दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

असली रिश्ते में एक ‘आस्था’ भी होती है

असली रिश्ते में एक ‘आस्था’ भी होती है
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May 7, 2021

असली रिश्ते में एक ‘आस्था’ भी होती है


‘आज खुश तो बहुत होगे तुम…? आपको इस संवाद वाला दीवार फिल्म का वह सीन याद होगा, जब अमिताभ बच्चन शिव मंदिर जाकर भगवान से अपनी मां को बचाने की गुहार लगाते हैं, जो गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती थी। मुझे यह चार मिनट का डायलॉग तब याद आया, जब मुझे हमारे एक पाठक की जिंदगी के बारे में पता चला, जिसमें रील का यह सीन रियल बन गया।


बीती 8 अप्रैल को गुजरात के अमरेली जिले के सावेर कुंडाला गांव में प्रताप भाई खुमन के 12 सदस्यीय परिवार को बड़ा झटका लगा। उनके एक वर्षीय पोते करमवीर समेत सात लोगों को कोरोना हो गया और सभी को भर्ती करना पड़ा। प्रताप भाई और उनके भाई की पत्नी ईला बहन की हालत गंभीर थी। उन्हें सिविल हॉस्पिटल के आईसीयू में भर्ती कराया गया, जबकि प्रताप भाई प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हुए। अगले तीन दिन में ईला बहन की हालत सुधरी लेकिन प्रताप भाई की हालत बिगड़ रही थी। डॉक्टरों ने अपनी लाचारी बताई और रिश्तेदारों से कहा कि प्रताप भाई को अहमदाबाद ले जाएं। लेकिन अहमदाबाद के डॉक्टरों ने शिफ्टिंग से इनकार करते हुए रेमडेसिवीर इंजेक्शन देने कहा। परिवार के अन्य रिश्तेदारों ने इंजेक्शन की व्यवस्था करवा दी। अब डॉक्टर आशा लगाए बैठे थे।


जब पूरा परिवार कोरोना से संघर्ष कर रहा था, उन्हें नहीं पता था कि एक अच्छी आत्मा वाले हंसमुख भाई इस परिवार को बचाने के लिए कुछ अलग कर रहे थे। पेशे से लोहार हंसमुख ने जब सात सदस्यों पर कोरोना के हमले की बात सुनी तो वे पास के चामुंडा देवी मंदिर गए और देवी को सीधे चेतावनी ही दे दी। उन्होंने कहा, ‘जब तक प्रताप भाई और उनके परिवार के सातों सदस्य लौट नहीं आते और मैं उन्हें खुद नहीं देख लेता, मैं अन्न का एक दाना नहीं खाऊंगा। मैं बस पानी पीऊंगा।’ उन्होंने उपवास शुरू कर दिया।


उपवास के पांचवे दिन हंसमुख की तबीयत बिगड़ने लगी। वे अस्पताल गए और जब डॉक्टर ने अचानक हालत बिगड़ने का कारण पूछा तो उन्होंने बताने से इनकार कर दिया और कहा कि कमजोरी दूर करने के लिए जो कर सकते हैं, करें। हंसमुख को दो बॉटल ग्लूकोज चढ़ा और विटामिन की गोलियां दी गईं। लेकिन उन्होंने देवी से किया वादा (पढ़ें युद्ध) जारी रखा और अन्न खाने से इनकार कर दिया। वे रोजाना सुबह-शाम मंदिर जाते और सात लोगों के लिए सात बार आरती गाते।


दिलचस्प यह है कि हंसमुख और प्रताप भाई का रिश्ता तब बढ़ा था, जब वे 15 साल पहले पड़ोसी थे। फिर हंसमुख कुछ किलोमीटर दूर रहने लगे। दोनों लोहे से संबंधित पेशा होने के कारण साथ आए थे। दोनों सख्त थे और कीमत कम कर एक-दूसरे के ग्राहक छीन लेते थे। हालांकि, इस प्रतिस्पर्धा ने उन्हें अच्छा पड़ोसी होने से नहीं रोका। समय के साथ प्रताप भाई ने लोहे का व्यापार छोड़ दिया और पेट्रोल पंप शुरू किया।

नौवें दिन, जब सात मरीजों में सबसे आखिरी में प्रताप अस्पताल से लौटे तो हंसमुख ने मंदिर जाकर नारियल चढ़ाकर देवी को धन्यवाद दिया और वही नारियल प्रसाद के रूप में प्रताप भाई के लिए लाए। नौ दिन बाद हंसमुख भाई ने पहली बार भोजन में उसी नारियल का पानी पिया।


फंडा यह है कि कुछ रिश्तों में इतनी आस्था होती है कि देवी-देवताओं को भी अपने भक्त का वादा पूरा करना पड़ता है। और ऐसे रिश्ते हमेशा विज्ञान और तार्किक व्याख्या से परे रहेंगे।

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