दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

खुदपर यकीन हो तो ईश्वर भी आपको नहीं रोकेंगे

खुदपर यकीन हो तो ईश्वर भी आपको नहीं रोकेंगे
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Sep 7, 2021

खुदपर यकीन हो तो ईश्वर भी आपको नहीं रोकेंगे


अमेरिका में नासा के तकनीकी मोर्चे पर कार्यरत मोहन भार्गव एक सफल एनआरआई (अप्रवासी भारतीय) है। पुरानी यादें उसे जड़ों की ओर वापस ले आईं। वह बचपन में उसे पालने वाली नानी को ढूंढकर अमेरिका ले जाने के लिए आया है। उसकी यात्रा उसे चरणपुर गांव ले गई और वह बाहरी के साथ इस अंदरूनी खोज पर भी निकला कि वह आखिर कहां से है।


यह कहानी सुनी-सुनी लगी न? जी हां, यह शाहरुख खान की मशहूर फिल्म ‘स्वदेश’ की कहानी है। फिल्म सिर्फ निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की कल्पना नहीं थी, बल्कि एनआरआई दंपति अरविंदा पिल्लालामर्री और रवि कुचिमंची की जिंदगी पर आधारित थी। दोनों ने भारत आकर दूरदराज के गांव और बिना बिजली वाले स्कूल को रोशन करने के लिए पेडल पॉवर जनरेटर बनाया था।


याद रखें, अगर पूरी दुनिया को आप पर यकीन हो, लेकिन आपके अवचेतन को आपके लक्ष्य पर भरोसा न हो तो ईश्वर भी आपकी मदद नहीं कर सकते। लेकिन अगर आप पर किसी को भरोसा न हो, लेकिन आपके अवचेतन को हो, तब ईश्वर भी आपको नहीं रोकेंगे। कुछ उदाहरण देखिए।


विक्रांत वाल्हेकर (40) की स्कूली पढ़ाई मुंबई से 250 किमी दूर पौड गांव में हुई और कम्प्यूटर साइंस में डिग्री के बाद वे मस्कट में एक अमेरिकी कंपनी में नौकरी करने लगे। मस्कट में उनकी सबसे बड़ी समस्या थी अंग्रेजी भाषा कमजोर होना। उन्हें नौकरी के लिए जरूरी अंग्रेजी सीखने ने 6 महीने लगे। इस चुनौती ने उन्हें शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर सोचने पर मजबूर किया। इसलिए वे 2011 में वापस आए और 2012 में अपने गांव में एक स्कूल शुरू किया तथा स्थानीय छात्रों का अवसरों की ऐसी दुनिया से परिचय कराया, जिनके बारे बच्चे जानते तक नहीं थे। अगर उन्होंने अंग्रेजी में चुनौती का सामना नहीं किया होता तो वे कभी स्कूल नहीं खोलते।


आज, ज़ील स्कूल में नर्सरी से आठवीं तक के बच्चे पढ़ते हैं। पहला बैच अब आठवीं में हैं और स्कूल को 12वीं तक बनाने की योजना है। विक्रांत परिवार के भरण-पोषण के लिए फुलटाइम नौकरी और फिर स्कूल का प्रबंधन करते हैं, जबकि उनकी पत्नी पढ़ाती हैं तथा पिता स्कूल में मदद करते हैं।


केरल के थिक्कोडी गांव के करीब 207 प्रवासियों का उदाहरण देखें। उन्होंने मिलकर 18 करोड़ रुपए जुटाए और ‘जीटीएफ स्टील पाइप्स एंड ट्यूब्स एलएलपी’ कंपनी खोली। जीटीएफ यानी ‘ग्लोबल थिक्कोडियम्स फोरम’ इस गांव के प्रवासियों का सोशल मीडिया ग्रुप है। हर शेयर की कीमत 50 हजार रुपए तय की गई और हर व्यक्ति को कम से कम दो शेयर में और अधिकतम 40 लाख रुपए निवेश करने थे। दिलचस्प है कि 147 लोगों ने एक लाख रुपए निवेश किए। इनमें से कोई भी निवेशक फैक्टरी में काम नहीं करता और इसमें केवल पेशेवरों को नियुक्त किया गया है। कंपनी की खासियत है कि बड़ी संख्या में निवेशक आम लोग हैं, जिन्होंने वर्षों खाड़ी देशों में काम कर की गई छोटी-छोटी बचत निवेश की है।


समूह ने पहले एकीकृत कृषि व पर्यटन के बारे में विचार किया लेकिन फिर जीआई पाइप और ट्यूब बनाने का फैसला लिया क्योंकि उन्हें अहसास हुआ कि निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्टर क्षेत्र में वृद्धि की अच्छी संभावनाएं हैं। केरल में ही 40,000 मीट्रिक टन की खपत है, जबकि वहां उत्पादन 4000 मीट्रिक टन होता है। पिछले महीने शुरू हुए इस प्लांट ने 3000 मीट्रिक टन उत्पादन शुरू कर दिया है।


फंडा यह है कि किसी भी चीज को हासिल करने के लिए खुद पर विश्वास होना सबसे ज्यादा जरूरी है।

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