अपने दीपक स्वयं बनो !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 3 hours ago
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June 24, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, यकीन मानियेगा आज का मनुष्य शायद इतिहास का सबसे बड़ा खोजी बन चुका है। आज वह अंतरिक्ष में जीवन खोज रहा है, समुद्र की गहराइयों को नाप रहा है, पहाड़ों की चोटियों को जीत रहा है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित कर रहा है और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने की कोशिश कर रहा है। याने वह इस ब्रह्मांड की अनसुलझी पहेलियों को हल कर अपने जीवन को और बेहतर बनाने में लगा हुआ है। लेकिन इस अंधी होड़ में कहीं ना कहीं वो ख़ुद की पहचान को लेकर उलझ गया है और “मैं वास्तव में कौन हूँ?” उसके लिए एक यक्ष प्रश्न बन गया है। आइए, आज हम एक प्रचलित अफ्रीकी कथा से इस प्रश्न का हल निकालने का प्रयास करते हैं-
कहते हैं कि सृष्टिकर्ता ने एक दिन सोचा कि “ईश्वर का सार” या “दिव्य चेतना” मानव जाति से तब तक छिपा दी जाए, जब तक वे उसके योग्य न हो जाएँ। यह वह शक्ति थी जो मनुष्य को उसकी वास्तविक क्षमता, उसकी रचनात्मक शक्ति और उसके अस्तित्व के उद्देश्य का बोध करा सकती थी। सबसे पहले गरुड़ आगे आये और बोले, “इसे मुझे दे दीजिए। मैं इसे चाँद पर छिपा दूँगा।” सृष्टिकर्ता मुस्कुराए और बोले, “नहीं। एक दिन मनुष्य वहाँ भी पहुँच जाएगा।”
फिर व्हेल ने कहा, “मैं इसे समुद्र की सबसे गहरी तह में छिपा दूँगी।” सृष्टिकर्ता ने उत्तर दिया, “नहीं। एक दिन वह समुद्र की गहराइयों को भी खोज निकालेगा।” इसके बाद भैंसे ने सुझाव दिया, “इसे धरती की गहराई में दबा दीजिए।” लेकिन उत्तर वही था—“एक दिन मनुष्य धरती की परतों को भी खोद डालेगा।”
तभी धरती माँ की गोद में रहने वाली एक बुद्धिमान वृद्धा ने कहा, “इसे मनुष्य के भीतर ही छिपा दीजिए। वह पूरी दुनिया में खोजता रहेगा, लेकिन सबसे अंत में अपने भीतर देखेगा।” सृष्टिकर्ता ने कहा—“ऐसा ही होगा।” और तभी से मनुष्य ईश्वर, सत्य, शांति और आनंद को बाहर खोज रहा है - कभी मंदिरों में, कभी पुस्तकों में, कभी पर्वतों में, तो कभी उपलब्धियों में। लेकिन जिस खजाने की उसे तलाश है, वह उसके अपने भीतर ही मौजूद है।
दोस्तों, यही आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है। हम सफलता पाने के लिए दौड़ते हैं, लेकिन संतोष खो देते हैं। हम प्रसिद्धि कमाने की कोशिश करते हैं, लेकिन आत्मसम्मान खो बैठते हैं। हम दुनिया को जीतना चाहते हैं, लेकिन स्वयं पर विजय प्राप्त नहीं कर पाते।
सच्चाई यह है कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सफर बाहर की दुनिया का नहीं, भीतर की दुनिया का है। जब हम स्वयं को समझना शुरू करते हैं, तब हमें पता चलता है कि हमारे भीतर कितनी शक्ति छिपी है। हमारे भीतर साहस भी है, करुणा भी है, रचनात्मकता भी है और वह चेतना भी है जो कठिन से कठिन परिस्थिति में हमें सही दिशा दिखा सकती है।
महात्मा बुद्ध ने कहा था, “अपने दीपक स्वयं बनो।” स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “सारी शक्ति तुम्हारे भीतर है।” और यही इस कथा का सार है।
जीवन का उद्देश्य केवल सफलता प्राप्त करना नहीं है। जीवन का उद्देश्य स्वयं को पहचानना है। क्योंकि जिस दिन आप अपने भीतर छिपे उस दिव्य तत्व को पहचान लेते हैं, उस दिन डर कमजोर पड़ जाता है, भ्रम समाप्त हो जाता है और जीवन एक नई दिशा प्राप्त कर लेता है। इसलिए अगली बार जब आप शांति, प्रेम, आत्मविश्वास या ईश्वर को खोजने निकलें, तो थोड़ी देर रुकिए और अपने भीतर झाँकिए। संभव है, जिसकी तलाश में आप पूरी दुनिया में घूम रहे हैं, वह आपके भीतर वर्षों से आपका इंतजार कर रहा हो। याद रखिए—जीवन की सबसे बड़ी खोज किसी नई जगह की खोज नहीं है, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप की खोज है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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