छा, प्रयास के आधार पर एक समान हो सकते हैं, लेकिन इनके परिणाम में जो अंतर हमें देखने को मिलता है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्पित रहने की वजह से आता है। इसका अर्थ यह हुआ कि सफल होने, अपने सपने का जीवन बनाने के लिए संकल्प शक्ति का होना आवश्यक है। वैसे भी हर इच्छा संकल्प से जुड़ी होती है लेकिन जब तक वह संकल्प की सीमा को छू नहीं लेती वह हक़ीक़त नहीं बन पाती है। सीधे शब्दों में कहूँ तो दोस्तों, असफलता सिर्फ ये प्रमाणित करती है कि सफल होने के लिए हमारा संकल्प पर्याप्त दृढ़ नहीं था। इसीलिए महान विचारक एमर्सन ने कहा है, ‘इतिहास इस बात का साक्षी है कि मनुष्य की संकल्प शक्ति के सम्मुख देव हो या दानव सभी पराजित हुए हैं।’ इसलिए दोस्तों अगर सफलता चाहते हैं तो सबसे पहले उसके प्रति दृढ़ संकल्पित रहें।


तीसरा सूत्र - अनुशासन

अनुशासन और सफलता मेरी नज़र में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अनुशासित होना अर्थात् किसी कार्य या लक्ष्य के प्रति अपनी ओर से स्व-शासित व्यवहार करना या सरल शब्दों में कहूँ तो नियमों में रहकर, नियमित रूप से अपने कार्य को करना। इसीलिए अनुशासन को सफलता की कुंजी कहा जाता है। अगर कोई व्यक्ति अपने लक्ष्यों, अपने कार्यों के प्रति अनुशासित नहीं रह सकता तो वह सफल हो ही नहीं सकता। इसीलिए दोस्तों आप सुपर स्टार अमिताभ बच्चन, पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम,  इंफ़ोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति, रिलायंस के संस्थापक धीरू भाई अम्बानी, महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर किसी को भी देख लीजिए, इन सभी ने अनुशासित रहते हुए साधारण से असाधारण व्यक्तित्व की यात्रा की है।


चौथा सूत्र - निष्ठावान और निडरता 

जब आप अपनी इच्छाओं को प्रबल इच्छा में बदल उसे अपना लक्ष्य बना लेते हैं और उस लक्ष्य को हक़ीक़त में बदलने के लिए दृढ़ संकल्पित और अनुशासित रहते हुए कर्म करते हैं। रास्ते में कैसी भी बाधाएँ क्यों ना हों, निडरता के साथ अपने कर्मों के प्रति निष्ठावान रहते हैं और सपनों को हक़ीक़त में बदल देते हैं। इसीलिए कहते हैं, ‘वास्तविक ज्ञान और अडिग आत्मविश्वास के साथ अपने कर्म पथ पर निरंतर बढ़ने वाले पथिक एक दिन सफलता के शिखर को अवश्य प्राप्त करते हैं।’ दोस्तों अगर सफल होना है तो बाधाओं से भयभीत हुए बिना, सदा अपने कर्मों के प्रति निष्ठावान रहें।

 

पाँचवाँ सूत्र - समर्पण 

आधे-अधूरे मन से किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं बना सकता है। चाणक्य नीति के अनुसार कर्म क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को सफलता अपनी पसंद, विश्वास और समर्पण के कारण मिलती है। अगर आप अप्रत्याशित सफलता चाहते हैं तो अपनी पसंद, विश्वास को आधार बनाकर लक्ष्य बनाएँ और उसके प्रति समर्पित रहते हुए कार्य करें। समर्पित होना मतलब, अपने बनाए लक्ष्य, उसके लिए किए जाने वाले कार्य के लिए अपना सब कुछ अर्पित कर देना या सौंप देना। अर्थात् जब तक वह कार्य पूर्ण नहीं हो जाता तब तक आप कोई और कार्य पूरा करने के स्थान पर उसे ही पूरा करने में लगे रहेंगे।


छठा सूत्र - प्रभु इच्छा और नियति

कई बार दोस्तों आप उपरोक्त सभी नियमों का पालन करते हुए, अपना सर्वश्रेष्ठ भी देते हैं, लेकिन उसके बाद भी आपको मनचाहा परिणाम अर्थात् सफलता नहीं मिल पाती है। ऐसे में खुद को, परिस्थितियों को अथवा क़िस्मत को दोष देने के स्थान पर परिणाम को ‘हरी इच्छा’ मानकर स्वीकारना आपको भविष्य के गर्त में छिपी आपकी सफलता के लिए तैयार करता है, जो निश्चित तौर पर आपके बनाए लक्ष्यों से कई गुना बड़ी होती है क्यूँकि आपके लिए यह सपना आपने नहीं बल्कि ईश्वर ने देखा था।


तो चलिए दोस्तों देर किस बात की उपरोक्त सूत्रों पर कार्य करें और सफल बनें।


-निर्मल भटनागर

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