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ध्यान दीजिए…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • 1 hour ago
  • 3 min read

Aug 10, 2026

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, चलिए एक प्रश्न का जवाब दीजिए, आपकी नजर में किसी को दिया जाने वाला सबसे कीमती उपहार क्या होगा? शायद आप में से कुछ का जवाब होगा, कोई बहुमूल्य वस्तु; कोई कह सकता है, समय तो कोई साथ। लेकिन मेरा मानना थोड़ा अलग है, मेरी नजर में इस दुनिया का सबसे दुर्लभ उपहार किसी को अपना पूरा अटेंशन यानी पूरा ध्यान देना है। आज हम अपनों के साथ बैठते तो हैं यानी अपना समय तो देते हैं, लेकिन एक दूसरे के साथ नहीं होते। बात करते वक्त हमारी नजर मोबाइल पर होती है। जब बच्चा कुछ कहता है, तब हम कहीं और व्यस्त रहते हैं। पति-पत्नी दोनों साथ तो होते हैं, लेकिन दोनों ही अपने-अपने में व्यस्त रहते हैं। ऐसा ही कुछ हाल ऑफिस की मीटिंग में होता है, वहाँ सब लोग सर तो हिला रहे होते हैं, लेकिन उनका मन कहीं बाहर भटक रहा होता है। आजकल हम सुनते कम हैं, सामने वाले के चुप होने की प्रतीक्षा अधिक करते हैं, ताकि हम उसके चुप होते ही अपनी बात कह सकें।


दोस्तों, ध्यान देना केवल देखने या सुनने का नाम नहीं है। ध्यान देने का अर्थ तो सामने वाले को यह महसूस करवाना है कि इस क्षण वह आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण है और इसे दुनिया भर की संस्कृतियों ने बहुत ही अच्छे ढंग से समझाया है। जैसे अंग्रेजी में “pay attention’ कहा जाता है, यानी हम ध्यान को किसी मूल्यवान वस्तु की तरह चुकाते हैं। स्पेनिश भाषा में ध्यान को अमूल्य मानकर उधार स्वरूप दिया जाता है। फ्रेंच में ध्यान “बनाया” जाता है, क्योंकि यदि आप सचेत प्रयास नहीं करेंगे तो वह पैदा ही नहीं होगा और जर्मन भाषा में ध्यान को अमूल्य मान उपहार स्वरूप दिया जाता है। वैसे उपरोक्त सभी विचार अच्छे ही नहीं सच्चे भी हैं क्योंकि जब आप किसी को अपना पूरा ध्यान देते हैं, तो आप उसे समय नहीं, अपना जीवन दे रहे होते हैं।


दोस्तों, आज अधिकांश रिश्ते प्रेम की कमी से नहीं बल्कि ध्यान की कमी से टूट रहे हैं। बच्चों को हमेशा महंगे खिलौने नहीं बल्कि अपनों के कुछ मिनट चाहिए होते हैं। वे चाहते हैं कि माता-पिता बिना मोबाइल देखे उनकी बातें सुनें। बुजुर्गों को बड़ी-बड़ी सुविधाएँ नहीं चाहिए। उन्हें तो कोई ऐसा चाहिए जो धैर्य से उनकी पुरानी बातें सुन ले। इसी तरह कर्मचारियों को हमेशा वेतन वृद्धि नहीं चाहिए। उन्हें तो ऐसा लीडर चाहिए जो उनकी बातों को गंभीरता से सुने। इसलिए ही कहते हैं, “ध्यान सबसे बड़ी स्वीकृति है और उपेक्षा सबसे गहरा अपमान।”


दोस्तों, भगवान बुद्ध ने कहा था, "दुनिया में बहुत-सी चीज़ें आपकी आँखों को आकर्षित करेंगी, लेकिन केवल उसी का पीछा करना जो आपके हृदय को छू ले।” आज हमारी आँखें हर दिन हजारों चित्र, सैकड़ों वीडियो, अनगिनत समाचार और असंख्य सूचनाएँ देखती हैं। जबकि इनमें से ज्यादातर चीजें वास्तव में हमारे जीवन को बेहतर नहीं बनाती। याद रखिएगा, आँखों को आकर्षित करने वाली हर चीज़ मूल्यवान नहीं होती।


जो बात या इंसान हृदय को छू ले; जो आपको बेहतर इंसान बनाए; जो आपके भीतर करुणा, सेवा और प्रेम जगाए, वास्तव में वही आपके ध्यान के योग्य है। इसलिए अपने ध्यान का उपयोग भी उसी सावधानी से कीजिए, जैसे आप अपने धन का करते हैं क्योंकि जहाँ आपका ध्यान जाता है, धीरे-धीरे आपका जीवन भी उसी दिशा में जाने लगता है।


दोस्तों अगर मेरी बात से सहमत हों तो आज एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए। जब कोई आपसे बात करे, तो पाँच मिनट के लिए मोबाइल साइड में रख, बिना टोके, बिना रोके, बिना सलाह दिए सिर्फ सामने वाले की आँखों में देखकर उसकी बात सुनिए। जल्द ही आपको एहसास हो जायेगा कि कई रिश्तों को शब्दों की नहीं, ध्यान की आवश्यकता होती है। अंत में बस इतना दोहराऊँगा कि समय देना उदारता है। सहायता करना महानता है। लेकिन किसी को अपना पूरा ध्यान देना, प्रेम का सबसे सुंदर रूप है क्योंकि इस तेज़ रफ्तार दुनिया में सबसे अनमोल उपहार कोई वस्तु नहीं, बल्कि यह एहसास है कि "इस क्षण, मैं तुम्हें पूरे मन से सुन रहा हूँ।”


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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