दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

अलग नतीजों के लिए चुनें अलग विकल्प

अलग नतीजों के लिए चुनें अलग विकल्प
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Aug 24, 2021

अलग नतीजों के लिए चुनें अलग विकल्प


आमतौर पर कंपनियां, कॉर्पोरेशन और नगरीय निकाय अपने लोगों को विदेश भेजती हैं ताकि वे खुद अनुभव कर सकें कि कैसे इन जगहों ने आधुनिक नगरीय सुविधाओं के समाधान के लिए गुणवत्ता संबंधी पहल कीं और सार्वजनिक सुविधाएं अपनाईं। लेकिन अब प्रबंधकों या प्राधिकरणों में एक नई सोच पनपी है। अन्य विकल्पों को पूरी तरह समझने से पहले वे सीखना चाहते हैं कि ‘क्या नहीं करना चाहिए’। विदेश में ऐसी यात्राएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम आम है। हाल ही में नगरीय प्राधिकरणों और ‘एरिया लोकल मेनैजमेंट’ समूहों को सलाह देने वाले हम कुछ दोस्तों ने बेंगलुरु जाकर कुछ ऐसी गलतियां समझने का फैसला लिया, जिनसे बचना चाहिए। उनमें से कुछ ये रहीं:


बेंगलुरु अपनी हरियाली के लिए जाना जाता था। पर आज पर्यावरणीय प्रदूषण के मामले में यह तीसरा सबसे प्रभावित भारतीय शहर है। यह शहर साफ हवा पाने में भारी निवेश कर रहा है। नगरीय निकाय ने वायु प्रदूषण का सामना करने के लिए कुछ जगहों पर एयर प्यूरीफायर मशीनें लगाई हैं। आगे और मशीनें लगाने की योजना है। आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर सच्चिदानंद त्रिपाठी कहते हैं कि एमबिएंट एयर प्यूरीफायर पर काफी बात हो रही है, लेकिन न तो इसके प्रदर्शन को अच्छे से दर्ज किया गया है और न ही इसकी समीक्षा किसी जर्नल में प्रकाशित हुई है। वे कहते हैं कि इसमें व्यावहारिक समस्याएं हैं और हवा साफ करना मुश्किल काम है, जिसमें कई सवाल उठते हैं, जैसे, एक टॉवर कितनी हवा खींच सकता है? इसके लिए बिजली कहां से आएगी? मशीन काम करना शुरू करेगी तो पार्टिकुलेट मैटर कहां जाएंगे? फिल्टर कितनी बार और कैसे साफ करने चाहिए? इन चुनौतियों पर पहले विचार करना जरूरी है।


प्रोफेसर त्रिपाठी केंद्र के स्वच्छ वायु कार्यक्रम का हिस्सा हैं। वे वायु प्रदूषण से लड़ने के लिए कई अन्य विकल्पों का सुझाव देते हैं, जिसमें उत्सर्जन कम करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल, सड़क की धूल कम करना आदि शामिल है। उनके मुताबिक एयर प्यूरीफाइंग टॉवर या मशीनें लगाना ‘बैंड-एड’ समाधान है, स्थायी समाधान नहीं।


नई ग्रीन बाइसिकल लेन का उदाहरण देखें, जो स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं। आज ये साइकिल ट्रैक रखरखाव के अभाव में टूट रहे हैं और खुद प्राधिकरणों ने इन्हें छोड़ दिया है। इस तरह देश की सिलिकॉन सिटी में साइकिलिंग का आनंद खत्म हो गया है। राज भवन के सामने स्थित साइकिल ट्रैक में गटर का पानी भरकर बाहर आ रहा है। उसकी ऊपरी परत पहले ही उखड़ चुकी है। बेशक यह बेंगलुरु है! यह संचालन में उत्कृष्टता लाए बिना कई अनुबंधों के साथ नगरीय निकाय चलाने का उदाहरण है। ऐसे दृश्य नगरीय प्राधिकरणों की छवि खराब करते हैं।


एक और परेशान करने वाली चीज है तालाबों को पर्यटन स्थल बनाना! मालाथाहाली तालाब पर 51 करोड़ रुपए की लागत से ग्लास हाउस, हैंगिंग ब्रिज और टॉय ट्रेन ट्रैक बनाना न सिर्फ इस जलनिकाय (वॉटरबॉडी) के पूरे इकोसिस्टम के लिए खतरनाक है, बल्कि उच्च न्यायालय तथा राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए विभिन्न आदेशों का उल्लंघन भी है। यह जानना कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि तालाब भूजल बढ़ाने और बाढ़ कम करने के लिए हैं, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नहीं। मुंबई में ऐसे जलस्रोतों के पास अधिकृत लोगों के अलावा किसी को नहीं जाने दिया जाता।


फंडा यह है कि कुछ बनाना ही पर्याप्त नहीं है, उसका रखरखाव भी उतना ही जरूरी है। क्या नहीं करना चाहिए, यह देखने से भी जनहित में बेहतर फैसले लेने में मदद मिलती है।

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