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सब्र, संयम और सफलता - भाग 1

सब्र, संयम और सफलता - भाग 1
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Nov 1, 2021

सब्र, संयम और सफलता - भाग 1


बचपन में शायद हम सभी को कभी ना कभी तो यह सिखाया ही गया है कि, ‘सब्र का फल मीठा होता है।’ लेकिन दोस्तों उसके बाद भी, सब कुछ पाने की चाह में हर कोई आजकल दौड़ता हुआ ही नज़र आता है। मुझे तो ऐसा लगता है जैसे जल्दबाज़ी ने हमारे मन में ही जगह बना ली है। खाना खाना हो या गाड़ी चलाना हो जल्दबाज़ी में लोग आपको अपनी जान, अपनी सेहत को दांव पर लगाते हुए दिख जाएँगे। ऐसे लोगों से मैं सिर्फ़ एक प्रश्न पूछना चाहूँगा, क्या यह जल्दबाज़ी आपको अपने लक्ष्य तक पहुँचने में कुछ अतिरिक्त मदद करेगी? या आपको समय से पहले जीवन में सफल बनाएगी?


वैसे यह प्रश्न मैंने आपसे इसलिए पूछा क्यूँकि 1960 के दशक में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर वाल्टर मिशेल और उनकी टीम द्वारा ‘सब्र’ के विषय में कई सारे अध्ययन किए गए, और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन सभी अध्ययनों के परिणाम हमारी आम धारणाओं के विपरीत निकले। आइए थोड़ी सी चर्चा उस रिसर्च और उससे मिलने वाले परिणामों की करते हैं। लेकिन उस रिसर्च या प्रयोग के बारे में आगे बताने से पहले मैं आपको बता दूँ की स्वास्थ्य, कार्य और जीवन में सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले ज़्यादातर सिद्धांत इसी प्रयोग या रिसर्च के परिणामों से निकले हैं, तो चलिए शुरू करते हैं-


मिशेल और उनकी टीम ने 4 से 5 वर्ष के सैंकड़ों बच्चों के समूह पर एक प्रयोग किया। अपने प्रयोग के दौरान, मिशेल और उनकी टीम ने बच्चों को एक-एक करके एक कमरे में बुलाया और उन्हें एक कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। कुर्सी पर बैठते ही उनके सामने एक मार्शमेलो रख दिया गया और शोधकर्ता ने बच्चे से कहा, ‘मैं कुछ देर में वापस आता हूँ अगर तब तक तुमने इस मार्शमेलो को नहीं खाया तो मैं तुम्हें इनाम में एक और मार्शमेलो दूँगा, मतलब तुम्हें दो मार्शमेलो मिलेंगे। इतना कहते हुए शोधकर्ता पंद्रह मिनिट के लिए कमरे से बाहर चला गया।


बच्चों के लिए चुनाव बेहद आसान था, या तो अभी एक मार्शमेलो ले लें या फिर सब्र करने पर कुछ देर बाद उन्हें दो मार्शमेलो मिलेंगी। लेकिन शोधकर्ता के जाने के तत्काल बाद कुछ बच्चों ने मार्शमेलो को खा लिया। जबकि कुछ बच्चों ने शोधकर्ता के वापस आने तक रुकने का निर्णय लिया लेकिन वे भी ज़्यादा देर तक खुद पर कंट्रोल नहीं रख पाए और मार्शमेलो को उठाकर खा गए। लेकिन इसके बाद भी कुछ बच्चे ऐसे थे जिन्होंने धैर्य और संयम का परिचय देते हुए शोधकर्ता के वापस आने का इंतज़ार किया और अंततः इनाम सहित दो मार्शमेलो लेने में सफल रहे।


वर्ष 1972 में इस लोकप्रिय अध्ययन को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया गया और इसे ’द मार्शमैलो एक्सपेरिमेंट’ के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन दोस्तों इस अध्ययन को जिस प्रयोग ने प्रसिद्ध और दिलचस्प बनाया, वह इस सिद्धांत के आने के कई वर्षों बाद किया गया। इस प्रयोग को हम ‘विलंबित संतुष्टि की शक्ति’ के सिद्धांत के रूप में जानते हैं।


इस नए प्रयोग में मार्शमेलो एक्सपेरिमेंट में इनाम स्वरूप अतिरिक्त मार्शमेलो पाने के लिए अंत तक रुके बच्चों पर अध्ययन किया गया और परिणाम में पाया गया कि अंत तक रुके बच्चे अपने जीवन में जल्दबाज़ी करने वाले बच्चों के मुक़ाबले बहुत बेहतर कर रहे थे। वे परीक्षा में ना सिर्फ़ बेहतर अंक ला रहे थे बल्कि वे मादक द्रव्यों के सेवन से खुद को बचाए रखने में सफल थे। साथ ही इन बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर था, इन्होंने खुद को मोटा नहीं होने दिया और उन बच्चों के माता-पिता भी उनसे खुश थे। इतना ही नहीं दोस्तों इन बच्चों को सामाजिक रूप से भी ज़्यादा ऐक्टिव पाया गया।


इस नए अध्ययन को शोधकर्ताओं ने 40 से अधिक वर्षों तक जारी रखा और पाया कि दूसरी मार्शमेलो को पाने के लिए धैर्य रखने वाले बच्चे जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो रहे थे। इस प्रयोग ने साबित कर दिया था कि जीवन में सफलता के लिए धैर्य रखने की क्षमता होना अनिवार्य है। वैसे दोस्तों आप इस प्रयोग को अपने दैनिक जीवन से भी जोड़कर देख सकते हैं। उदाहरण के लिए-


1) यदि आप टेलीविजन देखकर मिलने वाली संतुष्टि का त्याग कर अपना होमवर्क या पढ़ाई पूरी करते हैं तो निश्चित तौर पर आप दूसरों के मुक़ाबले अधिक सीख पाएँगे और परीक्षा में बेहतर परिणाम ला पाएँगे।

2) अगर आप फ़ास्ट फ़ूड खाने से मिलने वाली संतुष्टि का त्याग कर स्वास्थ्यवर्धक भोजन करेंगे तो निश्चित तौर पर ज़्यादा लम्बे समय तक ऊर्जावान रहेंगे।

3) अगर आप आराम से मिलने वाली संतुष्टि का त्यागकर रोज़ कसरत करेंगे तो निश्चित तौर पर लम्बे समय तक स्वस्थ रहेंगे। 


दोस्तों हम ऐसे असंख्य उदाहरण लेकर देख सकते हैं। आप सभी उदाहरणों में पाएँगे कि सफलता ने उन लोगों के कदमों को चूमा है जिन्होंने आसान रास्तों, जल्दबाज़ी या व्याकुलता के स्थान पर अनुशासित रहने का रास्ता चुना था और इसे ही हम ‘विलंबित संतुष्टि की शक्ति’ के सिद्धांत के रूप में जानते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

dreamsachieverspune@gmail.com

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