दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

कम फैशनेबल लोग पर्यावरण के प्रति सजग नागरिक हैं

कम फैशनेबल लोग पर्यावरण के प्रति सजग नागरिक हैं
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May 21, 2021

कम फैशनेबल लोग पर्यावरण के प्रति सजग नागरिक हैं


हमने मुंबई में तूफान के दिन अपनी अटारी से बारिश के कपड़े निकाले क्योंकि इस साल बारिश जल्दी आने की संभावना थी। उसमें ठंड के कपड़ों का सूटकेस भी था। उसे देख परिवार मेरी सराहना करने लगा कि कैसे मैंने अपनी सभी विंटर जैकेट और स्वेटर दशकों से संभालकर रखे हैं। एक ही जींस सात साल चलाने के लिए मेरी बेटी ने मेरी तारीफ की। तब मैंने बताया कि यह मेरे दादा-दादी और माता-पिता की तुलना में कुछ भी नहीं, जो कभी-कभी ही नए कपड़े खरीदते थे क्योंकि उपलब्ध कपड़े अच्छे से रखते थे। बेटी बोली, ‘यह कुछ ज्यादा हो गया।’


तब मैंने उसे हर उत्पाद के उत्पादन में होने वाले कार्बन उत्सर्जन की सूची दी। मैंने उसकी अलमारी में रखे कपड़ों पर स्टिकर चिपका दिए। हाल ही में उसने लेदर जैकेट खरीदी थी, उस पर मैंने चिट चिपकाई, जिसपर लिखा था ‘इसे बनाने में 176 किग्रा कार्बन उत्सर्जन हुआ’। लेदर हैंडबैग पर 100.5 किग्रा, सिंथेटिक मटेरियल ड्रेस पर 14 किग्रा, पॉलिस्टर शर्ट पर 5.5 किग्रा, कॉटन ड्रेस पर 2.1 किग्रा और जींस पर 33.4 क्रिगा की चिट चिपकाई,  जिसे बनाने में 10,000 लीटर पानी भी लगता है। अगर आप वास्तव में कार्बन उत्सर्जन घटाना चाहते हैं तो प्रत्येक ड्रेस कम से कम नौ महीने पहनकर कार्बन, पानी और वेस्ट फुटप्रिंट 20-30% कम कर सकते हैं। हैरान होकर उसने गूगल चाचा पर तलाशा तो यही आंकड़े मिल। फिर उसने पुराने कपड़ों पर टिप्पणी बंद कर दी।


तथ्य यही है कि एविएशन और मैरीटाइम शिपिंग के सम्मिलित कार्बन उत्सर्जन से ज्यादा उत्सर्जन फैशन इंडस्ट्री करती है। वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में इसकी हिस्सेदारी 10% होने का अनुमान है। सस्ते कपड़े भी पर्यावरण को ज्यादा महंगे पड़ते हैं। फास्ट फैशन के साथ हम पिछले दशक की तुलना में 60% ज्यादा कपड़े खरीद रहे हैं, लेकिन हर आइटम पहले से आधे समय के लिए रख रहे हैं। यूके जैसे विकसित देशों में 3,36,000 टन पुराने कपड़े सालाना फेंक देते हैं।


2018 में ‘बरबैरी’ कंपनी सुर्खियों में आ गई जब उसने घोषणा की कि जो सामान नहीं बिका, उसे वह जलाएगी नहीं। पूरी इंडस्ट्री में होने वाले इस काम को बंद करने के लिए सराहना पाने की बजाय ब्रिटिश ब्रांड को विरोध झेलना पड़ा, क्योंकि विकसित देशों में भी कई लोगों को पता नहीं था कि ऐसा कुछ विनाशकारी भी होता है।


पिछले कुछ समय से आधुनिक पीढ़ी ने कार्बन उत्सर्जन को गंभीरता से लिया है। वे सेकंड हैंड कपड़ों को दूसरा जीवन दे रहे हैं। वर्षों भारी खपत प्रोत्साहित करने वाली बड़ी फैशन चेन भी अब खरीदारों को कपड़े किराये पर लेने, सुधरवाने और रीेसेल के लिए बढ़ावा दे रही हैं। महामारी के दौरान कई फैशन रेंटल साइट में ब्रांड रुचि ले रहे हैं, जिन्हें अहसास हुआ है कि पुराने होने पर भी कपड़ों की जिंदगी बढ़ाना सबसे टिकाऊ रास्ता है। ईको-कॉन्शियस (पर्यावरण के प्रति सजग) युवा ग्राहक प्री-यूज्ड क्लोदिंग मार्केट में तेजी ला रहे हैं।


मेरा आपसे निवेदन है कि अगर किसी कम फैशनेबल व्यक्ति को देखें तो उसकी आधुनिक न होने की निंदा न करें, बल्कि ईको-कॉन्शियस होने और धरती प्रदूषित न करने पर उसकी सराहना करें। उन पूर्वजों को धन्यवाद भी कहें, जिन्होंने मिनिमलिस्टिक (कम में जीना) लाइफस्टाइल अपनाई।


फंडा यह है कि फैशन की आदतें बदलने के लिए नया खरीदने की बजाय पुराना सुधारें क्योंकि धरती को और ईको-वॉरियर चाहिए, खासतौर पर जब हमने कोरोना के दौर में इसे नुकसान पहुंचाने के नतीजे देखे हैं।

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