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तुम्हारी खुशी और तुम्हारा दुःख, दोनों मेरे अपने हैं !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 1 day ago
  • 3 min read

Aug 8, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं, “रिश्ते टूटते क्यों हैं?” मेरा उत्तर हमेशा एक ही होता है, रिश्ते बड़े कारणों से कम और छोटी उपेक्षाओं से अधिक टूटते हैं। जी हाँ, किसी भी रिश्ते का अंत अचानक नहीं होता। वह धीरे-धीरे तब शुरू होता है, जब आपसी संवाद कम होने लगता है, परवाह औपचारिक हो जाती है, साथ बिताया जाने वाला समय घटने लगता है और “तुम कैसे हो?” की जगह “काम हो जाए तो बताना” जैसे वाक्य ले लेते हैं।


दोस्तों, सच तो यह है कि रिश्तों को प्रेम से अधिक परवाह की आवश्यकता होती है। प्रेम एक भावना है, लेकिन परवाह उस भावना की अभिव्यक्ति है। यदि मन में अपनापन हो, लेकिन वह व्यवहार में दिखाई न दे, तो सामने वाला उसे महसूस कैसे करेगा? रिश्ते केवल दिल में नहीं, व्यवहार में भी दिखाई देने चाहिए।


साइमन सिनेक कहते हैं, "People don't care how much you know until they know how much you care." अर्थात् लोग आपकी योग्यता से पहले आपकी परवाह को महसूस करते हैं। यही बात हर रिश्ते पर भी लागू होती है। ज़रा सोचिए, बचपन में जब हम गिर जाते थे, तब माँ की फूँक घाव को नहीं भरती थी, लेकिन उनका स्पर्श दर्द ज़रूर कम कर देता था। ऐसा किसी चमत्कार की वजह से नहीं, बल्कि अपनेपन के एहसास की वजह से हुआ था। इंसान को जीवनभर इसी एहसास की ज़रूरत रहती है कि “कोई तो है, जिसे मेरी परवाह है।”


आज, इस आधुनिक युग में लोगों ने हर सुविधा तो जुटा ली है, लेकिन आज उनके पास अपनों के लिए समय ही नहीं है। वे आज अपनों को महंगे उपहार खरीद कर तो दे सकते हैं, लेकिन बिना मोबाइल उठाए दस मिनिट बात नहीं कर सकते । धीरे-धीरे यही दूरी रिश्तों में खालीपन पैदा कर देती है। याद रखिएगा दोस्तों, रिश्ते कभी-कभार किए गए एक बड़े प्रयास से मजबूत नहीं होते। वे तो रोज़ किए गए छोटे-छोटे प्रयासों से मजबूत होते हैं। बिना किसी कारण फोन करना, हालचाल पूछना, किसी की बात पूरी सुनना, छोटी उपलब्धियों पर खुश होना, मुश्किल समय में साथ खड़ा होना और बिना कहे किसी की परेशानी समझ लेना जैसी बातें उन्हें मजबूत बनाती हैं। दोस्तों, इसमें सबसे सुंदर बात यह है कि अपनापन केवल अपनों को नहीं जोड़ता, वह अजनबियों को भी अपना बना देता है। मुस्कुराकर किया गया अभिवादन, सम्मान से बोले गए दो शब्द और किसी की सहायता के लिए बढ़ा हुआ एक हाथ, आदि ऐसे निवेश हैं, जिनका लाभ कई गुना होकर लौटता है।


याद रखियेगा अगर कोई नदी बहना बंद कर दे, तो उसका पानी सड़ने लगता है। ठीक वैसे ही जब रिश्तों में संवाद और परवाह का प्रवाह रुक जाता है, वहाँ गलतफ़हमियाँ जन्म लेकर उसे सड़ाने लगती हैं। अगर आप इस परेशानी से बचना चाहते हैं और पूर्व में बताये तरीके से जीवन जीना चाहते हैं तो आपको अपनों को समय देने की आदत विकसित करनी होगी। क्योंकि समय ही वह उपहार है जिसे देकर हम अपने जीवन का एक हिस्सा किसी और को सौंपते हैं और इससे बड़ा प्रेम का प्रमाण और कुछ नहीं हो सकता। इसलिए दोस्तों, आज ही अपने जीवन के सबसे प्रिय लोगों की सूची बनाइए। फिर स्वयं से पूछिए, “क्या मैं उन्हें केवल अपना मानता हूँ या उनके लिए समय भी निकालता हूँ?”, “क्या मैं उनसे प्रेम केवल शब्दों में करता हूँ या अपनी परवाह से उन्हें वैसा महसूस भी कराता हूँ?”


याद रखिएगा दोस्तों, रिश्ते अधिकार से नहीं, अपनत्व से बनते हैं; शब्दों से नहीं, संवेदनाओं से खिलते हैं; और केवल प्रेम से नहीं, बल्कि नियमित परवाह और दिए गए समय से जीवनभर जीवित रहते हैं। क्योंकि दुनिया में सबसे अमीर वह नहीं जिसके पास सबसे अधिक धन है, बल्कि वह है जिसके पास ऐसे लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ के कहते है, “तुम्हारी खुशी और तुम्हारा दुःख, दोनों मेरे अपने हैं।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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