फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

सफलता प्रतिभा की अपेक्षा दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर करती है

सफलता प्रतिभा की अपेक्षा दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर करती है
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Dec 30, 2021

सफलता प्रतिभा की अपेक्षा दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर करती है !!!


दोस्तों, अब हम वर्ष 2021 के अंत में खड़े हैं और इस वर्ष भी हर वर्ष की तरह आपने अपने कई रेज़लूशन अथवा सपनों को पूरा करा होगा और कई अभी भी लिस्ट में रहने के बाद अधूरे छूट गए होंगे। कुछ लोगों को यह साल लाभदायक लग रहा होगा तो कुछ लोग इसे जीवन के कठिन वर्षों में से एक मान रहे होंगे क्यूँकि जीवन की बाक़ी सब चुनौतियों के साथ हमने इस वर्ष कोविद 19 के दुष्प्रभावों को भी झेला है। लेकिन स्थिति कुछ भी क्यूँ ना हो दोस्तों, हमें एक बात हमेशा याद रखना चाहिए कि हम अकेले नहीं हैं जिसने इस तरह की चुनौतियों का सामना किया है। हमसे पहले भी कई लोगों ने और आने वाली पीढ़ियों में भी कई लोग होंगे जो इससे भी बुरी स्थितियों के बीच विजेता बनकर निकलेंगे। आइए एक सच्ची कहानी से इसे हम समझने का प्रयास करते हैं-


सितम्बर 9, 1890 को अमेरिका के इंडियाना प्रांत के हेनरीविल्ले में जन्में इस बच्चे ने ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी के 5 वर्ष की आयु में इसके पिता की मृत्यु हो गई। माँ ने अपनी ओर से इस बच्चे को सब कुछ देने का प्रयास करा लेकिन उसके बाद भी 16 वर्ष की आयु में पारिस्थितिक कारणों से इस बच्चे को अपने विद्यालय को छोड़ना पड़ा और अपनी व अपने परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नौकरी करनी पड़ी।


मात्र एक वर्ष अर्थात् 17 वर्ष की आयु पूरे होते-होते इस बच्चे ने 4 बार अपनी नौकरी से हाथ धोया। ख़ैर जैसा अक्सर कहा जाता है, चलती का नाम ही ज़िंदगी है, इन सभी चुनौतियों के बीच मात्र 18 वर्ष की आयु में इस युवा की शादी कर दी गई और 19 वर्ष की आयु में यह युवा एक प्यारी सी बेटी का पिता बन गया। अपने और अपने परिवार के सपनों को पूरा करने की दिशा में 18-22 वर्ष की उम्र तक इस युवा ने रेल-रोड कंडक्टर के रूप में कार्य किया, पर यहाँ भी उसे असफलता ही हाथ लगी और इसी दौरान 20 वर्ष की आयु में इस युवा की पत्नी, बेटी को साथ लेकर इसे छोड़कर चली गई।


हार मानने की जगह इस युवा ने आर्मी में अपनी क़िस्मत आज़माई लेकिन वहाँ भी असफलता हाथ लगी और इसके बाद लॉ स्कूल में भी रिजेक्ट किया गया। अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इस युवा ने जीवन बीमा के क्षेत्र में भी हाथ आज़माया लेकिन असफलता ने यहाँ भी इसका पीछा नहीं छोड़ा और इस युवा को एक छोटे से कैफ़े में कुक और बर्तन साफ़ करने वाले के रूप में काम करना पड़ा। जीवन में मिली भावनात्मक और व्यवसायिक असफलताओं के चलते एक बार इस युवा ने अपनी ही बेटी के अपहरण का प्रयास करा लेकिन वहाँ भी इसे असफलता ही हाथ लगी लेकिन इस प्रयास के दौरान इसने अपनी पत्नी को वापस से साथ रहने के लिए मना लिया और जीवन की नैया इसी तरह हिचकोले खाते हुए चलती रही। 


65 वर्ष की आयु में यह सज्जन रिटायर हो गए और कुल जमा पूँजी के रूप में इन्हें सरकार से 105 डॉलर का चेक मिला। इस चेक को देख इस व्यक्ति को लगा कि उसका जीवन तो पूरा व्यर्थ ही गया है और वह अपना भरण-पोषण करने में भी सक्षम नहीं है। इस विचार की वजह से 65 वर्ष की आयु में इसने आत्महत्या करने का विचार किया और एक पेड़ के नीचे बैठकर अपनी वसीयत लिखने लगा।


वसीयत लिखते समय इस व्यक्ति के मन के विचार बदले और इसने वसीयत के स्थान पर वह जीवन में क्या प्राप्त करना चाहता था यह लिख लिया। यह लिखते वक्त उसे एहसास हुआ कि अभी तो जीवन में करने के लिए बहुत कुछ बचा हुआ है और साथ ही मेरे अंदर भी कुछ चीज़ें, कुछ योग्यताएँ है जिसे उपयोग में लाना बचा हुआ है। अपने एक मित्र के सुझाव पर उन्होंने खाना बनाने की अपनी योग्यता, जिसे वे दूसरों से कई गुना बेहतर कर सकते थे, को आज़माने का निर्णय लिया और सरकार द्वारा रिटायरमेंट पर दिए गए 105 डॉलर के चेक के एवज़ में अपने दोस्त से 87 डॉलर उधार लेकर अपनी यूनिक रेसिपी से चिकन बनाने लगे और केंटकी, जहाँ वे रहते थे, के आस-पास और परिचित लोगों को बेचने लगे और इस तरह उन्होंने केंटकी फ्राइड चिकन अर्थात् केएफसी की शुरुआत करी।


जी हाँ दोस्तों, आप सही पहचान रहे हैं मैं केएफ़सी के संस्थापक कर्नल सैंडर्स की बात कर रहा हूँ, जो 65 वर्ष की उम्र में खुद को असफल और किसी भी काम का ना मान आत्महत्या करने वाले थे लेकिन अपनी योग्यता और क्षमता पर विश्वास करते हुए एक और प्रयास करने पर 88 वर्ष की आयु में अरबपति बन चुके थे और उनका व्यवसाय अब लगभग पूरी दुनिया में फैल चुका था।


जी हाँ दोस्तों, नई शुरुआत करने के लिए आप कभी भी लेट नहीं होते और जब तक आप हार नहीं मान लेते, उम्मीद नहीं छोड़ देते, तब तक आपके जीतने और सपने पूरे करने की सम्भावना बनी हुई रहती है। इसलिए जीवन में हमेशा याद रखें कि सफल होना है तो अपने दृष्टिकोण को सही रखें, फिर चाहे समय कितना भी मुश्किल क्यों ना हो। यही तो दोस्तों मेरे गुरु श्री राजेश अग्रवाल ने मुझे सिखाया है, ‘सफलता प्रतिभा की अपेक्षा दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर करती है।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

dreamsachieverspune@gmail.com

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