दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

होली अंदरूनी भी हो सकती है और बाहरी भी

होली अंदरूनी भी हो सकती है और बाहरी भी
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March 29, 2021

होली अंदरूनी भी हो सकती है और बाहरी भी


क्या कभी ऐसा हुआ है कि होली का त्योहार लाउड स्पीकर पर इन गानों को बजाए बिना मना हो? सबसे मशहूर और सबसे ज्यादा बजने वाला गीत है यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’ का, ‘रंग बरसे…’। यह फिल्म से भी ज्यादा मशहूर हो गया। इस गीत से होड़ करता है, शक्ति सामंत की ‘कटी पतंग’ का गीत, ‘आज न छोड़ेंगे...’


जनवरी 1971 में जब ‘कटी पतंग’ आई तो राजेश खन्ना बड़ी शख्सियत थे। वे मनमानी फीस पाते थे, पसंद की हीरोइन चुनते और ज्यादातर फ्रेम में खुद आकर फिल्म पर राज करते थे। उनकी प्रसिद्धि को ध्यान में रखकर पटकथाएं लिखी जातीं और कोशिश होती कि वे स्क्रीन पर सबसे ज्यादा दिखें। उनके भाव इतने शानदार होते थे कि परदे पर कभी नहीं लगता था कि वे सिर्फ होंठ हिला रहे हैं। संगीत के साथ उनकी मौजूदगी फिल्म की सफलता का मुख्य कारण होती था।


अगस्त 1981 में जब ‘सिलसिला’ रिलीज हुई, राजेश खन्ना की शीर्ष की जगह पर अमिताभ बच्चन आ चुके थे। अमिताभ ने गायकी में हाथ आजमाया और ‌‘रंग बरसे…’ उनके गीतों में से एक था। अमिताभ ने हर उस क्षेत्र में बेहतर काम किया, जिसमें राजेश खन्ना पीछे थे।


पर मेरे लिए दोनों गीतों में बड़ा अंतर था। शक्ति सामंत ने गीत का इस्तेमाल विधवाओं का दर्द बयां करने में किया, जिनसे रंगों से दूर रहने की उम्मीद की जाती है (हीरोइन आशा पारेख ने विधवा की भूमिका निभाई थी)। एक सुधारवादी कदम के रूप में गाना विधवा की साड़ी गुलाल से भीगने पर खत्म होता है। संक्षेप में गीत सामाजिक बुराईयां दर्शाता है, जैसे विधवा दोबारा शादी नहीं कर सकती। वहीं यश चोपड़ा अपने नायक को रेखा की सलवार-कमीज को रंगों से भिगोने का बहाना देते हैं। (फिल्म में रेखा उनकी पूर्व प्रेमिका हैं, जिनकी शादी संजीव कुमार से हो जाती है)। तब मेरे पिता ने इस ओर ध्यान खींचा था कि कैसे होली गीत काव्यात्मक से शारीरिक (बाहरी या सतही) हो गए हैं।

लेकिन वर्षों बाद इसी फिल्म के एक और गीत ‘नीला आसमां सो गया’ से शम्मी कपूर के संबंध के बारे में मुझे पता चला, जिसे अमिताभ ने गाया था। इससे मुझे पिता के विचार से विपरीत बात समझ आई।


रऊफ अहमद की किताब ‘शम्मी कपूर, द गेम चेंजर’ इसके बारे में बात करती है, जिसमें शम्मी की पत्नी नीला कपूर ने यह किस्सा बताया। दरअसल 1975 में बी.आर. चोपड़ा की ‘ज़मीर’ के वक्त अमिताभ बच्चन और जया की दोस्ती शम्मी और उनकी पत्नी से हुई। बैंगलोर के पास कुनिगल फार्म में शूटिंग के दौरान वे रोज काम के बाद मिलते थे। बाद में शूटिंग पुणे में होने लगी, पर मिलने का सिलसिला जारी रहा। बच्चन उसी होटल में ठहरे थे, जिसमें कपूर थे। पैकअप के बाद वे बातचीत के लिए मिलते और अमिताभ हमेशा गिटार साथ लाते थे। वे और शम्मी बैठकर म्यूजिक सेशन करते। एक सेशन में शम्मी ने डमी शब्दों के साथ लोकगीत से प्रेरित धुन बनाई। अमिताभ को यह पसंद आई। कई वर्ष बाद अमिताभ ने शम्मी को फोन कर पूछा कि क्या वे अपनी अगली फिल्म में यह धुन ले सकते हैं। शम्मी तो इसे भूल ही चुके थे। उन्होंने सहर्ष कहा, ‘बिल्कुल, यह तुम्हारी है।’


फंडा यह है कि होली पर किसी को रंगों में काव्यात्मक ढंग से अंदर से भिगोएं, साथ ही खुद बनाया हुआ कोई उपहार देकर उसे भौतिक रूप से यानी बाहर से भी खुशियों के रंग दें। होली की शुभकामनाएं।

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