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उद्देश्य ही संस्था या संगठन को जीवित रखता है !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Apr 15
  • 3 min read

Apr 15, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, किसी भी संस्था या संगठन के लिए उसकी तकनीक, उसके संसाधन या उसके कार्यालय की भव्यता, ताक़त नहीं होती। उसे तो ताकतवर याने बड़ा और शक्तिशाली उसके अपने लोग याने उसके सदस्य बनाते हैं। जी हाँ साथियों, किसी भी संस्था या संगठन के सदस्यों का जुनून, उनका संस्था या संगठन से जुड़ाव और उद्देश्य ही उसे बड़ा और ताक़तवर बनाता है। लेकिन अगर गलती से इस बात को संस्था या संगठन द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाए तो उसके सदस्यों में उदासीनता आ जाती है, जो धीरे-धीरे सबसे मजबूत संस्थाओं या संगठनों को भीतर से खोखला कर देती है।


यकीन मानियेगा, जब कर्मचारी संगठन के लक्ष्यों से जुड़ाव महसूस नहीं करते, तब उनके लिए काम “जुनून” नहीं सिर्फ “ड्यूटी” बन जाता है और “तब अच्छे से अच्छा कर्मचारी भी धीरे-धीरे अपनी क्षमता से नीचे जीने लगता है। याने वह काम तो करता है, पर दिल से नहीं और जब दिल काम में शामिल नहीं होता, तब ना तो उत्कृष्टता आती है, ना ही कार्य से संतोष मिलता है। ऐसे में कर्मचारी अपनी ऊर्जा खो देता है और सिर्फ बहाव के साथ बहता रहता है। उसके रोजमर्रा के कार्यों में ना तो कोई स्पष्ट दिशा होती है और ना ही कोई उद्देश्य। बीतते समय के साथ ऐसे लोग अपने भीतर की ऊर्जा को खो कर ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं जहाँ ना तो उत्साह बचता है और ना ही विकास की इच्छा। यही वह स्थिति है, जहाँ संस्था या संगठन का पतन शुरू होता है।


दोस्तों, यह स्थिति एक बड़ा ही महत्वपूर्ण सवाल भी पैदा करती है, क्या इस समस्या का समाधान सिर्फ संगठन के पास है? या यह जिम्मेदारी संस्था या संगठन से जुड़े हर व्यक्ति की भी है? मेरी नजर में कोई भी संस्था या संगठन उसके लोगों याने सदस्यों से बनता है और अगर हर सदस्य खुद से यह सवाल पूछने लगे कि “क्या मैं अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहा हूँ?”, तो इस स्थिति से उबरा जा सकता है क्योंकि जब हम यह सवाल ईमानदारी से पूछते हैं, तो हमें अपने अंदर का सच दिखने लगता है।


याद रखिएगा, टीमवर्क केवल एक शब्द नहीं है, यह तो भावना है। जब टीम का हर व्यक्ति यह सोचता है कि “मुझे क्या मिलेगा?” तो टीम कमजोर हो जाती है। लेकिन जब हर व्यक्ति यह सोचता है कि “मैं क्या दे सकता हूँ?” तो वही टीम असाधारण बन जाती है। वैसे भी टीमवर्क इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता कभी भी अकेले नहीं मिलती। याने आप व्यवसाय कर रहें हो या कॉर्पोरेट कंपनी में कार्यरत हों या फिर व्यक्तिगत जीवन जी रहे हों, आपको सफलता सिर्फ़ और सिर्फ़ तब मिलेगी जब आप उसके लिए अपने साथियों के साथ सामूहिक प्रयास करेंगे। लेकिन इस सामूहिक सफलता के लिए हर व्यक्ति का व्यक्तिगत समर्पण जरूरी है।


दोस्तों, इस दुनिया में हर कोई “अलग” बनना चाहता है; सफल होना चाहता है, लेकिन बहुत कम लोग उस संघर्ष को अपनाना चाहते हैं जो सफलता की कीमत है। मेरी नजर में अलग बनने का मतलब है, जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ने के लिए तैयार होना। यह लड़ाई किसी और से नहीं, बल्कि खुद से होती है। याने जब आप अपने आलस्य, अपने डर, अपनी औसत सोच से लड़कर, जीतते हैं तब आप सफल होकर अपनी पहचान बनाते हैं। याद रखियेगा, जीवन में उदासीनता हमें धीरे-धीरे कमजोर बनाती है, जबकि उद्देश्य हमें भीतर से मजबूत करता है। इसलिए अपने काम को सिर्फ जिम्मेदारी मत समझिए, उसे अपना योगदान समझिए और हर दिन खुद से पूछिए, “क्या मैं आज अपने कल से बेहतर हूँ?”, “क्या मैं अपने संगठन, अपनी टीम और अपने जीवन में कुछ मूल्य जोड़ रहा हूँ?” अगर जवाब “हाँ” है, तो आप सही दिशा में हैं।


अंत में बस एक बात याद रखिएगा, संगठन तभी आगे बढ़ता है, जब उसके लोग आगे बढ़ने का निर्णय लेते हैं। इसलिए आज से तय कीजिए कि हमें उदासीन नहीं, उद्देश्यपूर्ण बनना है। हमें सिर्फ काम पूर्ण नहीं करना है, बल्कि उत्कृष्टता पैदा करनी है क्योंकि जब आप अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं, तो न केवल संगठन बदलता है, बल्कि आपका जीवन भी बदल जाता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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