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आज़ादी का दूसरा नाम – स्वयं पर विजय !!!

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 17 hours ago
  • 3 min read

Aug 15, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, सर्वप्रथम तो आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ। निश्चित तौर पर आप सभी ने बड़े हर्षों-उल्लास के साथ ध्वजारोहण कर याने तिरंगे को फहराकर राष्ट्रगान गाया होगा और साथ ही स्वतंत्रता सेनानियों को नमन भी किया होगा। लेकिन दोस्तों मेरे लिए स्वतंत्रता दिवस की शुरुआत थोड़ी उलझन भरी रही। असल में कल शाम को हमारे कॉलम “फिर भी ज़िंदगी हसीन है…” को पढ़ने के बाद एक पाठक ने मुझे फ़ोन किया और उदासी भरी आवाज़ में बोला, “सर, मेरी उम्र 42 वर्ष है। नौकरी भी अच्छी चल रही है, परिवार भी मस्त है, लेकिन मैं खुश नहीं हूँ। मुझे हमेशा लगता है कि मैं दूसरों की अपेक्षाओं का जीवन जी रहा हूँ। बचपन में पिता की इच्छा थी कि इंजीनियर बनूँ, बन गया। समाज चाहता था कि जल्दी शादी करूँ, कर ली। लोग कहते रहे कि बड़ा घर लो, ले लिया। लेकिन आज महसूस होता है कि मैंने सबकी तो सुनी, लेकिन कभी अपने मन की नहीं सुन पाया।”


उन सज्जन की बात सुनने के बाद कुछ क्षण के लिए तो मैं कुछ बोल ही नहीं पाया क्योंकि मुझे लग रहा था कि हमारा देश तो 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया। लेकिन हम शायद अभी तक आज़ाद नहीं हो पाए हैं? क्योंकि आज़ादी का अर्थ सिर्फ़ अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से मुक्त होना नहीं है। हम तो वास्तविक आज़ाद तब होंगे जब हमारा मन भय से मुक्त होगा, हमारे सभी निर्णय अपराधबोध से मुक्त होंगे और हमारा जीवन केवल दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करना या उन्हें खुश रखने का साधन नहीं रहेगा।


दोस्तों, गंभीरता से सोच कर देखियेगा हमारे देश को आज़ाद हुए तो 79 वर्ष हो गए, लेकिन हममें से ज्यादातर लोग आज भी अपने भीतर के डर से आज़ाद नहीं हो पाए हैं। आज भी इस समाज में ऐसे लोग हैं जो असफलता के डर के साथ जीवन जी रहे हैं। इतना ही नहीं समाज में एक वर्ग “लोग क्या कहेंगे” से या फिर “तुलना” की बीमारी से ग्रसित है। जो लोग इनसे बच्चे हुए हैं उनमें से भी ज्यादातर लोग क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार की बेड़ियाँ पहनकर जीवन काट रहे हैं। ऐसी स्थिति में आप स्वयं सोच कर देखिएगा मन को क़ैद में छोड़, सिर्फ़ शरीर को स्वतन्त्र कर क्या सच्ची स्वतंत्रता पाई जा सकती है?


दोस्तों, महात्मा गांधी ने केवल देश को आज़ाद करने की बात नहीं की थी। उन्होंने स्वराज की बात की थी और स्वराज केवल शासन बदलने का नाम नहीं है। स्वराज का सही अर्थ है, “स्वयं पर शासन।” याने जिस दिन हमारा मन इच्छाओं का गुलाम होना छोड़ दे, जिस दिन हमारा क्रोध विवेक के सामने हार जाए और जिस दिन तुलना की जगह हमारे मन में कृतज्ञता आ जाए उसी दिन हम भीतर से स्वतंत्र हो जाते हैं।


दोस्तों, आइए इस स्वतंत्रता दिवस पर हम तिरंगे को सलाम करने के साथ ही अपने भीतर भी एक ऐसा तिरंगा फहराते हैं, जिसका केसरिया रंग हमें सही के लिए खड़े होने का साहस सिखाए। सफेद रंग हमें सत्य और शांति का मार्ग दिखाए। हरा रंग हमें विकास, आशा और निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दे और बीच का अशोक चक्र हमें याद दिलाए कि जीवन कभी रुकना नहीं चाहिए क्योंकि गति ही जीवन है।


दोस्तों, देश की सीमाओं की रक्षा हमारे सैनिक करते हैं। लेकिन हमारे चरित्र की सीमाओं की रक्षा हमें स्वयं करनी होगी। देश को बाहरी शत्रुओं से बचाना आवश्यक है, लेकिन अपने भीतर के भय, लोभ, घृणा और नकारात्मकता से स्वयं को मुक्त करना उससे भी अधिक आवश्यक है। इसलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर केवल यह न कहें कि “मेरा भारत स्वतंत्र है!” बल्कि इसके साथ यह भी कहें की “मेरा मन स्वतंत्र है।”, “मेरे विचार स्वतंत्र हैं।”, “मेरे कर्म सत्य और करुणा से प्रेरित हैं।” क्योंकि जिस दिन हर भारतीय भीतर से स्वतंत्र हो जाएगा, उसी दिन भारत केवल एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र चेतना बन जाएगा और तब हम पूरे विश्वास के साथ कह सकेंगे, “ज़िंदगी ज़िंदाबाद!”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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