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दुनिया जीतने से पहले जानें ख़ुद को…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jun 5
  • 3 min read

June 5, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, इस आधुनिक युग में तमाम सुविधाओं और तकनीकों के चलते इंसान पहले से अधिक सुलझा नजर आता है। लेकिन मेरी नजर में हकीकत बिल्कुल इसके विपरीत है। मेरा तो मानना है कि आज इन सुविधाओं ने हमें अपना गुलाम बना लिया है।उदाहरण के लिए सुबह आँख खुलते से ही हमारे हाथ में मोबाइल होता है, जिसकी सहायता से हम कभी संदेशों के माध्यम से, तो कभी ऑनलाइन मीटिंग्स के माध्यम से या फिर ऑडियो-वीडियो कॉल की सहायता से पूरे दिन लोगों से जुड़े रहते हैं और अंत में रात को थककर सो जाते हैं। मजे की बात तो यह है कि पूरे दिन की इस यात्रा में अक्सर हमें ख़ुद के साथ समय बिताने का भी समय नहीं मिलता है। याने आज हम दुनिया से तो जुड़े रहते हैं लेकिन ख़ुद से दूर हो जाते हैं।


दोस्तों, प्रसिद्ध लेखक पाउलो कोएलो ने कहा था, “यदि आप ख़ुद के साथ समय नहीं बिताते हैं, तो आप स्वयं को कभी जान ही नहीं सकते।” पहली नज़र में यह वाक्य साधारण लगता है, लेकिन गहराई से सोचेंगे तो इसके भीतर छुपे रहस्य को समझ पायेंगे। हममें से अधिकांश लोग अकेलेपन को बोरियत मानते हैं, इसलिए खाली समय मिलते ही मोबाइल, टीवी, सोशल मीडिया या किसी न किसी चीज में खुद को उलझा लेते हैं। हमें लगता है कि अकेले रहना समय की बर्बादी है। लेकिन सच तो यह है कि इंसान का सबसे महत्वपूर्ण संवाद दुनिया से नहीं, स्वयं से होता है। जब हम कुछ समय शांति के साथ अकेले में बैठते हैं, तब हमारा परिचय अपनी वास्तविक इच्छाओं, डर, कमजोरियों और शक्तियों से होता है। याद रखिएगा, दुनिया हमें बताती है कि हमें क्या बनना चाहिए। लेकिन हमारा अंतर्मन हमें बताता है कि हम वास्तव में कौन हैं।


दोस्तों, जीवन के अधिकांश संघर्ष बाहर नहीं, ख़ुद के भीतर होते हैं। कई बार परिस्थितियाँ हमें नहीं थकातीं, बल्कि उन परिस्थितियों के बारे में हमारे विचार, हमें थका देते हैं। कोई एक शब्द कह देता है और हम घंटों परेशान रहते हैं। कोई योजना सफल नहीं होती और हम स्वयं को असफल मान लेते हैं। कोई आलोचना कर देता है और हमारा आत्मविश्वास डगमगा जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारा मन बाहर की घटनाओं से संचालित हो रहा होता है। लेकिन जब हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना शुरू करते हैं, तब एक अद्भुत परिवर्तन होता है। हमें एहसास होने लगता है कि हमारे भीतर का सबसे बड़ा स्वभाव शांति है। हमारा हृदय संघर्ष नहीं चाहता। वह प्रेम चाहता है; करुणा चाहता है; संतुलन चाहता है और जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं, तब हमारे विचार धीरे-धीरे शांत होने लगते हैं। हम प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं और उत्तर देना सीख जाते हैं। हम क्रोध से नहीं, समझ से निर्णय लेने लगते हैं। हम दूसरों को बदलने के बजाय स्वयं को समझने लगते हैं।

यही आंतरिक शांति की शुरुआत है।


यूनानी दार्शनिक एपिक्टेटस ने कहा था, “जो आपके नियंत्रण में है, उसका सर्वोत्तम उपयोग कीजिए और जो आपके नियंत्रण में नहीं है, उसे स्वीकार करना सीखिए।” यही जीवन का व्यावहारिक ज्ञान है। हम मौसम को नियंत्रित नहीं कर सकते। हम दूसरों के विचारों को नियंत्रित नहीं कर सकते। हम हर परिस्थिति को अपने अनुसार नहीं बना सकते। लेकिन हम अपने दृष्टिकोण को नियंत्रित कर सकते हैं। हम अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित कर सकते हैं। हम अपने विचारों की दिशा चुन सकते हैं और यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।


दोस्तों, जब हम स्वयं से जुड़ते हैं, तब हमें एहसास होता है कि शांति बाहर खोजने की वस्तु नहीं है। वह हमारे भीतर पहले से मौजूद है। उसे केवल शोर से मुक्त करना है। इसलिए प्रतिदिन कुछ समय अपने लिए निकालिए। कुछ क्षण मौन में बैठिए। अपने मन को सुनिए। अपने भीतर झाँकिए क्योंकि जिस दिन आप स्वयं को जान लेंगे, उस दिन दुनिया का कोई भी तूफान आपकी आंतरिक शांति को नहीं हिला पाएगा और शायद जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भी यही है, दुनिया को जीतने से पहले स्वयं को जान लेना।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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