दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

छोटे बिजनेस के लिए ‘भाखरवड़ी’ ब्रांडिंग करें

छोटे बिजनेस के लिए ‘भाखरवड़ी’ ब्रांडिंग करें
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Aug 21, 2021

छोटे बिजनेस के लिए ‘भाखरवड़ी’ ब्रांडिंग करें


मुझे नहीं पता कि आपने कितनी बार ऐसा किया लेकिन मैंने अपनी बेटी को इमरजेंसी में सब्जी लाने के लिए भेजते हुए ये हिदायत कई बार दी कि ‘केवल तीसरे सब्जीवाले राजू से ही खरीदना।’ ये उन दिनों की बात है जब सब्जी वाले कॉलोनी के आखिर में खड़े होते थे। ऐसा नहीं है कि वह बाकियों से सस्ता है। कई बार मुझे लगा कि वह महंगी सब्जी देता है पर उसके पास जाने का मुख्य कारण बार-बार उसका ये साबित करना है कि उसने सिर्फ ताज़ी सब्जियां ही दी हैं।


सालों पहले जब मोबाइल नहीं होते थे, अपने दफ्तर से मां से बात करते हुए उन्होंने मुझे कुछ बनाने के लिए पड़वल (स्नेक गार्ड) लाने को कहा। उस शाम मैंने उसी सब्जीवाले से वह खरीदा और घर आ गया। उसने मुझे वो सब्जी लेने से रोकना चाहा पर मैं नहीं समझा कि उसने ऐसा क्यों किया। घर आते ही मां ने कहा, ‘क्या तुम राजू नहीं, किसी और से सब्जी लाए हो?’ जब मैंने बचाव किया कि नहीं, उसी की दुकान से लाया हूं, तब उन्होंने कहा, ‘मुझे यकीन नहीं होता कि राजू ऐसी कुछ रूखी और बासी सब्जी दे सकता है।’ उस शाम उन्होंने पड़वल छोड़कर कुछ और बनाया। रात में 10 बजे के आसपास अपना ठेला समेटने के बाद राजू घर आया और ताजे पड़वल देते हुए कहा कि ‘साहब जो ले गए थे वो अच्छे नहीं थे।’ तब से हमारे यहां सब्जियां सिर्फ राजू के यहां से ही आती हैं। यही कहानी फल वाले के साथ भी है।


मैंने ये कुछ स्नैक्स बेचने वालों के साथ भी देखा है। अगर स्नैक्स थोड़े भी बासी हो जाते हैं, तो वे ग्राहकों को न बेचकर गरीबों को दे देते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है एक सीरियल ‘भाखरवड़ी’ में एक्टर देवेन भोजानी, जो कि भाखरवड़ी (एक महाराष्ट्रियन पकवान) बेचने वाले दुकान मालिक की भूमिका निभाते हैं, वह एक तय समय पर ही दुकान खोलते हैं और ठीक उसी समय बंद कर देते हैं जब पकवान खत्म हो जाते हैं। भले ही ग्राहक दुकान के बाहर कतार लगाकर खड़े हुए हों, एक बजे के आसपास वह दुकान बंद करने का आग्रह करते और कहते कि ताजी भाखरवड़ी दोपहर में बनेंगी और 4 बजे दोबारा दुकान खुलने पर ही मिलेंगी। उस सीरियल में एक खास दृश्य है, जिसमें देवेन एक बड़ी प्लेट में भाखरवड़ी ले जा रहे होते हैं और अपने घर के आंगन में गलती से आकर बैठे हुए पड़ोसी के कुत्ते पर उनका अनजाने में पैर पड़ जाता है और पूरी ताजी भाखरवड़ी जमीन पर गिर जाती हैं। वह दुखी होते हैं, और फैसला करते हैं कि इन्हें समेटकर ग्राहकों को नहीं बेचेंगे, भले ही आंगन बहुद ज्यादा साफ है। उन गिरी हुई भाखरवड़ी को फेंकने का कहकर वह दुकान चले जाते हैं और ग्राहकों की भीड़ को बताते हैं कि आज वह भाखरवड़ी नहीं बेच पाएंगे और ऐसा नहीं कर पाने के पीछे की वजह भी बताते हैं।


मैं इसे ‘भाखरवड़ी ब्रांडिंग’ कहता हूं! अगर बिजनेस में आपका एक सिद्धांत है कि किसी भी कीमत पर आपके ग्राहकों को कम गुणवत्ता की चीज न मिले, भले ही इसके लिए आपको कुछ नुकसान उठाना पड़े तो आप अपने बिजनेस में कभी फेल नहीं होंगे। लोग इसे बहुत ज्यादा पसंद करेंगे और आपने बिजनेस के नियमित ग्राहक बने रहेंगे।

उत्पादों की कीमत बहुत थोड़ा-सा ही फर्क डालती है, ये वो दौर है जहां ग्राहक तय करते हैं कि वह किससे खरीदना चाहते हैं, खासतौर पर जब रोजमर्रा के सामान की बात हो। और ये रोजमर्रा की खपत का सामान संगठित की तुलना में कई-कई गुना बड़ा असंगठित बिजनेस है।


फंडा ये है कि अगर आप वाकई में दैनिक उपभोग के सामान से जुड़े बिजनेस में सफल होना चाहते हैं, तो ‘भाखरवड़ी ब्रांडिंग’ करें और कुछ वक्त में परिणाम खुद देखें।

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