top of page
Search

दुनिया आपके शब्द नहीं, उपलब्धियाँ याद रखती है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 2 hours ago
  • 2 min read

Mar 17, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, जीवन में हम सभी को कभी न कभी आलोचना, अपमान या नकारात्मक शब्दों का सामना करना पड़ता है। कोई हमारे काम पर टिप्पणी करता है, तो कोई हमारे व्यक्तित्व पर सवाल उठाता है, या फिर कोई बिना वजह हमें भला-बुरा कह देता है। ऐसे समय में हमारी सबसे बड़ी दुविधा यह होती है कि हमें इन सब का जवाब भी देना चाहिए या नहीं? अगर आप इस विषय में मेरी राय पूछेंगे तो मेरा जवाब होगा, “नहीं”, क्योंकि हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता। कई बार ऐसी स्थितियों में मौन रहना ही सबसे शक्तिशाली उत्तर होता है।


एक छोटी-सी घटना इस सत्य को बहुत सुंदर ढंग से समझाती है। एक बार एक गुरु अपने शिष्य के साथ सुबह सैर कर रहे थे। रास्ते में एक व्यक्ति आया और गुरु को अपशब्द कहने लगा; उन्हें लगातार अपमानित करता रहा, लेकिन गुरु शांत मुस्कान के साथ आगे बढ़ते रहे। अंततः वह व्यक्ति थककर वापस चला गया। शिष्य ने आश्चर्य से अपने गुरु से पूछा, “गुरुदेव, आपने उसे जवाब क्यों नहीं दिया?” गुरु ने कहा, “यदि कोई व्यक्ति तुम्हें गंदा कपड़ा दे और तुम उसे स्वीकार न करो, तो वह कपड़ा किसके पास रहेगा?” शिष्य बोला, “जिसने दिया, उसी के पास।” गुरु मुस्कुराए और बोले, “बस यही बात है। उसने जो अपशब्द दिए, मैंने उन्हें स्वीकार ही नहीं किया।”


दोस्तों, यही जीवन का गहरा सिद्धांत है, दूसरों के शब्द तब तक हमें चोट नहीं पहुँचा सकते, जब तक हम उन्हें अपने मन में जगह नहीं देते। आज के समय में लोग जल्दी आहत हो जाते हैं। छोटी-सी आलोचना भी उन्हें परेशान कर देती है। लेकिन जो व्यक्ति हर नकारात्मक बात को अपने दिल पर ले लेता है, वह धीरे-धीरे अपनी शांति खो देता है।


इसी सिद्धांत को अपनाकर महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने अपने करियर और जीवन दोनों को ऊंचाइयों तक पहुँचाया था। करियर के शुरुआती दौर में आलोचकों ने उनके क़द, उनके बैट के वजन आदि को लेकर तरह-तरह की बातें बनाते हुए कहा था कि वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सफल नहीं हो पाएँगे। लेकिन सचिन ने ऐसे लोगों की बातों का जवाब कभी नहीं दिया, वे तो बस अपना सर्वश्रेष्ठ देते रहे और धीमे-धीमे अपनी योग्यता सिद्ध करते रहे। इसके बाद भी जब कभी उनका प्रदर्शन कमजोर होता, तो आलोचनाएँ शुरू हो जाती थीं। लेकिन सचिन ने कभी आलोचकों से बहस करने में अपनी ऊर्जा नहीं लगाई। उन्होंने केवल अपने खेल पर ध्यान केंद्रित रखा। समय के साथ वही सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के इतिहास के महानतम बल्लेबाजों में गिने जाने लगे। उन्होंने दुनिया को यह दिखा दिया कि जवाब शब्दों से नहीं, कर्मों से दिया जाता है।


दोस्तों, जीवन में हमेशा दो रास्ते होते हैं, पहला, हर आलोचना का जवाब देकर अपनी शांति खो देना। दूसरा, अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करके आगे बढ़ते रहना। समझदार व्यक्ति दूसरा रास्ता चुनता है। याद रखिएगा, दूसरों की नकारात्मकता उनके मन की अवस्था होती है, आपकी नहीं। अगर आप उसे स्वीकार कर लेते हैं, तभी वह आपके जीवन को प्रभावित करती है। इसलिए जीवन का एक सरल नियम बना लीजिए, हर शब्द को दिल तक पहुँचने की अनुमति मत दीजिए। अपनी ऊर्जा अपने लक्ष्य, अपने काम और अपने विकास पर लगाइए क्योंकि अंत में दुनिया आपके उत्तर नहीं, आपकी उपलब्धियाँ याद रखती है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

Comments


bottom of page