करें प्रेम ख़ुद से…
- Nirmal Bhatnagar

- Oct 29, 2025
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Oct 29, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, ‘प्रेम’ एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही हमारा दिल अपने आप ही खिल जाता है क्योंकि यह शब्द हमारे मन में जीवन के कई हसीन रूप एक साथ ले आता है। जैसे, माता-पिता का स्नेह, दोस्तों की मित्रता, जीवनसाथी का साथ या किसी विशेष व्यक्ति के प्रति आकर्षण, आदि। परंतु इन सभी प्रेमों के बीच एक ऐसा प्रेम है, जो अक्सर अनदेखा रह जाता है, जिसे हम आत्म-प्रेम, याने स्वयं से प्रेम करना कहते हैं।
आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में हम दूसरों को खुश करने में, रिश्ते निभाने में, कामयाब बनने की दौड़ में, इतना खो जाते हैं कि अक्सर खुद को भूल जाते हैं। हम दूसरों को “हाँ” कहते-कहते अपनी आत्मा से अनजाने में ही “ना” कहने लगते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो, दूसरों को “मैं हूँ ना…” का एहसास कराते-कराते, ख़ुद का ही साथ देना भूल जाते हैं। याद रखिएगा दोस्तों, जब तक आप स्वयं से प्रेम नहीं करेंगे, तब तक किसी और को सच्चा प्रेम दे भी नहीं पाएंगे। याने प्रेम के विषय में सबसे जरूरी ख़ुद से प्रेम करना है। एक अतिरिक्त बात मैं आपको और बता दूँ, यही बात सम्मान के विषय में भी उतनी ही सटीक है।
दोस्तों, प्रेम के विषय में एक ग़लत धारणा और है। लोग स्वयं से प्रेम का अर्थ स्वार्थ से जोड़ते हैं, जबकि स्वयं से प्रेम का अर्थ स्वार्थ नहीं, स्वीकृति है। जब आप जैसे भी हैं, ख़ुद को वैसे ही स्वीकारना शुरू कर देते हैं, तब आप ख़ुद को प्रेम करना शुरू करते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि अपने दोषों, गलतियों, कमजोरियों और कमियों को स्वीकार करना ही आत्म-प्रेम की शुरुआत है। अगर आप ख़ुद को जैसे हैं, वैसे ही स्वीकारने के स्थान पर नकारते हुए कहते हैं कि “मैं अच्छा नहीं हूँ”, “मैं असफल हूँ”, “कोई मुझे नहीं समझता” तो आपका मन नकारात्मक विचारों से भर जाता है और नकारात्मक मन धीरे-धीरे आपके आत्मविश्वास को ख़त्म कर देता है।
इसके विपरीत ख़ुद को स्वीकार कर यह मानना कि “मैं पर्याप्त हूँ”, “मैं कोशिश कर रहा हूँ”, “मैं प्रेम के योग्य हूँ”, आपके आत्मविश्वास को बढ़ा देता है, जिससे आपका जीवन खिल उठता है। जिस तरह बगीचे को समय-समय पर पानी से सींचकर ही हरा-भरा रखा जा सकता है, ठीक वैसे ही आत्मा को रोज़ आत्म-सम्मान और आत्म-स्नेह जैसे सकारात्मक भावों से सींच कर ही जीवन को प्रेममय बनाया जा सकता है।
यह बात बिल्कुल सही है कि प्रेम की सबसे बड़ी शक्ति आत्म-सम्मान से आती है और आत्मसम्मान ख़ुद को स्वीकारने या प्रेम करने से बढ़ता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आप खुद को दूसरों से ऊपर समझें, बल्कि इसका अर्थ है कि आप खुद को उतना ही सम्मान दें, जितना आप दूसरों को देते हैं। याद रखियेगा, जब हम खुद को स्वीकारते हैं, खुद पर विश्वास रखते हैं, तब हम दूसरों को भी बिना शर्त स्वीकार कर पाते हैं। ऐसे व्यक्ति के पास जो भी आता है, वह खुद को बेहतर महसूस करता है क्योंकि जो व्यक्ति अपने अंदर प्रेम जगाता है, उसके चारों ओर प्रेम की ऊर्जा अपने आप फैल जाती है। स्वयं से प्रेम करने वाला व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है, अहंकारी नहीं। वह मदद मांगने से नहीं डरता, असफल होने से नहीं घबराता और दूसरों की सफलता से नहीं जलता क्योंकि वह जानता है कि उसका मूल्य उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व से है।
दोस्तों, अगर आप आत्म-प्रेम याने ख़ुद से प्रेम की शक्ति से अपने जीवन को संवारना चाहते हैं तो आज ही कुछ क्षण निकालकर ख़ुद से पूछिए, “क्या मैं खुद को उसी सहजता से प्रेम करता हूँ, जैसे दूसरों को करता हूँ?”, “क्या मैं अपनी आत्मा की सुनता हूँ, उसकी देखभाल करता हूँ?” और अगर आपका जवाब “ना” में आ रहा है तो आज से ही शुरुआत कीजिए और हर सुबह आईने में देखिए और मुस्कुराकर कहिए, “मैं अपने जीवन के हर अनुभव के लिए आभारी हूँ।” “मैं खुद से प्रेम करता हूँ।” यही आत्म-प्रेम आपके भीतर की थकान को मिटाएगा, आत्मविश्वास को जगाएगा और आपको वह शांति देगा जो बाहर की दुनिया नहीं दे सकती। याद रखिएगा दोस्तों, जब आप खुद से प्रेम करते हैं, तब जीवन भी आपसे प्रेम करने लगता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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