दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

गरीब खाना उगाकर गरीबी से लड़ सकते हैं

गरीब खाना उगाकर गरीबी से लड़ सकते हैं
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Oct 27, 2021

गरीब खाना उगाकर गरीबी से लड़ सकते हैं


आप लंच के लिए 250 ग्राम या आधा किलो सब्जी खरीदते हुए सोच रहे हैं कि आजकल सब्जियां कितनी महंगी हो गई हैं और अचानक आप झोपड़ी में रहने वाले लोगों को एक बार में किलोभर तुरई ले जाते हुए देखें, वह भी एक रुपए भी चुकाए बिना, तब आप क्या सोचेंगे?


आपके बारे में तो नहीं पता, लेकिन मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई। जी हां, दक्षिणपूर्वी दिल्ली के महिपालपुर, वज़ीराबाद, भलस्वा और रंगपुरी में कचरा उठाने वालीं कम से कम 700 महिलाएं अपने घर में सब्जियां उगा रही हैं। वे किसी बड़ी छत पर सब्जियां नहीं उगातीं। उनकी छत तो कार्डबोर्ड और तिरपाल से ढंकी रहती है, जिसे पुरानी जाली और रस्सियों से बांधा जाता है। यह उनके हाथों की पहुंच में ही होती है। अब वे इसी पर कई सब्जियां उगा रही हैं। इन निर्धन परिवारों को पौष्टिक खाना खुद उगाने और उससे कुछ कमाई भी करने के लिए शहरी बागवानी का प्रशिक्षण चिंतन एनवायरनमेंटल रिसर्च एंड एक्शन ग्रुप नामक एनजीओ ने दिया है, जिसमें पुडुचेरी डिजाइंस लिमिटेड ने उनकी मदद की।


पिछले नवंबर से शुरुआत कर इन महिलाओं ने पौधरोपण के पहले मौसम, मार्च से अप्रैल में कद्दू, पालक, तुरई और मिर्च उगाईं। जुलाई-अगस्त के दूसरे मौसम में उन्होंने मालाबार पालक (पोई साग), लाल चौलाई और लौकी लगाईं। अब वे नवंबर-दिसंबर में तीसरे पौधरोपण के लिए तैयार हैं। सब्जियों के अलावा, महिलाएं ट्रे में काले छोले, मूंग, राई और सरसों जैसे माइकोग्रीन्स भी उगा रही हैं।


कई लोग नहीं जानते कि दिल्ली या मुंबई जैसे मेट्रो शहरों में कचरा उठाने वाले बमुश्किल 8-10 हजार रुपए कमाते हैं। लेकिन वे लगभग 5000 रुपए किराये और बिजली में खर्च करते हैं और ज्यादातर दिन उन्हें प्याज-मिर्च के साथ सूखी रोटी खानी पड़ती है। ऐसे परिवार कर्ज में भी डूबे होते हैं। इसलिए कुछ पैसा उसमें भी जाता है, जिससे खाने के लिए न के बराबर पैसा बचता है। युवा माएं बच्चे को सामने बांधकर, पीठ पर कचरे की बोरी लादे रहती हैं और स्थानीय दुकान से ‘पाव’ खरीदकर अपनी भूख मारती हैं, जिसमें इतना पोषण नहीं होता कि मां में बच्चे के लिए पर्याप्त दूध बन सके। इससे भूख, नींद की कमी का दुश्चक्र बन जाता है, जिससे वे भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं, जो झोपड़-पट्‌टी में झगड़ों के कारणों में से एक है। उनके लिए मुफ्त सब्जियों की यह पहल वरदान की तरह है।


कम आय वाले परिवार अक्सर विभिन्न मांगों, असुरक्षित घर और जटिल स्वास्थ्य समस्याओं में उलझे रहते हैं। अनुभव और ज्ञान की कमी के कारण वे आमतौर पर उन सीमित जगहों में भविष्य के लिए कुछ उगाने के लिए हतोत्साहित होते हैं। भूख से रोज की जंग में वे बीजों के फूटने को देखने के लिए जरूरी धैर्य खो देते हैं। इसलिए हम देखते हैं कि ऐसे गरीब खुद की सब्जियां नहीं उगाते।


जिन लोगों को भोजन की चिंता नहीं होती, वे भोजन की बेहतर गुणवत्ता और पोषण के लिए बागवानी का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा लगता है कि खुद का भोजन उगाना तब आसान है, जब आप खर्च का जोखिम उठाने तैयार हों, आपके पास समय तथा साधन, अच्छी सेहत और सुरक्षित व उचित घर उपलब्ध हो। यही वे संसाधन हैं, जिसके लिए खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे परिवार जद्दोजहद करते हैं। इसीलिए मुझे यह पहल पसंद आई।


फंडा यह है कि अपने आसपास के हर निर्धन व्यक्ति को खुद का भोजन उगाना सिखाएं और उन्हें प्रोत्साहित करें। यह गरीबी से जंग जीतने की ओर पहला कदम है।

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