दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

दूसरों को सशक्त करना भी त्योहार मनाने जैसा है

दूसरों को सशक्त करना भी त्योहार मनाने जैसा है
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Oct 7, 2021

दूसरों को सशक्त करना भी त्योहार मनाने जैसा है


कल्पना कीजिए आप गांव के स्कूल के बाहर खड़े हैं और वहां एक शिक्षक इस तरह बच्चों को संबोधित कर रहे हैं, ‘चलो अपनी फिजिक्स से किताब खोलो और पेज 21 पर अध्याय 4 निकालो।’ आप देखते हैं कि छात्र शांति से वह पेज खोलते हैं। कक्षा में शिक्षक एक छात्र से खड़े होकर पहला पैराग्राफ पढ़ने कहते हैं। वह एक-एक वाक्य पूरा पढ़ता है और रुककर शिक्षक की ओर देखता है। शिक्षक धीरे से ‘हम्म’ कहते, जिसका मतलब है पढ़ना जारी रखो। फिर अचानक वे छात्र से इशारे में रुकने कहते बै और बाकियों की देखकर कहते हैं, ‘समझे?’ फिजिक्स की रीडिंग क्लास इस तरह कई मिनट चलती है और शिक्षक इस विषय के बारे में कुछ भी नहीं समझाते। शिक्षक अचानक आपको देख लेते हैं और छात्रों की तरफ मुड़कर कहते हैं, ‘आज अध्याय 4 पूरा हुआ। घर जाकर इसे दोहरा लेना। मैं अगली फिजिक्स क्लास में दूसरों से इसे पढ़ने कहूंगा।’


शिक्षक कक्षा से बाहर आते हैं और चूंकि आप फिजिक्स में पोस्ट ग्रैजुएट हैं, इसलिए आपका सवाल होता है, ‘क्या आप फिजिक्स के शिक्षक हैं?’ वे मुस्कुराकर कहते हैं, ‘नहीं’। आपको हैरान देखकर वे बोलते हैं, ‘मैं संगीत शिक्षक हूं लेकिन स्कूल में एकमात्र शिक्षक हूं। इसलिए टाइमटेबल के हिसाब से सभी विषय पढ़ाता हूं और छात्रों को पढ़ाई में व्यस्त रखता हूं।’


आपको कैसा महसूस हो रहा है? क्या आपके पैरों तले जमीन खिसक गई? फिजिक्स में एमएससी विवेक जोगलेकर को भी ऐसा ही लगा, जिन्होंने बिलासपुर रायपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में विभिन्न वरिष्ठ पदों पर दशकों काम किया। चूंकि वे ग्रामीण भारत में काफी रहे, उन्हें ग्रामीणों से अलग लगाव है। बैंकिंग में सफलतापूर्वक काम करने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी शुभदा के साथ ग्रामीण बच्चों की मदद का फैसला लिया। शुभदा स्वयं शिक्षाविद् हैं, जिन्होंने कई स्कूलों में बतौर प्राचार्य और सलाहकार काम किया।

एक यात्रा के दौरान विवेक ने यह दृश्य देखा और इस तरह ‘जॉब लेकर एकेडमी’ का जन्म हुआ, जहां दंपित बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के आसपास के कई गांवों के बच्चों की पीसीएम यानी फिजिक्स, केमेस्ट्री और गणित में मदद करते हैं। मैं कम से कम दर्जनभर छात्रों को जानता हूं, जो इन दंपति से पढ़कर अच्छे पदों पर पहुंचे और परिवार को वित्तीय स्थिरता दिलाई।


मुझे बुधवार की सुबह उनकी याद आई, जब मैंने यूनेस्को की 2021 की ‘स्टेट ऑफ एजुकेशन इन इंडिया’ रिपोर्ट पढ़ी। इसका दावा है कि भारत में 1.1 लाख स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक है, जबकि शिक्षकों के 11.16 लाख पद खाली हैं, जिसमें 69% ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा एक शिक्षक वाले स्कूल हैं, जबकि उप्र और बिहार में सबसे ज्यादा, क्रमश: 3.3 लाख और 2.2 लाख, पद खाली हैं। इनका संबंध पढ़ाई के कमजोर नतीजों से बताते हुए यूनेस्को ने अनुशंसा की है कि गांव में शिक्षकों को काम करने की बेहतर परिस्थितियां दी जाएं, साथ ही ‘आकांक्षी जिलों’ की पहचान हो और शिक्षकों को फ्रंटलाइन वर्कर माना जाए।


विवेक ने मेरा संपर्क अपने क्षेत्र के कई प्राचार्यों से कराया, जिन्हें कई बच्चों को नौकरी के लिए तैयार करने पर गर्व है। उन प्रचार्यों ने मेरा परिचय कई बच्चों से कराया, जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र बन गए हैं। इनके बारे में फिर कभी लिखूंगा।


फंडा यह है कि मुझे लगता है कि किसी की गरीबी दूर करने के लिए उसे सशक्त करना भी भारत के महान त्योहारों को मनाने का एक तरीका है। आपको क्या लगता है?

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