दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

आपकी प्रोडक्टिविटी सनकपन नहीं होना चाहिए

आपकी प्रोडक्टिविटी सनकपन नहीं होना चाहिए
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July 4, 2021

आपकी प्रोडक्टिविटी सनकपन नहीं होना चाहिए

कल मुंबई की पवई लेक पर टहलने के दौरान एक व्यक्ति मुझे लगभग धक्का देते हुए दौड़ता आगेे निकल गया। चूंकि वो मेरे पीछे था और मैं चल रहा था, ऐसे में उसकी जवाबदारी थी कि आगे निकलने की होड़ में सावधानी से गुजरे। मुझे लगा कि ये भूल से हुआ। पर वह आगे गया और पलटकर ऐसी शक्ल बनाई जैसे मैं उसके रनिंग ट्रैक के बीच में आ गया हूं। सिर से पेट तक पसीने से तरबतर उसने ये दो बार किया। मैं दूर से देख सकता था कि हर बार जब वह किसी के पास से गुजरता तो खीझता और इससे दूसरे भी परेशान होते। असल में वो दूसरों को ये दिखाना चाहता था कि ‘देखो मैं कितना ज्यादा व्यायाम करता हूं और तुम लोग क्यों मेरे रास्ते में आ रहे हो!’ कोई आश्चर्य नहीं कि उसे कोई पसंद नहीं कर रहा था।

मैं आगे बढ़ा तो बैंच पर बैठी कुछ युवतियां इंडियन आइडल के प्रतिभागी पवनदीप राजन की कई वाद्ययंत्र बजाने की क्षमता पर प्रशंसा कर रही थीं। स्ट्रेचिंग के दौरान मैंने सुना कि उनकी बातचीत इसके इर्द-गिर्द थी कि हर वाद्ययंत्र पर महारत हासिल करने में वह कितनी मेहनत कर रहा होगा। पता नहीं क्यों हम भारतीयों का कड़ी मेहनत करने वाले प्रतिभाशाली लोगों और उनकी परेशानियों व संघर्ष के प्रति उदार रवैया होता है। ये एक अनकहा कारण हो सकता है कि पवन को इंस्टाग्राम पर 3,72,000 लोग फॉलो करते हैं, इसमें क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग जैसे भी हैं और वह इंटरनेट से 63.6% ट्विटर मत हासिल कर पा रहा है। कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर लोकप्रिय वोट के आधार पर विजेता तय किया जाए तो पवनदीप ही ट्रॉफी ले जाएगा।

और तभी मेरे दिमाग में ये शब्द ‘कड़ी मेहनत’ से जुड़ी हुई मेरे दफ्तर-कार्यक्षेत्र की यादें ताजा हो गईं। कई जगह दफ्तर में मेरे सहकर्मी हमेशा काम में फंसा और दबा हुआ एटीट्यूड जाहिर करते। वे शेखी बघारते कि कितने व्यस्त हैं, पूरे सप्ताह कितना कम सोए और रविवारीय विशेष स्टोरी के लिए कितनी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। चूंकि मैं इस तरह की चीज़ों को मानसिक, शारीरिक, यहां तक कि भावनात्मक सेहत के लिए भी अच्छा नहीं मानता, मैं उन्हें नाटक या फिल्म की टिकट देकर शाम में मजे करने के लिए कहता। ये मुझे समीक्षा करने के लिए मिलती थीं। और अगले दिन मुझे समीक्षा भी मिल जाती थी और उनके चेहरे पर एक सुकून का अहसास भी दिखता था, जो इस बिना योजना के रिलैक्स की वजह से मिला था। ये ना सिर्फ उन्हें ज्यादा काम का बनाता साथ ही ये उन्हें अंदर से बेहद खुशी देती।

हमारे फिल्मी नायकों को देखें। वे खलनायकों से लड़ते हैं, पूरे दिन कड़ी मेहनत करते हैं, पर शाम को वाद्ययंत्र बजाकर गाना गाते हुए नायिका को रिझाते हैं। वे अपनी मेहनत का गुणगान नहीं करते और किसी को गाना गाने नहीं देते। नायिका भी सिर्फ उसकी अकेली मेहनत पर नहीं (जो कि जरूरी है) बल्कि उसके आराम करने और गाने की योग्यता पर फिदा होती है। मतलब काम का सनकपन (टॉक्सिसिटी) उसकी प्रोडक्टिविटी को प्रभावित नहीं करता। ये हमारे एटीट्यूड के मूल्यांकन का समय है। हमें जीवन में कड़ी मेहनत के महत्व के बारे में खुद से पूछना चाहिए। क्या यह जीवन में इकलौती चीज है या फिल्मी हीरो की तरह ये जीवन का हिस्सा भर है। एक बार जब हम कड़ी मेहनत के महत्व का मूल्यांकन करके उसे समझ लेते हैं, तब आसानी से अपने काम और आराम के समय के बीच स्वस्थ सीमाएं बना सकते हैं। नहीं तो हम अपनी उत्पादकता को बुरी तरह प्रभावित कर देंगे।

फंडा ये है कि अपनी कड़ी मेहनत और काम से परेशान एटीट्यूड का ज्यादा दिखावा करके अपनी प्रोडक्टिविटी में सनकपन के शिकार न हो जाएं। मानसिक सेहत के लिए सही संतुलन अच्छा है।

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