दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

क्या आपने जीवन में ‘रीरूटिंग’ महसूस की है

क्या आपने जीवन में ‘रीरूटिंग’ महसूस की है
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Aug. 2, 2021

क्या आपने जीवन में ‘रीरूटिंग’ महसूस की है?


मैंने गूगल से ‘रीरूटिंग’ (दिशा बदलकर नया रास्ता बताना) सीखी है। क्या आपने ध्यान दिया कि गूगल मैप्स गलत मोड़ लेने पर आप पर चीखता नहीं है? वह अपनी आवाज ऊंची कर यह नहीं कहता, ‘तुझे पिछली क्रॉसिंग पर दायें मुड़ना था, मूर्ख!’ इसकी बजाय आईफोन असिस्टेंट सीरी आने वाले दिनों में कह सकती है, ‘अब आपको लंबे रास्ते से जाना होगा और इसमें आपको बहुत समय लगेगा, जबकि आप मीटिंग के लिए पहले ही लेट हैं!’


ड्राइवर और हम खुद रास्तों के लिए गूगल मैप पर निर्भर होते जा रहे हैं और ड्राइवर कभी गलत मोड़ लेता है तो हम उसे तुरंत दोष देते हैं, ‘निर्देशों को सुनना और उनपर ध्यान देना सीखो।’ हम अक्सर अपनी चिढ़ और गुस्सा उनपर निकालते हैं, जो गलती करते हैं, खासतौर पर जो हमारे करीबी या परिवार से हैं।


लेकिन गूगल मैप्स कभी नहीं डांटता। अगर वह ऐसा करता तो शायद बहुत से लोग इस्तेमाल बंद कर देते। इसीलिए वह बस ‘रीरूट’ करता है और आपको मंजिल तक पहुंचने का दूसरा सर्वश्रेष्ठ रास्ता बताता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उसका मुख्य काम आपको लक्ष्य तक पहुंचाना है, गलती के लिए बुरा महसूस करवाना नहीं। इंसानी संदर्भ में कहें तो यह हमारा फर्ज के लिए जब दोस्त ने किसी करीबी को खोया हो या जिंदगी में निराशा का सामना कर रहा हो तो हम उसे ‘रीरूट’ करने का प्रयास करें।


मुझे यह बात याद आई जब मैंने ओलिंपिक में हॉकी में हैट्रिक लगाने वाली पहली भारतीय महिला वंदना कटारिया के बारे में सुना। उनकी सफलता के साथ 1980 के बाद पहली बार भारतीय महिला हॉकी टीम ओलिंपिक्स के क्वार्टर फाइनल में पहुंची। नौ भाई-बहनों में से एक वंदना की दादी उनसे घर के काम और खाना बनाना सीखने तथा खेल में वक्त बर्बाद न करने कहती थीं। लेकिन उत्तराखंड के रोशनाबाद गांव में वंदना बचपन में बड़ों की नजरों से छिपकर पेड़ की टहनियां खोजकर उनसे प्रैक्टिस करती थीं। उनके जुननू का समर्थन सिर्फ पिता नाहर सिंह करते थे। लेकिन इस वर्ष 30 मई को उनका हृदयाघात से निधन हो गया। तब 29 वर्षीय वंदना टूट गईं। अगर उनके घर से 2300 किमी दूर स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के बेंगलुरु सेंटर में वे प्रैक्टिस से ब्रेक लेना चाहतीं तो कोई उन्हें रोकता नहीं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यह उनका अपने पिता को श्रद्धांजलि देने का तरीका था, जिन्होंने समाज के दबाव को सहकर वंदना को सपनों के पीछे जाने दिया। शनिवार को ओई स्टेडियम में वंदना ने ओलिंपिक्स में गोल की हैट्रिक बनाकर न सिर्फ देश, बल्कि अपने पिता को भी गौरवान्वित किया। यह दुख की रीरूटिंग का उनका तरीका था।


पंजाब के कबरवाला गांव की कमलप्रीत कौर का उदाहरण भी देखें। अब तक परिस्थितियां उनके खिलाफ थीं। उन्हें ओलिंपिक्स जैसे बड़े मंच पर पर्सनल कोच मिलना तो दूर, उल्टे एक वरिष्ठ सहयोगी ने ही छ: फीट एक इंच की इस लड़की पर हायपररैंड्रोजीनिज्म (महिलाओं में पुरुषों के जरूरत से ज्यादा हार्मोन्स होना) के आरोप लगा दिए। अकेली और निराश कमलप्रीत ने अपने गुस्से को बेचारे डिस्कस (गोला) पर रीरूट कर दिया। और यह फैसला कितना सही साबित हुआ। वे क्वालिफिकेशन राउंड में दूसरे पायदान पर रहीं, जिसमें अंतिम प्रयास में डिस्कस 64 मीटर दूर फेंका। ओलिंपिक में ऐसा करने वालीं वे पहली भारतीय महिला हैं।


फंडा यह है कि अपने गुस्से, दुख और निराशा को किसी सार्थक व उत्पादक कार्य की ओर ‘रीरूट’ करें और देखें नतीजे कितने शानदार होंगे।

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