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सिर्फ़ सफल नहीं, श्रेष्ठ बनें !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 1 hour ago
  • 3 min read

July 26, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, जीवन हर इंसान की दो बार परीक्षा अवश्य लेता है। पहली बार तब, जब उसके पास कुछ नहीं होता; और दूसरी बार तब, जब उसके पास सब कुछ होने लगता है। पहली परीक्षा में जीवन दुःख देकर हमारा धैर्य परखता है और दूसरी परीक्षा में धन हमारा चरित्र। लेकिन अक्सर इस बात का भान ना होने के कारण लोग दुख की घड़ी में टूट जाते है और धनवान बनने की राह में भटक जाते हैं। मेरी नजर में इसकी मुख्य वजह अधिकांश लोगों का यह मानना है कि जीवन की सबसे कठिन घड़ी वह होती है जब हम किसी गहरे दुःख से गुजर रहे होते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि कठिनाई केवल दुःख सहने में नहीं, बल्कि उससे धीरे-धीरे बाहर निकलने में होती है।


याद रखियेगा दोस्तों, भावनात्मक घावों के भरने का कोई कैलेंडर नहीं होता। याने हम यह कभी नहीं जान सकते कि भावनात्मक घाव छह महीने में भर जाएँगे या एक साल में। यह सब तो मन की अपनी गति से चलता है। जिसके कारण कभी लगता है कि सब सामान्य हो गया है। लेकिन अचानक ही किसी तस्वीर, किसी ख़ामोशी, किसी पुराने संदेश या किसी परिचित खुशबू के आते ही वही दर्द फिर दस्तक देने लगता है। ऐसे क्षणों में अक्सर सामान्य लोग स्वयं को दोष देने लगते हैं और ख़ुद की क्षमताओं पर शक करते हुए ख़ुद से पूछते हैं, “मैं अब तक इससे बाहर क्यों नहीं निकल पाया?” मेरी नजर में संभवतः यह इंसान के जीवन की सबसे बड़ी भूल होती है।


दोस्तों, भावनात्मक घाव का याद आना, उसका फिर से जीवित होना नहीं है। यह तो केवल मन का यह बताना है कि उपचार अभी जारी है। जैसे टूटी हुई हड्डी के जुड़ने के बाद भी मौसम बदलने पर हल्का दर्द महसूस हो सकता है, ठीक वैसे ही जीवन के कुछ नकारात्मक अनुभव हमेशा स्मृति में रहते हैं। अंतर केवल इतना होता है कि समय बीत जाने के बाद वे हमें नियंत्रित करना छोड़ देते हैं। इसी बात को समझाते हुए प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग ने कहा था, “मैं वह नहीं हूँ जो मेरे साथ हुआ, मैं वह हूँ जो मैंने बनने का निर्णय लिया।” मेरी नजर में यकीनन यह जीवन की सबसे बड़ी स्वतंत्रता है।


लेकिन दोस्तों, बात यहाँ ख़त्म नहीं होती, जब समय हमें दुःख से बाहर निकाल देता है और जीवन इच्छानुसार या यूँ कहूँ सपनों के अनुसार चलने लगता है, तब वह हमारी दूसरी परीक्षा याने समृद्धि की परीक्षा लेना शुरू करता है। धन एक बहुत विचित्र शक्ति है। ग़रीबी या अमीरी में व्यक्ति हमेशा वैसा नहीं दिखता, जैसा वो होता है। लेकिन जैसे ही उसके पास धन आता है उसके भीतर की छिपी हुई प्रवृत्तियाँ बाहर आने लगती है। यदि भीतर संतोष होगा, तो धन सेवा का माध्यम बनेगा। यदि भीतर लालच होगा, तो धन कभी पर्याप्त नहीं लगेगा। यदि भीतर विनम्रता होगी, तो समृद्धि सम्मान बढ़ाएगी। यदि भीतर अहंकार होगा, तो वही समृद्धि रिश्तों को संकीर्ण बना देगी। इसीलिए ही कहा जाता है कि मुसीबत यह बताती है कि आपके साथ कौन खड़ा है, और पैसा यह बताता है कि आप वास्तव में किसके साथ खड़े हैं।


दोस्तों, जीवन का उद्देश्य न तो केवल घावों से बचना है और न ही केवल धन इकट्ठा करना। असली उद्देश्य तो ऐसा व्यक्तित्व बनाना, जो कठिन समय में टूटे नहीं और अच्छे समय में बदले नहीं। यदि आपका दुःख आपको अधिक दयालु बना रहा है और आपकी सफलता आपको अधिक विनम्र बना रही है, तो समझिए कि आपने जीवन की दोनों परीक्षाएँ पास करना शुरू कर दिया है। इस सूत्र को अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए हमेशा याद रखिएगा, समय पहले आपके धैर्य की परीक्षा लेता है, फिर आपके चरित्र की। जो व्यक्ति दर्द में आशा और समृद्धि में विनम्रता बनाए रखता है, वह वास्तव में सफल ही नहीं, बल्कि श्रेष्ठ मनुष्य बनता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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