फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

सम्भालें रिश्तों को विश्वास से

सम्भालें रिश्तों को विश्वास से
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July 28, 2021

सम्भालें रिश्तों को विश्वास से… 


काउन्सलिंग के अपने कार्य के  दौरान पिछले कुछ वर्षों में मैंने महसूस करा है कि आजकल सबसे ज़्यादा विश्वास और अपनत्व के साथ चलने वाले पति-पत्नी के रिश्तों में ही सबसे ज़्यादा परेशानियाँ देखने को मिल रही हैं। सात जन्मों के कहे जाने वाले इस रिश्ते में कुछ माह या कुछ सालों के भीतर ही दरार पड़ना शुरू हो जाती है, फिर चाहे वह कपल गाँव में रहता हो या शहर में अथवा वह पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ या फिर वह अमीर हो या गरीब इससे कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ता।


वैसे दोस्तों सिर्फ़ इसी रिश्ते की बात क्यों करें, आजकल ज़्यादातर रिश्तों का यही हाल चल रहा है और सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इन झगड़ों के पीछे कोई बहुत बड़ी समस्या या कारण नहीं होता। जहाँ तक मुझे लगता है, आजकल हम इतने अधिक स्व-केंद्रित अर्थात् सेल्फ़ सेंटर्ड होते जा रहे हैं कि रिश्तों को सम्भालने के लिए थोड़ा सा झुकना या आपसी प्राथमिकताओं को बैलेंस करना अर्थात् थोड़ा - सा समझौता करना ही नहीं चाहते हैं और फ़िल्मों में देखे गए रिश्तों के समान ही कल्पना वाला जीवन जीना चाहते हैं। 


शायद रिश्तों में अत्यधिक अपेक्षा रखना और समय रहते बातचीत या व्यवहार में परिवर्तन लाकर इन्हें दूर ना कर पाना, आपसी विश्वास को ख़त्म कर देता है। इसे मैं आपको एक सच्ची घटना के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ। 


कुछ दिन पूर्व मेरे एक परिचित की लड़की ने इंदौर में एक प्लॉट ख़रीदा लेकिन कोरोना काल के दौरान आई कुछ दिक्कतों की वजह से वे समय से उसकी रजिस्ट्री नहीं करवा पाईं। इस दौरान क़ीमत बढ़ने की वजह से प्लॉट के पुराने मालिक के मन में पैसे लेने के बाद भी लालच आ गया और वे सौदा रद्द करने पर अड़ गए। मेरे मित्र ने किसी तरह प्लॉट मालिक को राज़ी किया और उसकी रजिस्ट्री अपनी बेटी के नाम करवा दी। बेटी ने ख़ुशी-ख़ुशी जब यह बात अपने पति को बतलाई तो वे नाराज़ हो गए और बोले कि हमें इसकी रजिस्ट्री दोनों के नाम करवानी थी। उसने जब परिस्थिति बताते हुए कहा चूँकि आप शहर से काफ़ी दूर थे और इस बात की रिस्क थी कि सामने वाला फिर ना पलट जाए इसलिए मजबूरी में  उसे यह निर्णय लेना पड़ा। लेकिन वे सब सुनने के बाद भी समझने के लिए राज़ी नहीं थे।


दोस्तों यह छोटी सी बात इतना बढ़ गई कि लड़की के पिता दोनों को काउन्सलिंग के लिए मेरे पास लेकर आए। पूरी कहानी सुनने के बाद मैं सोच रहा था कि वे सज्जन (लड़की का पति) एक अनजान व्यक्ति (प्लॉट के पुराने मालिक जो पहले एक बार पैसे लेने के बाद अपनी बात से पलट चुका ) पर और विश्वास करने के लिए राज़ी थे लेकिन उन्हें अपनी पत्नी के एक निर्णय पर भरोसा नहीं था या इससे उनके ईगो को इतनी ठेस पहुँचा दी थी कि वे कुछ समझने के लिए राज़ी ही नहीं थे। मैंने उन्हें समझाने के लिए एक कहानी सुनाई जो इस प्रकार थी-


दो प्यारे से बच्चे, शाम के समय अपने घर के पास एक बगीचे में खेल रहे थे। कुछ देर खेलने के पश्चात वे पार्क में लगी एक बेंच पर आकर बैठ गए। बेंच पर बैठे लड़के के हाथ में बहुत सुंदर कंचे अर्थात् मार्बल्स थे और पास ही बैठी लड़की के छोटे से बैग में खाने के लिए बहुत प्यारी-प्यारी चॉकलेट थीं। दोनों ही बच्चे एक दूसरे की चीजों के प्रति आकर्षित थे और किसी भी तरह वह हासिल करना चाहते थे।


कुछ देर पश्चात उस लड़के ने लड़की को उसकी सारी चॉकलेट के बदले अपने सभी कंचे देने का प्रस्ताव दिया। लड़की को भी लगा जैसे उसके मन की मुराद पूरी हो रही है उसने तुरंत उस लड़के के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। लेकिन लड़के के मन में तो कुछ और ही चल रहा था। उसने लड़की की नज़रों से बचा कर उन कंचों में से सबसे खूबसूरत कंचे को अपनी जेब में छुपा लिया और बचे हुए सारे कंचे उस लड़की को देकर वादे के अनुसार उससे सभी चॉकलेट ले लीं। 


कुछ देर पश्चात दोनों बच्चे अपने-अपने घर चले गए। लेकिन उस रात कुछ अलग - सी घटना घटी, वह लड़की तो अपने सभी दैनिक कार्य पूर्ण कर आराम से सो गई लेकिन उस लड़के को पूरी रात अच्छे से नींद नहीं आई। उसे लग रहा था शायद उस लड़की ने सबसे स्वादिष्ट चॉकलेट छुपाकर अपने पास तो नहीं रख ली है जैसे उसने सबसे सुंदर कंचे को छुपाकर रख लिया था। 


कहानी पूरी होते ही मैंने उन्हें कुछ और बातें बताईं एवं समझाते हुए मामले को ख़त्म किया। याद रखिएगा दोस्तों, ‘यदि आप किसी रिश्ते में अपना सौ प्रतिशत नहीं दे रहे हैं तो आप सामने वाले पर हमेशा संदेह करते रहेंगे। अगर आप चाहते हैं कि सामने वाला रिश्ते में अपना सर्वस्व दे तो अपेक्षा करने के स्थान पर अपना सर्वस्व देना शुरू कर दीजिए।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

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