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ओनरशिप और अंतरात्मा के संयुक्त भाव से पायें मनचाही सफलता…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Sep 10, 2025
  • 3 min read

Sep 10, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, एक बिज़नेस कंसलटेंट के रूप में कार्य करते हुए मैंने महसूस किया है कि हर व्यवसायी दुनिया का सबसे बेहतरीन ब्रांड बनाने का सपना देखता है। वह चाहता है कि उसकी कंपनी दुनिया में राज करे और इसी सपने को लेकर वह अथाह मेहनत करता है। लेकिन आंकड़े हमें असलियत बताते हुए एहसास कराते हैं कि मनचाही सफलता पाना इतना आसान नहीं है। मेरी नजर में इसकी मुख्य वजह कहीं ना कहीं टीम में ओनरशिप और अंतरात्मा के संयुक्त भाव का ना होना है।


जी हाँ दोस्तों, ओनरशिप और अंतरात्मा का संयुक्त भाव ही सफलता का असली रहस्य है। चलिए इसी बात को हम अपने ख़ुद के जीवन से समझने का प्रयास करते हैं। अब ज़रा सोचिए और बताइए, जब आप किसी काम को यह सोचकर करते हैं कि “यह मेरा काम है”, और जब उसी काम को यह सोचकर करते हैं कि “मुझे किसी और का काम करना पड़ रहा है”, तो क्या आपके काम की क्वालिटी में फर्क नहीं आता?


दोस्तों, यकीनन फर्क आता है और वो भी थोड़ा बहुत नहीं, जीवन बदलने लायक़। यही ओनरशिप की शक्ति है। जब आप Ownership लेते हैं, तब आप सिर्फ एक कर्मचारी नहीं रहते, आप एक Creator बन जाते हैं। तब आप कंपनी के लिए सिर्फ टारगेट पूरे करने वाले नहीं, बल्कि पहचान गढ़ने वाले बन जाते हैं और तब आप अच्छा-बुरा, सफलता-असफलता आदि सबकी जिम्मेदारी ख़ुद पर लेना शुरू कर देते हो। इस आधार पर कहा जाए तो ओनरशिप का भाव आपको और अधिक सीखने, बेहतर बनने और बदलती दुनिया के साथ खुद को ढालने के लिए मजबूर करता है। इसका अर्थ हुआ ओनरशिप का भाव होना आपको साधारण से असाधारण बनाता है।


आइए इसी बात को हम संगठन, कंपनी या ऑर्गेनाइजेशन के नजरिये से भी देख लेते हैं। दोस्तों, ऑर्गेनाइजेशन की असली पहचान उसकी आत्मा होती है। आपने देखा होगा, बहुत-सी कंपनियाँ आती हैं और चली जाती हैं। लेकिन ऑर्गेनाइजेशन वही टिकती है, जो ग्रो करती है; प्रोस्पर करती है। वो सिर्फ़ फ़ायदे और नुक़सान की भाषा नहीं बोलती है। सही मायने में कहूँ तो वो अपने आसपास की दुनिया, याने समाज से पूछती है, “आपके जीवन को और बेहतर बनाने के लिए मैं क्या अनोखा योगदान दे सकता हूँ?” देने का यही भाव उसकी आत्मा, याने उसकी सोल बन जाता है।
और दोस्तों, बिना सोल के कोई भी ऑर्गेनाइजेशन बस एक मशीन है—संख्याओं की मशीन।


दोस्तों, ज़रा खुद से पूछिए, ‘आपके जीवन का कोई उद्देश्य ही न हो, तो क्या आपको जीना सार्थक लगेगा?’ नहीं ना ठीक इसी तरह किसी भी ऑर्गेनाइजेशन का बिना उद्देश्य और आत्मा के होने का क्या फ़ायदा? याद रखियेगा, किसी भी ऑर्गेनाइजेशन का प्रॉफिट किताबों में लिखा जाता है और उसका योगदान लोगों के दिलों पर और यही योगदान समय के साथ लेगेसी क्रिएट करता है।


दोस्तों, अगर इतिहास रचना चाहते हो तो हमेशा याद रखो, ओनरशिप लेना हमें जिम्मेदार बनाता है और अंतरात्मा हमें सही दिशा देती है। और जब दोनों मिल जाते हैं, तब काम केवल “काम” नहीं रहता, बल्कि “कर्तव्य” और “पैशन” बन जाता है और यही वह सोच है जो किसी साधारण टीम को असाधारण बना देती है और किसी कंपनी को एक महान ब्रांड। इसलिए आज ही से निर्णय लें और अपने हर काम की ओनरशिप लेना शुरू करें; घर ही नहीं अपने हर कार्य में हर क्षण सकारात्मक रूप से योगदान देने का प्रयास करें क्योंकि यही आपकी आत्मा को सकारात्मक और व्यक्तिगत तौर पर आपको और आपकी कंपनी को सफल बनायेगा।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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