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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

शांत मन और चार ‘स’ से बनाएँ अपना जीवन बेहतर…

Apr 28, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आईए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक छोटी, लेकिन अपने अंदर ज़िंदगी को हसीन बनाने का बेहतरीन संदेश समेटी एक प्यारी सी कहानी से करते हैं।


यह बात उस जमाने की है जब बिजली ना होने की वजह से आवश्यकता पड़ने पर लोग दीये या लालटेन आदि की रोशनी में अपना कार्य पूर्ण किया करते थे। एक दिन गाँव में रहने वाला रामू कार्य की अधिकता की वजह से रात्रि के समय में अपनी झोपड़ी में दीया जलाकर पूरी तल्लीनता के साथ कार्य कर रहा था। रात को अत्यधिक देर तक कार्य करने के कारण रामू को थकान का अनुभव होने लगा। उसने सोचा कि ऐसी स्थिति में उसके लिए रात्रि विश्राम करना ठीक रहेगा। विचार आते ही रामू ने अपने दीये को बुझाया और आराम से अपने बिस्तरे पर लेट गया। लेटने के पश्चात रामू को अहसास हुआ कि उसका कमरा तो चाँदनी रोशनी से भरा हुआ है। यह देख वो आश्चर्यचकित रह गया। वह सोच रहा था कि एक छोटे से दीये ने इतने बड़े चाँद की रोशनी को कमरे के अंदर आने से रोक रखा था। उसने अपनी धारणा को परखने के लिए एक बार फिर दीये को जलाया। इस बार भी दीये के जलते ही चाँदनी बाहर चली गई और फूंक मार कर दीया बुझाते ही चाँदनी वापस कमरे के कोने-कोने में पसर गई।


क्या दोस्तों आप चाँदनी और दिए का आपसी रिश्ता और इस कहानी का गूढ़ अर्थ समझ पाए? असल में दोस्तों, अगर आप गहराई से इस कहानी में छिपे गूढ़ संदेश को समझने का प्रयास करेंगे, तो पाएँगे कि यह कहानी, कहानी नहीं है, अपितु हमारे जीवन की सच्चाई है। अक्सर हममें से ज़्यादातर लोग धारणाओं, नकारात्मक भावों, थोथी मान्यताओं या फिर कई बार अहंकार या घमंड के दीये की रोशनी में अपना जीवन जीते हैं। जिसके कारण वे चाँदनी रूपी सम्भावनाओं, जीवन में मिले मौक़ों, ईश्वरीय आशीर्वाद आदि का लाभ नहीं ले पाते हैं या उन्हें पहचान नहीं पाते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो ऐसे लोग अपनी क़िस्मत की चाबी को खुद ही दबा कर बैठे रहते हैं, उसे कभी काम में नहीं लाते हैं।


इसके विपरीत अगर दोस्तों हम धारणाओं, नकारात्मक भावों और थोथी मान्यताओं, अहंकार याने घमंड को छोड़ दें तो हम वास्तविकता का एहसास कर सकते हैं। इसके लिए साथियों हमें अपने मन को शांत रखना सीखना होगा और यह स्वयं को पूरी तरह उस ईश्वर या सुप्रीम पॉवर के समक्ष, समर्पण करे बिना सम्भव नहीं होगा। इसलिए दोस्तों, स्वीकारें कि हम सभी उस परमपिता परमेश्वर या सुप्रीम पॉवर के ही अंश हैं याने उसी की संतान हैं। जिस तरह हम अपने बच्चों के साथ ग़लत नहीं कर सकते हैं, ठीक उसी तरह परमेश्वर या सुप्रीम पॉवर भी हमारे साथ कुछ ग़लत नहीं कर सकता है। बल्कि यह कहना और ज़्यादा उचित होगा कि वह हमारे साथ ग़लत होता हुआ भी देख नहीं सकता है।


दोस्तों, उपरोक्त विचार को पूरी तरह स्वीकार कर अगर हम उस परमपिता ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण भाव के साथ जीवन जीना शुरू कर दें और जीवन में जो कुछ भी घट रहा है, उसे स्वीकारते जाएँ, तो हम अपने मन को शांत रखना सीख जाएँगे। शांत मन आपको इस एहसास के साथ वर्तमान में जीने का मौक़ा देगा कि हर पल ईश्वर हमारे साथ है और हम सरलता, सजगता, सहजता और सकारात्मकता के साथ जीवन में अपने समक्ष आने वाले मौक़ों को पहचान पाएँगे; जीवन को बेहतर बना पाएँगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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