आसक्ति नहीं, स्वामित्व के भाव के साथ जियें जीवन !!!
- Nirmal Bhatnagar

- 3 days ago
- 3 min read
Aug 14, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, निश्चित तौर पर बचपन में आपने कभी ना कभी रेत का घर ना सिर्फ़ पूरे मनोयोग के साथ बनाया होगा, बल्कि उसे सजाया भी होगा। लेकिन अक्सर रेत से बने यह महल समुद्र की एक लहर या खेल-खेल में एक सेकंड में ही ढह जाते हैं। ऐसे हममें से कुछ लोग रोते हैं तो कुछ मुस्कुराकर नया घर बनाना शुरू कर देते हैं। दोस्तों, हमारी प्रतिक्रिया का यह अंतर रेत की वजह से नहीं बल्कि आसक्ति याने अटैचमेंट की वजह से होता है।
यही आसक्ति हमारे पूरे जीवन को भी कुछ इसी तरह प्रभावित करती है। हम चीजों को, रिश्तों को, पद को “मेरा” मान लेते हैं और इसी तरह व्यवसाय, प्रतिष्ठा, पहचान आदि सब पर अदृश्य रूप से “मेरा” लिख देते हैं और जिस दिन इनमें से किसी में भी किसी वजह से जरा सा परिवर्तन आ जाता है, उस दिन हम टूट जाते हैं। जबकि जीवन की सच्चाई सिर्फ़ इतनी सी है कि ईश्वर ने हमें इनका मालिक कभी बनाया ही नहीं था। जी हाँ, ईश्वर ने हमारी भूमिका सिर्फ़ एक संरक्षक याने ट्रस्टी के रूप में तय की थी, जिसे हमने अपनी आसक्ति की वजह से मालिकाना मान लिया था। जिस दिन हम इस बात को समझ जाएँगे और स्वीकार लेंगे कि आज जो हमारे पास है, वह एक ज़िम्मेदारी है, स्थायी संपत्ति नहीं, उसी दिन मन से हल्के याने रिलैक्स्ड हो जाएँगे।
दोस्तों, अब आप समझ ही गए होंगे कि इंसान दिल टूटने की वजह से नहीं, बल्कि भ्रम टूटने की वजह से बदलता है। जब उसे लगता है कि उसकी खुशी किसी एक व्यक्ति में थी। उसका भविष्य किसी एक अवसर में छुपा था। उसकी पहचान किसी एक पद या भूमिका की वजह से थी और जब ये भ्रम टूटता है तो वह दुखी हो जाता है। जबकि मेरी नजर में तो ये सब अवसर होते हैं क्योंकि भ्रम का टूटना हमें ख़ुद से मिलने का मौक़ा देता है। जी हाँ, जब बाहरी आवरण हटता है, तब हमारा परिचय ख़ुद से होता है।
दोस्तों, जीवन हमें चोट नहीं देता, वह तो केवल हमारी पकड़ ढीली करता है। ताकि जिसे हम अंत समझ रहे हैं, उसे अपनी स्वतंत्रता की शुरुआत बना सकें। एक पक्षी को यदि जीवनभर पिंजरे में रखा जाए, तो एक समय ऐसा भी आता है जब खुला आकाश उसे डराने लगता है। वह उड़ने में सक्षम था फिर भी उड़ा नहीं क्योंकि उसने सुरक्षा को स्वतंत्रता से बड़ा मान लिया। इसी तरह कई बार हम भी अपने विचारों, रिश्तों और सुविधाओं का पिंजरा बना लेते हैं और उसमें रहते हुए ख़ुद को सुरक्षित मान लेते हैं। जबकि हकीकत तो सिर्फ इतनी होती है कि वह पिंजरा हमारे विकास को रोक लेता है और जब जीवन इन पिंजरों को तोड़ता है, तब हमें लगता है कि सब छिन गया। जबकि वास्तव में, जीवन हमें उस वक्त उड़ना सिखा रहा होता है।
दोस्तों, आज यदि आपके जीवन में कुछ ऐसा बदला है जिसे आप स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो उससे लड़िए मत। कुछ समय देकर उसे समझने की कोशिश कीजिए। हो सकता है, वह परिवर्तन आपके खिलाफ नहीं, आपके पक्ष में आया हो। याद रखिएगा, जीवन का सबसे बड़ा उपहार हमेशा मिलना नहीं होता, कई बार किन्हीं चीजों से मुक्त होना सबसे बड़ा उपहार होता है।
अंत में इतना कहूँगा कि जो व्यक्ति हर चीज़ को पकड़कर रखना चाहता है, वह अंततः भय में जीता है और जो व्यक्ति जीवन को एक सुंदर यात्रा मानकर स्वीकार करना सीख जाता है, वह हर परिवर्तन में नया अवसर खोज लेता है। इसीलिए तो भारतीय दर्शन में कहा जाता है कि जीवन हमसे कुछ छीनता नहीं है, वह तो हमें धीरे-धीरे उन बंधनों से मुक्त करता है, जिनके बिना हम अपने वास्तविक स्वरूप तक कभी पहुँच ही नहीं सकते।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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